रविवार, 6 सितंबर 2026

मुद्दा एक, नैरेटिव दो

हल्द्वानी से निकला एक विवाद अब बेंगलुरु तक पहुंच गया भाजपा-कांग्रे का एफआईआर-एफआईआर का खेल शुरू उत्तराखंड में कांग्रेस, कर्नाटक में भाजपा पर एफआईआर एफआईआरकृसियासत ने भौगोलिक सीमाएं भी तो तोड़ दी देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में शुरू हुआ शुद्धिकरण विवाद अब एफआईआर की राजनीति का ऐसा चक्र बन गया है, जिसमें उत्तराखंड से निकली राजनीतिक गर्मी कर्नाटक तक पहुंच गई है। पहले हल्द्वानी मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर हुई और अब उसी विवाद को लेकर बेंगलुरु पुलिस ने उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समेत अन्य के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज कर दी। यानी एक राज्य में कांग्रेस पर कानूनी कार्रवाई और दूसरे राज्य में भाजपा पर एफआईआरकृसियासत ने भौगोलिक सीमाएं तोड़ दी हैं। राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मामले में शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद हुए कथित धार्मिक अनुष्ठान को लेकर राहुल गांधी ने जातिगत और सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली टिप्पणी की। मामले में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के साथ एससी/एसटी कानून भी लगाया गया। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक दबाव का नतीजा बताया और एफआईआर के विरोध में आंदोलन किया। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए राहुल गांधी पर जाति और भेदभाव की राजनीति करने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी इस मुद्दे पर राहुल गांधी पर पलटवार किया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। एफआईआर का जवाब अब दूसरी एफआईआर से आया है। कांग्रेस से जुड़े एक शिकायतकर्ता की शिकायत पर बेंगलुरु की विधान सौध पुलिस ने उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और पार्टी के अन्य सदस्यों के खिलाफ जीरो एफआईआर दर्ज की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि हल्द्वानी में खरगे की सभा के बाद कथित शुद्धिकरण अनुष्ठान के जरिए जातिगत भेदभाव का संदेश गया। मामला एससी/एसटी कानून समेत संबंधित प्रावधानों के तहत दर्ज किया गया और आगे की कार्रवाई के लिए उत्तराखंड भेजे जाने की बात सामने आई है। अब सवाल यह है कि कानून अपना काम कर रहा है या राजनीति कानून के रास्ते अपना काम कर रही है? कांग्रेस के लिए यह मामला केवल एफआईआर का विरोध नहीं है। पार्टी इसे दलित सम्मान और सामाजिक न्याय के बड़े मुद्दे में बदलना चाहती है। सात सितंबर को कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर बड़े राजनीतिक कार्यक्रम की तैयारी है और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े विवाद को पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के दलित सांसद भी इस मुद्दे पर चर्चा करने वाले हैं। भाजपा की रणनीति भी साफ दिखाई दे रही है। वह राहुल गांधी की टिप्पणी को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को घेरना चाहती है और यह संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस जातिगत राजनीति कर रही है। लेकिन बेंगलुरु की जीरो एफआईआर ने भाजपा को बचाव की मुद्रा में ला दिया है। दिलचस्प यह भी है कि एफआईआर के बाद महेंद्र भट्ट ने अपने पुराने बयान से दूरी बनाते हुए सफाई दी है। उन्होंने कहा कि उनके बयान को संदर्भ से अलग करके पेश किया गया। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो रही हैं। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए यह विवाद राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। कांग्रेस इसे दलित सम्मान, संविधान और सामाजिक बराबरी के सवाल से जोड़ रही है, जबकि भाजपा राहुल गांधी के बयान को निशाना बनाकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रही है। यानी मुद्दा एक, नैरेटिव दो और अब दोनों दलों के पास अपनी-अपनी एफआईआर है। कांग्रेस कह सकती हैकृदेखिए, हमारे नेता पर एफआईआर हुई। भाजपा कह सकती हैकृदेखिए, हमारे प्रदेश अध्यक्ष पर भी एफआईआर कराई गई। लेकिन जनता के सामने असली सवाल इससे बड़ा है। क्या एफआईआर राजनीतिक जवाब का माध्यम बनती जा रही है? लोकतंत्र में एफआईआर का उद्देश्य राजनीतिक हिसाब बराबर करना नहीं, कानून के उल्लंघन की निष्पक्ष जांच शुरू करना होना चाहिए। यदि किसी ने कानून तोड़ा है तो कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वह सत्ता पक्ष का नेता हो या विपक्ष का। लेकिन यदि एफआईआर ही राजनीतिक संघर्ष का अगला हथियार बन जाए तो असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। उत्तराखंड की राजनीति के लिए यह आने वाले चुनाव का संकेत भी है। 2027 की जंग केवल भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं रहने वाली। नैरेटिव, सोशल मीडिया, कानूनी लड़ाई और एफआईआरकृसभी चुनावी हथियार बनते दिखाई दे रहे हैं। हल्द्वानी से निकला विवाद बेंगलुरु तक पहुंच चुका है। अब देखना यह है कि अगली एफआईआर किस राज्य में और किस राजनीतिक चेहरे पर होती है। सवाल यही हैकृक्या यह कानून का राज है या एफआईआर-एफआईआर का नया चुनावी खेल?

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