गुरुवार, 10 सितंबर 2026
2027 से पहले धार्मिक मुद्दों पर ‘महाभारत’
दुष्यंत गौतम के बयान को लेकर कांग्रेस ने भाजपा को सीधे निशाने पर लिया
सनातन और धार्मिक आस्था के सवाल पर दलों में तेज हुआ आरोप-प्रत्यारोप
हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद के बाद टीका प्रकरण ने बढ़ाया सियासी तापमान
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी तलवारें एक बार फिर खिंच गई हैं। हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद के बाद अब दुष्यंत गौतम के टीका प्रकरण ने दोनों प्रमुख दलों को सीधे आमने-सामने ला खड़ा किया है। कांग्रेस ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम की टिप्पणी को सनातन और धार्मिक आस्था का अपमान करार देते हुए भाजपा पर हमला बोला है। जवाब में भाजपा कांग्रेस की राजनीति और उसकी मंशा पर सवाल खड़े कर रही है। यानी विवाद अब सिर्फ एक नेता के बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भाजपा बनाम कांग्रेस की वैचारिक और राजनीतिक लड़ाई का नया मोर्चा बन गया है।
कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा धार्मिक प्रतीकों और सनातन की आस्था को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है। पार्टी ने गौतम के बयान को इसी राजनीतिक सोच का उदाहरण बताते हुए भाजपा से जवाब मांगा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सनातन करोड़ों लोगों की आस्था है और किसी राजनीतिक दल को इसे अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है। भाजपा के लिए कांग्रेस का यह हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के चुनाव में सनातन, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था को अपने व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने की तैयारी में है। ऐसे में गौतम का बयान विपक्ष को भाजपा पर हमला करने का नया अवसर दे रहा है।
रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस पहले ही आमने-सामने हैं। कांग्रेस जहां इसे सामाजिक और धार्मिक अपमान से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा विषय बता रही है। अब टीका विवाद ने दोनों दलों को फिर उसी बहस के बीच ला खड़ा किया है। कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मुद्दा मिला है तो भाजपा के सामने अपने राजनीतिक नैरेटिव को बचाने की चुनौती है। इस पूरे घटनाक्रम को 2027 की चुनावी राजनीति से अलग करके देखना मुश्किल है। भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने और सरकार की उपलब्धियों के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी मुद्दों को धार देने में जुटी है। ऐसे में धार्मिक विवाद दोनों दलों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
कांग्रेस इन्हें ध्रुवीकरण और विभाजन की राजनीति के उदाहरण के रूप में पेश करेगी, जबकि भाजपा इन्हें सनातन और सांस्कृतिक अस्मिता के सम्मान के सवाल से जोड़कर जवाब देने की कोशिश करेगी। यही इस विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। यदि भाजपा इसे धार्मिक आस्था का प्रश्न मानती है तो कांग्रेस इसे राजनीतिक इस्तेमाल का मामला बता रही है। इस तरह बहस अब इस बात पर नहीं रह गई कि टीका विवाद में किसने क्या कहा, बल्कि सवाल यह बन गया है कि क्या उत्तराखंड की 2027 की चुनावी लड़ाई विकास और जनसरोकारों से आगे बढ़कर आस्था और पहचान की राजनीति के इर्द-गिर्द सिमटने जा रही है?
कांग्रेस के लिए यह विवाद भाजपा को घेरने का मौका है। पार्टी बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, भू-कानून, मूल निवास और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों के साथ धार्मिक विवादों को भी अपने चुनावी अभियान में जोड़ना चाहती है। भाजपा के लिए चुनौती दूसरी है। उसे एक तरफ कांग्रेस के हमले का जवाब देना है और दूसरी तरफ यह संदेश भी बनाए रखना है कि सरकार का चुनावी एजेंडा विकास और सुशासन पर केंद्रित है। यानी टीका विवाद में असली लड़ाई बयान की नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की है।
हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद और अब टीका विवाद ने संकेत दे दिया है कि उत्तराखंड में चुनावी तापमान बढ़ने लगा है। आने वाले महीनों में ऐसे मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच टकराव और तेज होने की संभावना है। जनता के सामने अब दोनों दलों की परीक्षा होगी कि वह धार्मिक और राजनीतिक विवादों के बीच रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और पहाड़ के विकास जैसे सवालों को कितना महत्व देते हैं। क्योंकि 2027 का चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं होगाकृयह इस बात की भी लड़ाई होगा कि उत्तराखंड की राजनीति का एजेंडा कौन तय करेगा।
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