मंगलवार, 22 सितंबर 2026
826 स्कूल बंद सरकार ‘मौन’
स्कूल बंद होने का दावा, सरकार की चुप्पी पर गरमाया सवाल
बच्चे कहां गए, गांव कैसे बचेंगे और सरकार जवाब कब देगी
स्कूल ठीक करो अभियान ने 10 दिन में मांगा सरकार से हिसाब
रोडमैप नहीं मिला तो दो अक्टूबर के बाद आंदोलन की चेतावनी
देहरादून। उत्तराखंड में एक तरफ शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के दावे हैं, दूसरी तरफ गांवों में स्कूलों के दरवाजे बंद होने का सवाल खड़ा है। स्कूल ठीक करो अभियान के तहत काकरोच जनता पार्टी ने दावा किया है कि पिछले पांच वर्षों में 826 प्राथमिक विद्यालय बंद हुए हैं। संगठन ने सरकार से इस आंकड़े पर स्पष्ट जवाब और विद्यालयवार स्थिति सार्वजनिक करने की मांग की है। यह आंकड़ा सही है तो सवाल बेहद सीधा हैकृकि 826 स्कूल आखिर बंद क्यों हुए? और अगर यह आंकड़ा गलत है तो सरकार सामने आकर इसे गलत साबित क्यों नहीं करती?
मामला सिर्फ 826 भवनों का नहीं है। मामला उन बच्चों का है जिनकी पहली पाठशाला बंद हुई। मामला उन अभिभावकों का है जिन्हें अपने बच्चों को दूसरे विद्यालयों तक भेजना पड़ा। मामला उन गांवों का है जहां स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि गांव की मौजूदगी और भविष्य का भी प्रतीक है। स्कूल बंद करने का निर्णय कागज पर शायद एक प्रशासनिक प्रक्रिया हो सकता है, लेकिन पहाड़ में उसका असर कहीं बड़ा होता है। एक स्कूल बंद होता है तो बच्चे दूसरे विद्यालय तक पहुंचने के लिए अधिक दूरी तय कर सकते हैं। परिवारों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आती है और छोटे गांवों में शिक्षा की सुविधा कमजोर होती है। इसलिए सरकार को केवल स्कूलों की संख्या बताने से काम नहीं चलेगा।
उसे बताना होगा कि बंद हुए 826 विद्यालयों में कितने बच्चे पढ़ते थे, उन्हें किन विद्यालयों में भेजा गया, कितनी दूरी तय करनी पड़ रही है और कितने शिक्षकों की तैनाती प्रभावित हुई। यही वह हिसाब है, जिसका इंतजार अब सरकार से किया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल बनाने की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की बुनियादी जरूरतें आज भी सवाल बनकर खड़ी हैं। अभियान ने शिक्षक, पेयजल, शौचालय, बिजली और सुरक्षित भवन जैसी सुविधाओं को लेकर समयबद्ध योजना की मांग की है। सवाल यह है कि जिस स्कूल में शिक्षक पर्याप्त नहीं, पानी नहीं, शौचालय उपयोग लायक नहीं या भवन सुरक्षित नहीं, वहां आधुनिक शिक्षा के बड़े-बड़े दावे आखिर कितने कारगर होंगे?बच्चे को डिजिटल पाठ पढ़ाने से पहले उसे सुरक्षित स्कूल देना होगा।
सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या कम होने को विद्यालय बंद करने का कारण माना जाता है तो अगला सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता हैकृकि सरकारी स्कूलों से बच्चों का भरोसा क्यों घट रहा है? क्या वजह शिक्षक की कमी है? क्या वजह सुविधाओं की कमी है? क्या वजह निजी स्कूलों की ओर बढ़ता आकर्षण है? या फिर सरकारी शिक्षा व्यवस्था में लगातार हुई उपेक्षा ने अभिभावकों को विकल्प तलाशने पर मजबूर किया? इन सवालों का जवाब केवल शिक्षा विभाग नहीं, पूरी सरकार को देना होगा।
काकरोच जनता पार्टी ने सरकार को दस दिन के भीतर रिपोर्ट और शिक्षा सुधार का रोडमैप देने की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि जवाब नहीं मिला तो दो अक्टूबर के बाद शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया जाएगा। अब सरकार के सामने दो रास्ते हैंकृया तो आंकड़ों के साथ स्थिति स्पष्ट करे और बताए कि विद्यालयों को बचाने तथा सुधारने के लिए क्या समयबद्ध योजना है, या फिर विपक्षी संगठनों और जनता के सवालों का सामना करे। लेकिन इस बार सवाल केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
उत्तराखंड ने वर्षों से पलायन, गांवों की खाली होती आबादी और पहाड़ में घटती सुविधाओं की चिंता देखी है। ऐसे में यदि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की संख्या भी लगातार घट रही है तो इसे केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कवायद मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर सवालों को अनदेखा करना होगा। 826 स्कूल बंद होने का दावा एक आंकड़ा नहीं, सरकार की जवाबदेही की परीक्षा है। सरकार बताएकृकि कितने स्कूल बंद हुए? क्यों बंद हुए? उन स्कूलों के बच्चे अब कहां पढ़ रहे हैं? कितने विद्यालयों में शिक्षक कम हैं? कितने स्कूलों में पानी, बिजली और शौचालय की समस्या है? कितने भवन बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं?
सरकार को इन सवालों का जवाब भाषण से नहीं, आंकड़ों और समयबद्ध कार्ययोजना से देना होगा। क्योंकि जिस पहाड़ से बच्चे स्कूल जाने के लिए निकलते हैं, उसी पहाड़ से अगर स्कूल ही गायब होते गए तो फिर विकास की मंजिल किसके लिए बनाई जा रही है?
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें