रविवार, 13 सितंबर 2026
सत्ता से सवाल पर ‘बुलडोजर’
यूपी में सत्ता से सवाल की कीमत नौकरी, धमकी और खौफ
योगी सरकार पर पत्रकार की आवाज दबाने के आरोप
डबल इंजन सरकार में सवाल पूछना इतना बड़ा अपराध
सत्ता से सवाल पूछना गुनाह है तो प्रेस कान्फ्रेंस किसलिए
देहरादून/लखनऊ। लोकतंत्र में प्रेस कान्फ्रेंस का मतलब सवाल-जवाब होता है। लेकिन उत्तर प्रदेश में महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव से जुड़े घटनाक्रम ने इस बुनियादी लोकतांत्रिक परंपरा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक तीखा सवाल पूछने के बाद पत्रकार के सामने नौकरी जाने, पूछताछ और धमकी जैसी परिस्थितियां खड़ी होने के आरोप सामने आए हैं। विपक्ष ने इसे सीधे तौर पर पत्रकारिता की आवाज दबाने और सत्ता के असहज सवालों से बचने की कोशिश करार दिया है। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि सवाल किसी राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता में पूछा गया था। यानी जहां पत्रकारों से सवाल पूछने और सरकार से जवाब मांगने की अपेक्षा होती है, वहीं सवाल पूछने वाली पत्रकार को ही कथित दबाव का सामना करना पड़ा।
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता के सामने खड़े होकर सवाल पूछना है। सवाल तीखा हो सकता है, असहज कर सकता है और सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकता है। लेकिन सवाल का जवाब तथ्यों से दिया जाना चाहिए। दिव्या श्रीवास्तव प्रकरण में विपक्ष का आरोप है कि सवाल पूछने के बाद पत्रकार पर दबाव बनाया गया। नौकरी जाने और धमकी जैसे आरोपों ने पूरे मामले को महज एक पत्रकार की व्यक्तिगत परेशानी से निकालकर मीडिया की स्वतंत्रता बनाम सत्ता के दबाव की बहस के केंद्र में ला दिया है। सबसे बड़ा सवाल यही हैकृकि अगर पत्रकार सत्ता से सवाल नहीं पूछेगा तो फिर जनता की ओर से सवाल कौन पूछेगा?
इस घटनाक्रम पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि पत्रकारों को सवाल पूछने का अधिकार नहीं है तो प्रेस कान्फ्रेंस को प्रेस एकालाप कहा जाना चाहिए। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विवाद की जड़ ही सवाल पूछने के अधिकार से जुड़ी है। सरकार की प्रेस वार्ता में पत्रकार मौजूद होते हैं ताकि सरकार की नीतियों, फैसलों और दावों पर सवाल कर सकें। यदि केवल अनुकूल सवाल ही स्वीकार्य हों तो फिर प्रेस वार्ता और सरकारी प्रचार कार्यक्रम के बीच अंतर ही क्या रह जाता है?
भाजपा सरकारें सुशासन, कानून-व्यवस्था और मजबूत प्रशासन को अपनी पहचान बताती रही हैं। ऐसे में पत्रकार पर दबाव के आरोप सरकार के सामने असहज सवाल खड़े करते हैं। क्या मजबूत सरकार की ताकत सवालों का सामना करने में है या सवाल पूछने वाले को चुप कराने में? यदि पत्रकार ने गलत तथ्य रखे, तो सरकार उसका खंडन कर सकती थी। यदि सवाल भ्रामक था, तो तथ्य सामने रखे जा सकते थे। यदि कोई पत्रकारिता संबंधी गलती हुई थी, तो संस्थागत स्तर पर उसका समाधान हो सकता था। लेकिन यदि सवाल के बाद पत्रकार को नौकरी गंवानी पड़ी और उसके सामने सरकारी तंत्र से पूछताछ अथवा धमकी का माहौल बना, जैसा विपक्ष आरोप लगा रहा है, तो यह केवल एक पत्रकार का मामला नहीं रह जाता।
विवाद में कथित तौर पर बुलडोजर के खौफ का भी उल्लेख किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बुलडोजर सरकार की कार्रवाई और सख्ती का प्रतीक बन चुका है। ऐसे में यदि किसी पत्रकार को ही बुलडोजर की धमकी महसूस होने का दावा किया जाता है तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर आरोप है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और पूरे घटनाक्रम पर संबंधित पक्षों का स्पष्ट पक्ष सामने आना जरूरी है। लेकिन सवाल फिर वही हैकृक्या पत्रकार को सत्ता से सवाल पूछने के बाद अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना चाहिए?
देशभर में पिछले कुछ वर्षों से मीडिया की स्वतंत्रता, पत्रकारों पर राजनीतिक दबाव और सत्ता के साथ मीडिया के रिश्तों को लेकर बहस चलती रही है। उत्तर प्रदेश का यह प्रकरण उसी बहस को फिर सामने ले आया है। सत्ता के लिए पत्रकारिता तब तक सुविधाजनक हो सकती है, जब तक वह उपलब्धियों की खबर लिखती रहे। असली लोकतांत्रिक परीक्षा तब होती है जब पत्रकार सरकार के दावों के सामने असुविधाजनक सवाल रखता है। सरकार की आलोचना सरकार विरोध नहीं होती और सवाल पूछना अपराध नहीं। लोकतंत्र में सत्ता बदलती रहती है, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार स्थायी रहना चाहिए।
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू यही है कि यदि किसी पत्रकार को सवाल पूछने के बाद कथित दबाव का सामना करना पड़ता है तो इसका संदेश केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहता। न्यूजरूम में बैठा दूसरा पत्रकार भी सोच सकता हैकृक्या यह सवाल पूछना सुरक्षित है? और जब पत्रकार सवाल पूछने से पहले अपने रोजगार, सुरक्षा या भविष्य के बारे में सोचने लगे, तब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बाहर से खड़ा दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर से कमजोर होने लगता है। इसलिए सरकार को आगे आकर पूरे घटनाक्रम पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। पत्रकार पर लगाए गए आरोप हों तो सामने रखे जाएं। नौकरी जाने का कारण सार्वजनिक किया जाए। यदि किसी सरकारी तंत्र ने पत्रकार से पूछताछ या दबाव बनाया तो उसका आधार बताया जाए और यदि धमकी के आरोप गलत हैं तो सरकार उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज करे। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि उसके पास सत्ता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह सवालों का सामना करने का साहस रखती है।
सवाल पूछने वाले पत्रकार को जवाब मिलेगा या कार्रवाई? लोकतंत्र में प्रेस कान्फ्रेंस होगी या प्रेस एकालाप? सत्ता आईने से संवाद करेगी या आईना तोड़ने का आरोप झेलेगी? यही सवाल अब उत्तर प्रदेश की सियासत और मीडिया की स्वतंत्रता के सामने खड़ा है।
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