शनिवार, 19 सितंबर 2026
चेलों ने लूटा प्रदेश और गुरु बने ‘सत्यवादी’
ईडी की आंच से बचने को हरीश रावत ने चला भावनात्मक पैंतरा
पूर्व सीएम को याद आई मां, आंसुओं से धुलेंगे भ्रष्टाचार के दाग
जांच एजेंसियों की कार्रवाई और आरोपों से घिरे पूर्व सीएम हरीश
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में चुनावी रण अभी पूरी तरह खुला भी नहीं है और आरोप-प्रत्यारोप के तीरों ने निशाना साधना शुरू कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ उठ रहे आरोपों के बीच अब खुद रावत मैदान में उतर आए हैं। लेकिन इस बार उनका जवाब सामान्य राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि भावनाओं से लिपटा हुआ राजनीतिक प्रतिआक्रमण है। हाथों में मां की तस्वीर, मां की सौगंध और फिर बड़ा दावाकृन नौकरी दिलाने के नाम पर कभी पैसा लिया और न किसी राजनीतिक पद के लिए। रावत ने अपने अंदाज में सवाल भी खड़ा किया और जवाब भी दिया। संदेश साफ थाकृआरोप लगाने वालों को वह केवल राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत आस्था को सामने रखकर चुनौती दे रहे हैं।
उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब उनके पूर्व विशेष कार्याधिकारी और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना से जुड़ी प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। जांच एजेंसी की कार्रवाई के बाद रावत पहले ही कांग्रेस के कुछ संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं। हालांकि उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की बात नहीं कही।
हरीश रावत के लिए मौजूदा विवाद केवल किसी एक आरोप का जवाब देने तक सीमित नहीं है। यह उनके दशकों लंबे राजनीतिक सफर और सार्वजनिक छवि से जुड़ा सवाल बन गया है। यही वजह है कि रावत ने जवाब देते हुए राजनीतिक शब्दावली के बजाय परिवार और आस्था का सहारा लिया। मां की तस्वीर हाथ में लेकर सौगंध खाना दरअसल अपने समर्थकों और राजनीतिक विरोधियों दोनों को संदेश देने की कोशिश है कि वह इस आरोप को व्यक्तिगत रूप से अपनी प्रतिष्ठा पर हमला मान रहे हैं। रावत का कहना है कि उन्होंने कभी नौकरी लगवाने के नाम पर पैसा नहीं लिया। राजनीतिक पद दिलाने के बदले धन लेने के आरोपों से भी उन्होंने इनकार किया है। यानी पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोपों की पूरी राजनीतिक धार को अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी के सवाल से जोड़ दिया है।
रावत के जवाब का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि आरोपों के शोर को वह सबूत की कसौटी पर कसने की चुनौती दे रहे हैं। उनका कहना है कि उनके राजनीतिक जीवन में पहले भी आरोप लगाए गए, लेकिन वह उन हमलों के बीच खड़े रहे। यहीं से मामला महज बचाव का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का रूप लेता दिखाई दे रहा है। रावत जानते हैं कि चुनावी राजनीति में किसी नेता पर लगा आरोप केवल अदालत या जांच एजेंसी तक सीमित नहीं रहता। वह जनता की धारणा का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में रावत ने शुरुआती स्तर पर ही अपनी राजनीतिक कथा गढ़ने की कोशिश की हैकृआरोप बनाम हरीश रावत की साख।
चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में ईडी की कार्रवाई के बाद भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का राजनीतिक आधार मिला है, जबकि कांग्रेस इसे व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देख रही है। ऐसे में रावत का भावुक वीडियो इसी टकराव की अगली कड़ी माना जा सकता है। भाजपा की ओर से जहां जांच और कार्रवाई को कानून की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, वहीं रावत ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को राजनीतिक हमले के रूप में प्रस्तुत किया है। यही विरोधाभास आने वाले दिनों में इस मुद्दे को और गरमा सकता है।
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और भाजपा को सत्ता से चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे समय में कांग्रेस के सबसे पुराने और प्रभावशाली चेहरों में शामिल हरीश रावत पर उठते सवाल पार्टी के लिए भी राजनीतिक महत्व रखते हैं। रावत के सामने दोहरी चुनौती हैकृएक तरफ आरोपों का जवाब देना और दूसरी तरफ यह संदेश देना कि वह अभी भी सक्रिय राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में हैं। इसीलिए उनका मां की सौगंध वाला वीडियो महज सफाई नहीं है। यह राजनीतिक रूप से अपने समर्थक आधार को साधने और विरोधियों के हमले की धार को भावनात्मक मोर्चे पर रोकने की कोशिश भी है।
उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की शैली हमेशा से अलग रही है। कभी पहाड़ की संस्कृति, कभी लोक भोजन, कभी खेत-खलिहान और कभी पहाड़ी अस्मिताकृरावत राजनीति को सीधे जनभावनाओं से जोड़ने के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी उन्होंने वही रास्ता चुना है, लेकिन मुद्दा कहीं ज्यादा गंभीर है। हाथ में मां की तस्वीर लेकर दिया गया बयान उनके लिए राजनीतिक बचाव का भावनात्मक कवच बन गया है। अब असली सवाल यह है कि क्या यह भावनात्मक अपील आरोपों के राजनीतिक असर को रोक पाएगी? इसका जवाब आने वाले दिनों की जांच, सामने आने वाले दस्तावेजों और दोनों दलों की राजनीतिक रणनीति से मिलेगा।
हरीश रावत ने संकेत दे दिया है कि वह चुप बैठने वाले नहीं हैं। उन्होंने संघर्ष जारी रखने की बात कही है। यानी आने वाले दिनों में यह मामला और मुखर हो सकता है। एक तरफ जांच एजेंसी की कार्रवाई है, दूसरी तरफ रावत की राजनीतिक सफाई। एक तरफ भाजपा के हमले की जमीन है, दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर रावत की अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता का सवाल। 2027 की चुनावी बिसात पर अभी कई मोहरे चलने बाकी हैं। लेकिन हरीश रावत ने अपने ऊपर लगे आरोपों के जवाब में पहली चाल चल दी हैकृहाथों में मां की तस्वीर, जुबान पर सौगंध और सामने राजनीतिक चुनौती। अब सवाल यह नहीं कि रावत चुप होंगे या नहीं। सवाल यह है कि उनके इस भावनात्मक पलटवार के बाद भाजपा और कांग्रेस की सियासी लड़ाई किस नए मोड़ पर पहुंचती है।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें