बुधवार, 9 सितंबर 2026

वर्षों का इंतजार और अंतहीन दर्द

विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले जनता का मूड सख्त 2027 से पहले उत्तराखंड के गांवों में चुनाव बहिष्कार की गूंज मूलभूत समस्याओं के दर्द से उपजा अविश्वास बना जनता का हथियार सड़क नहीं तो वोट नहीं के नारों से सुलग उठी 2027 की चुनावी सियासत देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तारीख का अभी ऐलान भी नहीं हुआ है, लेकिन प्रदेश के कई इलाकों में स्थानीय समस्याओं को लेकर चुनाव बहिष्कार की चेतावनियां सामने आने लगी हैं। सड़कों से लेकर पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार तक के सवालों पर नाराजगी अब सिर्फ शिकायतों तक सीमित नहीं रहना चाहती। गांवों और क्षेत्रों में उठती यह आवाज राजनीतिक दलों के लिए समय रहते चेतावनी भी है और आने वाले चुनाव का संकेत भी। राजनीतिक दल भले ही 2027 की चुनावी तैयारियों में जुटे हों, लेकिन जनता के एक हिस्से का सवाल सीधा हैकृजब पांच साल में समस्याएं दूर नहीं हुईं तो चुनाव के समय फिर वोट मांगने क्यों आएंगे? स्थानीय स्तर पर सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, पेयजल, बिजली, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे वर्षों से उठते रहे हैं। कई जगह ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने मांगें रखीं, ज्ञापन दिए और आंदोलन किए। जब समाधान नहीं मिला तो अब चुनाव बहिष्कार को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की चेतावनी दी जा रही है। यह स्थिति राजनीतिक दलों के लिए इसलिए गंभीर है क्योंकि चुनाव बहिष्कार का नारा अक्सर किसी एक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के प्रति नाराजगी को दर्शाता है। उत्तराखंड में सड़क और पलायन का सवाल नया नहीं है। गांव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं और कई दूरस्थ क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की कमी अब भी बड़ी चुनौती है। कहीं सड़क नहीं तो कहीं सड़क बनी है लेकिन बरसात में बंद हो जाती है। कहीं अस्पताल की इमारत है लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं। कहीं स्कूल है लेकिन पर्याप्त शिक्षक नहीं। ऐसे में विकास के बड़े दावों और स्थानीय हकीकत के बीच पैदा हुआ अंतर जनता की नाराजगी को बढ़ा रहा है। यही अंतर 2027 के चुनाव में सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए सबसे बड़ा सवाल बन सकता है। भाजपा सरकार अपनी उपलब्धियों के साथ जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, जबकि कांग्रेस सरकार की कमियों को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटी है। लेकिन चुनाव बहिष्कार की चेतावनियां दोनों दलों के लिए असहज करने वाली हैं। क्योंकि यदि जनता का एक वर्ग यह मानने लगे कि उसकी समस्याएं सत्ता बदलने से भी नहीं बदलेंगी, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति भरोसे का संकट पैदा होता है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव केवल पोस्टर, रैलियों और नारों का आयोजन नहीं है। चुनाव से पहले जनता के बीच जाकर यह सुनना भी जरूरी है कि उसके गांव और मोहल्ले की सबसे बड़ी समस्या क्या है। चुनाव बहिष्कार की चेतावनी लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर नहीं मानी जा सकती। लोकतंत्र में वोट जनता की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन जब जनता वोट न देने की बात करने लगे तो इसे केवल राजनीतिक धमकी मानकर खारिज करना भी खतरनाक होगा। इस आवाज के पीछे छिपे सवालों को सुनना होगा। क्यों लोग नाराज हैं? किस समस्या का समाधान नहीं हुआ? किस वादे पर भरोसा टूटा? और पांच साल बाद भी वही मुद्दा क्यों खड़ा है? इन सवालों के जवाब राजनीतिक दलों को चुनावी घोषणापत्र से पहले देने होंगे। विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने में अभी वक्त है। राजनीतिक दल टिकट, गठबंधन और बूथ प्रबंधन में उलझने से पहले अगर जनता के इस शुरुआती संदेश को पढ़ लें तो शायद चुनाव के समय बहिष्कार की नौबत न आए। क्योंकि मतदान केंद्र तक पहुंचने से पहले ही यदि जनता सवाल लेकर सड़क पर उतर रही है, तो यह सिर्फ चुनावी नाराजगी नहींकृसत्ता और व्यवस्था के लिए चेतावनी की घंटी है। 2027 का चुनाव किसके पक्ष में जाएगा, यह बाद की बात है। फिलहाल बड़ा सवाल यह है कि चुनाव की तारीख आने से पहले ही जनता क्यों कह रही हैकृपहले काम, फिर वोट।

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