रविवार, 13 सितंबर 2026

2027 का ‘सियासी ट्रेलर’ जारी

विस चुनाव करीब आते ही केंद्रीय एजेंसियां एक्टिव कांग्रेस ने घेरा, भाजपा बोली-जांच से क्यों भाग रहे एजेंसियों पर चुनावी पिच तैयार का लगाया आरोप देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। कांग्रेस ने कार्रवाई के समय और उसके राजनीतिक प्रभाव को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़ते हुए इसे राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि चुनाव नजदीक आते ही केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता बढ़ना महज संयोग नहीं है। वहीं भाजपा का कहना है कि भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की जांच को चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की पुरानी रणनीति है और यदि किसी मामले में जांच एजेंसी कार्रवाई कर रही है तो उसे राजनीतिक रंग देने के बजाय तथ्यों का सामना करना चाहिए। ईडी की कार्रवाई के बाद प्रदेश कांग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि आखिर चुनावी वर्ष की ओर बढ़ते उत्तराखंड में केंद्रीय जांच एजेंसियों की गतिविधियां अचानक क्यों तेज हो रही हैं। कांग्रेस का तर्क है कि राजनीतिक विरोधियों और उनसे जुड़े लोगों पर कार्रवाई के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि 2027 के चुनाव को देखते हुए भाजपा विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है। कांग्रेस के इस हमले ने कार्रवाई को महज जांच एजेंसी की कार्रवाई न रहने देकर इसे सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि किसी मामले में भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता के ठोस प्रमाण हैं तो जांच और कार्रवाई कानून के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन जांच एजेंसियों की कार्रवाई का इस्तेमाल राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा का पलटवार भी उतना ही तीखा है। भाजपा का कहना है कि ईडी कोई राजनीतिक संगठन नहीं बल्कि कानून के तहत काम करने वाली जांच एजेंसी है। किसी मामले में जांच आगे बढ़ती है तो उसका आधार दस्तावेज और साक्ष्य होते हैं, चुनावी कैलेंडर नहीं। भाजपा नेताओं के मुताबिक कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब भी जांच एजेंसियों की कार्रवाई होती रही है। अब विपक्ष में रहते हुए हर कार्रवाई को चुनाव से जोड़ना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी बन गई है। भाजपा का सवाल है कि यदि संबंधित व्यक्ति या मामले में कोई गड़बड़ी नहीं है तो जांच से डरने की जरूरत क्या है? दरअसल, उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अब राजनीतिक दलों के लिए दूर की मंजिल नहीं रह गया है। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर संगठन को चुनावी मोड में ला चुकी है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रही है। ऐसे में ईडी की किसी भी कार्रवाई का राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है। कांग्रेस इस कार्रवाई को केंद्रीय एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल के बड़े नैरेटिव से जोड़ रही है। पार्टी के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि वह पहले से ही बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, महंगाई और अन्य जनमुद्दों को लेकर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी में है। भाजपा दूसरी ओर कांग्रेस के इस नैरेटिव को जांच से बचने की कोशिश के रूप में पेश कर सकती है। यानी ईडी की कार्रवाई के साथ ही दोनों दलों के बीच जांच बनाम राजनीतिक प्रतिशोध की बहस तेज होने के आसार हैं। ईडी की कार्रवाई के बाद असली सवाल यही है कि इसका असर 2027 के चुनावी विमर्श पर कितना पड़ेगा। यदि जांच में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के तथ्य सामने आते हैं तो भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश करेगी। इसके उलट यदि कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध साबित करने में सफल रहती है तो वह इसे विपक्ष को दबाने और चुनावी लाभ लेने की रणनीति के तौर पर जनता के सामने रखेगी। इसलिए फिलहाल लड़ाई केवल जांच की नहीं है। लड़ाई उस नैरेटिव की है जिसे दोनों प्रमुख दल 2027 के चुनाव तक जनता के बीच स्थापित करना चाहते हैं। ईडी की कार्रवाई ने कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का नया मुद्दा दिया है, जबकि भाजपा के पास कांग्रेस से यह सवाल पूछने का अवसर है कि यदि जांच निष्पक्ष है तो उसे चुनाव से जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ रही है? आने वाले दिनों में जांच की दिशा और सामने आने वाले तथ्य ही तय करेंगे कि यह मामला केवल एक कानूनी कार्रवाई बनकर रह जाता है या 2027 के चुनाव का बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता है।

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