सोमवार, 21 सितंबर 2026
डिजिटल क्रांति में भी ‘चढ़ावा’
25 साल के उत्तराखंड में जीरो टालरेंस का ढोंग और तहसीलों का नंगानाच
राजस्व तंत्र में दीमक, सरकार की निगरानी पर सवाल
राज्य बनने से पहले से चली आ रही शिकायतें बरकरार
तहसीलों में काम के बदले सुविधा शुल्क के हैं आरोप
शासन तक शिकायतों के बावजूद जवाबदेही पर सवाल
देहरादून। उत्तराखंड को अलग राज्य बने ढाई दशक से अधिक समय हो गया। इस दौरान सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, मुख्य सचिव बदले और प्रशासनिक ढांचे में कई सुधार हुए। डिजिटल व्यवस्था आई, आनलाइन प्रमाणपत्र और राजस्व सेवाओं का विस्तार हुआ, अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के दावे हुए और भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की नीति भी घोषित होती रही। लेकिन जमीन पर राजस्व तंत्र को लेकर आम आदमी की शिकायतों का चरित्र बहुत नहीं बदला। जमीन की पैमाइश हो, दाखिल-खारिज हो, विरासत का मामला हो, खसरा-खतौनी में सुधार हो या प्रमाणपत्र से जुड़ा कामकृराजस्व कार्यालयों के चक्कर काटने वाले नागरिकों की शिकायतें आज भी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि शासन-प्रशासन तक ऐसी शिकायतें पहुंचती रही हैं तो फिर इस कथित सिस्टम को तोड़ने के लिए निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती?
यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राजस्व व्यवस्था सीधे आम नागरिक की संपत्ति और अधिकारों से जुड़ी है। एक रिकार्ड की गलती परिवारों को वर्षों तक विवाद में उलझा सकती है। एक लंबित आवेदन किसान, भूमिधर या ग्रामीण को बार-बार कार्यालय पहुंचने के लिए मजबूर कर सकता है। यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता की कमी और कथित बिचौलिया संस्कृति नागरिक के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनती है। राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार को लेकर शिकायतें समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर उठती रही हैं। सवाल यह नहीं कि शिकायत किसने की या किस कर्मचारी पर आरोप लगा। असली सवाल यह है कि शिकायत मिलने के बाद सिस्टम ने क्या किया?
यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ लगातार शिकायतें आती हैं और फिर भी वह उसी तरह संवेदनशील काम करता रहता है, तो सवाल केवल उस कर्मचारी पर नहीं, बल्कि उसे निगरानी में रखने वाले पूरे प्रशासनिक ढांचे पर उठता है। सरकार का भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख प्रशासनिक बैठकों और सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देता है। लेकिन शासन की नीति की वास्तविक परीक्षा सचिवालय में नहीं, तहसील की चौखट पर होती है। आम आदमी के लिए मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव की भ्रष्टाचार विरोधी घोषणाओं का मतलब तभी है जब उसका असर उस कर्मचारी तक दिखाई दे जो उसकी फाइल देख रहा है। यहीं सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता हैकृकि क्या भ्रष्टाचार विरोधी अभियान बड़े मामलों और सुर्खियों तक सीमित है या रोजमर्रा के प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर भी उतनी ही कठोर निगरानी है?
राजस्व सेवाओं को ऑनलाइन करने के पीछे मकसद यही था कि नागरिक को दफ्तरों के चक्कर कम लगाने पड़ें और प्रक्रिया पारदर्शी बने। लेकिन डिजिटल व्यवस्था के बावजूद जहां अंतिम सत्यापन, रिपोर्ट, रिकार्ड सुधार या मौके की कार्रवाई अधिकारी-कर्मचारी के स्तर पर निर्भर रहती है, वहां मानवीय हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहती है। यही कारण है कि सरकार को सिर्फ यह बताने से काम नहीं चलेगा कि कितनी सेवाएं आनलाइन कर दी गईं। उसे यह भी बताना होगा कि आनलाइन व्यवस्था के बाद शिकायतों की संख्या कितनी बदली, कितने अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई और कितने मामलों में समयसीमा का उल्लंघन हुआ। भ्रष्टाचार की शिकायत सामने आने पर किसी एक कर्मचारी पर कार्रवाई करना जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। यदि समस्या किसी प्रक्रिया में है तो व्यक्ति बदलने से प्रक्रिया नहीं बदलती। जरूरत इस बात की है कि सरकार तहसीलवार ऐसे मामलों का स्वतंत्र परीक्षण कराए जिनमेंकृ एक ही काम के लिए बार-बार कार्यालय बुलाने की शिकायत हो। आवेदन लंबे समय तक लंबित रहे हों। रिकार्ड में बार-बार संशोधन हुआ हो। बिचौलियों की भूमिका की शिकायत हो। अधिकारियों के खिलाफ बार-बार शिकायतें आई हों। शिकायत के बाद भी कार्रवाई का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध न हो। ऐसी समीक्षा से यह सामने आ सकता है कि समस्या कुछ व्यक्तियों तक सीमित है या प्रक्रिया के भीतर ही कोई ऐसी खामी है जिसका फायदा उठाया जा रहा है।
यदि सरकार वास्तव में राजस्व तंत्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करने को लेकर गंभीर है तो उसे जिलावार आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। पिछले पांच वर्षों में राजस्व विभाग के खिलाफ कितनी भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें मिलीं? कितनी शिकायतों की जांच हुई? कितनी सही पाई गईं? कितने कार्मिक निलंबित हुए? कितनों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई? कितने मामलों में मुकदमा दर्ज हुआ? और कितने मामलों में शिकायत निराधार पाई गई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने पर ही यह पता चलेगा कि शिकायतों को लेकर सरकार की निगरानी व्यवस्था वास्तव में कितनी प्रभावी है। उत्तराखंड में जमीन का सवाल केवल कागज का सवाल नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन परिवार, खेती, आवास और भविष्य से जुड़ी है। मैदानी इलाकों में भी जमीन से संबंधित विवाद और रिकार्ड आम नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में राजस्व कार्यालयों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी का सीधा असर नागरिक के अधिकारों पर पड़ सकता है कि जिस व्यक्ति के पास पैसा, पहुंच या प्रभाव नहीं है, उसके लिए सरकारी कार्यालय की प्रक्रिया सरल होना सुशासन की पहली शर्त है। अगर उसे अपने वैधानिक काम के लिए किसी बिचौलिए का सहारा लेना पड़े, तो यह सिर्फ प्रशासनिक असुविधा नहीं बल्कि शासन की विश्वसनीयता का सवाल है। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। लेकिन राजस्व तंत्र में शिकायतों की वास्तविक स्थिति और उन पर हुई कार्रवाई का पूरा आंकड़ा जनता के सामने आना चाहिए। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर मुख्य सचिव और जिलाधिकारी कार्यालय तक शिकायतें पहुंचने की बात यदि सही है, तो सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि उन शिकायतों का परिणाम क्या हुआ। किस अधिकारी ने जांच की? क्या रिपोर्ट बनी? क्या कार्रवाई हुई? अगर कार्रवाई नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई? और अगर शिकायतें गलत थीं तो शिकायतकर्ताओं को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई? सरकार से अब सिर्फ जीरो टालरेंस’ का बयान नहीं, कार्रवाई का हिसाब चाहिए। क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे प्रभावी संदेश भाषण नहीं, कार्रवाई का रिकार्ड होता है। और यदि किसी सरकारी तंत्र के खिलाफ वर्षों से एक जैसी शिकायतें आती रहें, तो समस्या सिर्फ उस तंत्र में काम करने वालों की नहीं रहतीकृवह उस व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल बन जाती है। उत्तराखंड के राजस्व तंत्र पर लगे इन आरोपों की निष्पक्ष, समयबद्ध और तहसीलवार जांच अब सिर्फ प्रशासनिक जरूरत नहीं, शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा भी है।
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