मंगलवार, 1 सितंबर 2026

हादसे की ‘तारीख’ का इंतजार

अल्मोड़ा के लोधिया में जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ने को मजबूर 200 मासूम अल्मोड़ा के स्कूल का जर्जर भवन कभी भी बन सकता है हादसे का सबब 200 से ज्यादा छात्र-छात्राएं, बारिश के बीच आज सिर्फ 25 पहुंचे स्कूल वर्षों से स्कूल के मरम्मत की गुहार, विभाग आज दिन तक है इससे बेखबर केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा का क्षेत्र, राज्य मंत्री कुंदन लटवाल का भी गृह क्षेत्रकृफिर भी बच्चों की सुरक्षा पर क्यों खामोशी देहरादून। पहाड़ में बारिश कहर बरपा रही है और इसी बारिश के बीच अल्मोड़ा के लोधिया में सरकारी स्कूल की जर्जर इमारत बच्चों के सिर पर सवाल बनकर खड़ी है। नगर से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित राजकीय इंटर कालेज लोधिया का भवन ऐसी हालत में है कि किसी भी समय गंभीर हादसे की आशंका बनी हुई है। विद्यालय में 200 से अधिक बच्चे अध्ययनरत हैं, लेकिन सोमवार को बारिश और भवन की खस्ताहाली के चलते सिर्फ 25 बच्चे ही स्कूल पहुंचे। यह आंकड़ा सिर्फ उपस्थिति रजिस्टर का नंबर नहीं है। यह उस डर की गवाही है, जो अभिभावकों के मन में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बैठ चुका है। सबसे चुभने वाली बात यह है कि भवन की हालत अचानक खराब नहीं हुई। विद्यालय और अभिभावक लंबे समय से इसे दुरुस्त कराने की मांग कर रहे हैं। शिकायतें हुईं, आवाजें उठीं, लेकिन सरकारी तंत्र की नींद नहीं टूटी। अब लगातार बारिश ने जर्जर भवन को और जोखिम भरा बना दिया है। आखिर जिम्मेदार विभाग को किस चीज का इंतजार है? क्या किसी बच्चे के घायल होने का? क्या भवन का कोई हिस्सा गिरने का? या फिर उस दिन का, जब प्रशासन मौके पर पहुंचकर राहत-बचाव की तस्वीरें जारी करे?हादसा होने के बाद कार्रवाई करना प्रशासनिक सफलता नहीं, व्यवस्था की विफलता होगी। जब भवन की स्थिति को लेकर स्कूल और अभिभावक पहले से चेतावनी दे रहे हैं तो फिर समय रहते मरम्मत क्यों नहीं हुई? बारिश शुरू होने के बाद भी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? स्कूल में 200 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन सोमवार को स्कूल पहुंचने वाले बच्चों की संख्या सिर्फ 25 रह गई। बाकी बच्चे कहां हैं? जवाब किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं, बल्कि अभिभावकों के डर में छिपा है, जिस स्कूल की इमारत देखकर माता-पिता अपने बच्चों को घर पर रोकने को मजबूर हो जाएं, वहां शिक्षा व्यवस्था की सफलता के दावे कितने खोखले हैं, यह समझना मुश्किल नहीं। स्कूल बच्चों के लिए ज्ञान का मंदिर होना चाहिए, लेकिन लोधिया में वही भवन बच्चों और अभिभावकों के लिए चिंता का कारण बन गया है। लोधिया कोई ऐसा दूरदराज का इलाका नहीं है जहां प्रशासन की नजर पहुंचना मुश्किल हो। यह अल्मोड़ा नगर से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर है और राजनीतिक सवाल इससे भी बड़ा है। यह क्षेत्र केंद्रीय राज्यमंत्री अजय टम्टा से जुड़ा हुआ है। हाल में राज्य मंत्री बने कुंदन लटवाल का घर भी इसी क्षेत्र में बताया जाता है। तो फिर सवाल स्वाभाविक हैकृकि जब सत्ता के इतने करीब होने के बावजूद एक सरकारी स्कूल की इमारत वर्षों से बदहाल है, तब पहाड़ के दूरस्थ गांवों के सरकारी स्कूलों की हालत कौन पूछेगा? क्या जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में बच्चों की सुरक्षा शामिल है? अगर शामिल है तो लोधिया कालेज अब तक क्यों नहीं सुधरा? उत्तराखंड में सरकारी भवनों की बदहाली कोई नई कहानी नहीं है। हर बरसात में स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन और दूसरी सरकारी इमारतें अपनी जर्जर हालत का सच सामने लाती हैं। लोधिया कालेज भी उसी व्यवस्था की तस्वीर बन गया है, जहां शिकायत पहले होती है और कार्रवाई हादसे के बाद। यह सवाल सिर्फ शिक्षा विभाग से नहीं है। प्रशासन, शिक्षा महकमा और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधिकृसभी को जवाब देना होगा कि जब भवन को लेकर लगातार मांग उठ रही थी तो अब तक क्या किया गया? क्या भवन का तकनीकी निरीक्षण हुआ? क्या इसे सुरक्षित घोषित किया गया है? अगर सुरक्षित है तो अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से क्यों डर रहे हैं? अगर असुरक्षित है तो स्कूल में कक्षाएं क्यों चल रही हैं? और सबसे बड़ा सवालकृकि अगर बारिश के बीच भवन गिर गया तो जिम्मेदारी किसकी होगी? सरकारें अक्सर बजट, प्रस्ताव, स्वीकृति और टेंडर की लंबी प्रक्रिया का हवाला देती हैं। लेकिन बच्चों की सुरक्षा किसी फाइल की गति की मोहताज नहीं हो सकती। एक जर्जर स्कूल भवन को ठीक कराने के लिए अगर महीनों-वर्षों लगते हैं, तो सवाल भवन की उम्र का नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है। लोधिया के अभिभावक अपने बच्चों के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं मांग रहे। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके बच्चे जिस स्कूल में पढ़ने जाएं, उसकी छत उनके सिर पर सुरक्षित रहे। बारिश के बीच 200 से ज्यादा बच्चों वाले स्कूल में सिर्फ 25 बच्चों का पहुंचना प्रशासन के लिए खतरे की घंटी होना चाहिए। अब जरूरत निरीक्षण की औपचारिकता की नहीं, तत्काल सुरक्षा व्यवस्था की है। जब तक भवन सुरक्षित नहीं होता, बच्चों के लिए वैकल्पिक कक्षाओं की व्यवस्था हो। भवन की तकनीकी जांच कराई जाए। यदि पुनर्निर्माण आवश्यक है तो प्रक्रिया तत्काल शुरू हो। क्योंकिकृबच्चों की जिंदगी किसी सरकारी फाइल से छोटी नहीं है और लोधिया के अभिभावक अब यह सवाल पूछ रहे हैं।

कोई टिप्पणी नहीं: