शुक्रवार, 11 सितंबर 2026
इतिहास बनाम अस्मिता की जंग
नितिन नवीन के हमले के बाद कांग्रेस का पलटवार
विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ गया राजनीतिक पारा
भाजपा अध्यक्ष ने कांग्रेस के इतिहास पर उठाए सवाल
कांग्रेस पार्टी ने भाजपा से घटना पर सीधा जवाब मांगा
देहरादून। हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच शुरू हुआ विवाद अब सीधे राजनीतिक टकराव में बदल गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने हल्द्वानी पहुंचकर कांग्रेस पर दलितों के अपमान का आरोप लगाया और कहा कि जिस कांग्रेस का इतिहास दलितों के अपमान का रहा हो, वह सम्मान की बात नहीं कर सकती।
नितिन नवीन के इस हमले पर कांग्रेस ने पलटवार करते हुए सवाल खड़ा किया है कि मुद्दा कांग्रेस के इतिहास का है या हल्द्वानी में खरगे की सभा के बाद हुए शुद्धिकरण का? कांग्रेस का कहना है कि भाजपा को इतिहास के पन्ने पलटने के बजाय पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि सार्वजनिक मंच का शुद्धिकरण किस मानसिकता और संदेश के साथ किया गया।
विवाद अब केवल एक कार्यक्रम के बाद किए गए धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे दलित अस्मिता और संवैधानिक समानता से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस पर इस प्रकरण को राजनीतिक रंग देने और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। इससे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच वैचारिक टकराव और तेज हो गया है। नितिन नवीन ने प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान कांग्रेस पर हमला बोलते हुए शुद्धिकरण विवाद को कांग्रेस के दलित विरोधी इतिहास से जोड़ने की कोशिश की। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाकर समाज को बांटने का प्रयास कर रही है। लेकिन कांग्रेस ने भाजपा के इस तर्क को मुद्दे से भटकाने की कोशिश करार दिया है। पार्टी का कहना है कि अगर घटना गलत नहीं थी तो जांच और जवाबदेही से भाजपा को परेशानी क्यों हो रही है?
कांग्रेस का हमला सीधा हैकृखरगे के मंच पर शुद्धिकरण क्यों हुआ? इसके पीछे कौन था? इसका संदेश क्या था? कांग्रेस पहले ही इस घटना को सामाजिक भेदभाव और दलित सम्मान से जोड़कर विरोध दर्ज करा चुकी है। पार्टी ने देहरादून में प्रदर्शन किया और मामले में कार्रवाई की मांग की। मामले में पुलिस ने प्राथमिकी भी दर्ज की है और जांच आगे बढ़ रही है। रिपोर्टों के अनुसार प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून की धारा भी लगाई गई है।
यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष है। धार्मिक आस्था का सम्मान लोकतंत्र की बुनियादी भावना है, लेकिन आस्था के नाम पर किसी व्यक्ति या समुदाय की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगे तो सवाल संवैधानिक समानता तक पहुंचता है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने फिलहाल पुलिस को मामले की जांच करने देने का रास्ता अपनाया है और राज्य सरकार की ओर से महत्वपूर्ण इलेक्ट्रानिक साक्ष्य सुरक्षित रखने का आश्वासन दर्ज किया गया है। इसलिए राजनीतिक बयानबाजी के बीच असली कसौटी अब जांच होगी। कौन सही है, कौन गलतकृइसका फैसला नारों और मंचों से नहीं, तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच हल्द्वानी का यह विवाद भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन चुका है। भाजपा इसे कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ मुद्दा बना रही है, जबकि कांग्रेस इसे भाजपा की कथित जातिवादी और सामाजिक विभाजन की राजनीति के उदाहरण के रूप में पेश कर रही है। यानी रामलीला मैदान अब सिर्फ एक मैदान नहीं रहाकृवह भाजपा और कांग्रेस के बीच वैचारिक और चुनावी संघर्ष का नया अखाड़ा बन गया है। सवाल अब यह नहीं कि कौन किस पर कितना बड़ा आरोप लगाता है। सवाल यह है कि राजनीति आस्था की रक्षा के नाम पर आगे बढ़ेगी या संविधान की समानता को केंद्र में रखकर? हल्द्वानी का जवाब आने वाले चुनावी विमर्श की दिशा तय कर सकता है।
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