मंगलवार, 8 सितंबर 2026
चुनाव ‘पास’ और मुद्दे ‘गायब’
उत्तराखंड में पलायन और सड़कों पर भारी पड़ा मंच शुद्धिकरण का शोर
भाजपा और कांग्रेस की जंग में जनता के असली सवाल हो गए अशुद्ध
रोजगार, पलायन, आपदा, स्वास्थ्य और पहाड़ की बदहाली पर खामोशी
देहरादून। उत्तराखंड चुनावी मोड में पहुंच चुका है और सियासत का पारा चढ़ने लगा है। लेकिन प्रदेश की राजनीति में इस वक्त जिस मुद्दे ने सबसे ज्यादा जगह घेर रखी है, वह रोजगार नहीं, पलायन नहीं, अस्पताल नहीं, सड़क नहीं और आपदा नहींकृबल्कि शुद्धिकरण है। हल्द्वानी में कथित मंच शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस जिस तरह आमने-सामने हैं, उससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा हैकृकि क्या उत्तराखंड के असली मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए अब इतने छोटे हो गए हैं कि उन्हें चुनावी शोर में दबाया जा सके? एक तरफ कांग्रेस इस घटनाक्रम को सामाजिक सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर सरकार पर हमला बोल रही है।
दूसरी तरफ भाजपा कांग्रेस पर विवाद को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगा रही है। बयान पर बयान, प्रदर्शन पर प्रदर्शन और पलटवार पर पलटवार जारी है। यानी चुनावी मैदान तैयार हो रहा है और दोनों दलों के पास एक-दूसरे को घेरने के लिए नया हथियार भी मिल गया है। लेकिन इसी बीच पहाड़ का वह युवा कहां है जो नौकरी की तलाश में देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ या मुंबई जाने को मजबूर है? वह किसान कहां है जिसे अपनी उपज का उचित बाजार चाहिए? वह पहाड़ी परिवार कहां है जिसके गांव में अस्पताल तो दूर, डॉक्टर तक नियमित नहीं पहुंचता? वह आपदा प्रभावित परिवार कहां है जिसका घर बरसात में उजड़ जाता है और मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?इन सवालों का शुद्धिकरण की राजनीति में जवाब नहीं है।
उत्तराखंड की राजनीति का यह सबसे बड़ा विरोधाभास है। चुनाव करीब आते ही राजनीतिक दल जनता की भावनाओं से जुड़े प्रतीकों और विवादों को तेजी से पकड़ लेते हैं। कारण साफ हैकृऐसे मुद्दे तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं, समर्थकों को लामबंद करते हैं और सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक आसानी से दिखाई देते हैं। इसके मुकाबले बेरोजगारी पर बहस कठिन है। पलायन पर बहस में आंकड़े चाहिए। स्वास्थ्य व्यवस्था पर सरकार और विपक्ष दोनों को अपना रिकॉर्ड सामने रखना पड़ेगा। स्कूलों की स्थिति पर सवाल उठेंगे तो घोषणाओं और जमीन की हकीकत का फर्क सामने आएगा। आपदा प्रबंधन पर सवाल होंगे तो हर साल बारिश में होने वाली तबाही का हिसाब देना पड़ेगा। इसलिए शायद शुद्धिकरण पर लड़ना आसान है और व्यवस्था के शुद्धिकरण पर बहस करना मुश्किल।
सत्तारूढ़ भाजपा के लिए यह केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का मामला नहीं है। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने शासन का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखने की है। सरकार को बताना होगा कि रोजगार के मोर्चे पर पिछले वर्षों में कितने स्थायी अवसर बने। कितने युवाओं को पहाड़ में ही रोजगार मिला। पलायन प्रभावित गांवों की तस्वीर कितनी बदली। स्वास्थ्य सुविधाओं में कितना सुधार हुआ। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और शिक्षा की स्थिति कितनी बेहतर हुई। सिर्फ योजनाओं की घोषणा से चुनाव नहीं जीता जाता। जनता अब घोषणा नहीं, परिणाम पूछेगी। भाजपा यदि हर विवाद को कांग्रेस की राजनीति बताकर खारिज करती है तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जनता के मूल सवालों से उसका संवाद मजबूत रहे।
विपक्षी कांग्रेस के लिए भी रास्ता आसान नहीं है। सरकार को घेरने के लिए मुद्दा उठाना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह शुद्धिकरण विवाद से आगे निकलकर अपना व्यापक राजनीतिक एजेंडा जनता के सामने रख पाएगी? कांग्रेस को बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह रोजगार कैसे पैदा करेगी। पलायन रोकने के लिए उसकी नीति क्या होगी। पहाड़ की अर्थव्यवस्था को किस माडल से मजबूत करेगी। स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में क्या बदलेगा। सिर्फ भाजपा विरोध चुनावी विकल्प नहीं बनाता, विकल्प के लिए अपना रोडमैप भी चाहिए। यही वह जगह है जहां कांग्रेस को भावनात्मक मुद्दों के साथ ठोस नीतिगत मुद्दों को भी बराबर ताकत से उठाना होगा।
दरअसल यह विवाद सिर्फ एक मंच या शुद्धिकरण तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 2027 की चुनावी राजनीति में नैरेटिव पर कब्जे की लड़ाई दिखाई दे रही है। भाजपा चाहती है कि चुनावी चर्चा सरकार के काम, विकास योजनाओं और उसके संगठनात्मक प्रदर्शन के इर्द-गिर्द रहे। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के जरिए धार देना चाहती है। दोनों दलों को पता है कि चुनाव केवल आंकड़ों से नहीं, धारणा से भी जीते जाते हैं। यही कारण है कि आने वाले महीनों में ऐसे विवादों की संख्या बढ़ सकती है जो राजनीतिक रूप से तुरंत असर पैदा करते हैं।लेकिन इस नैरेटिव की राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान तब होगा, जब जनता के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाएंगे।
राजनीतिक दल एक-दूसरे के मंचों और कार्यक्रमों की शुद्धता पर सवाल उठा रहे हैं। मगर उत्तराखंड की जनता इससे बड़ा सवाल पूछ सकती हैकृकि राजनीति का शुद्धिकरण कब होगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई कब होगी? भर्ती परीक्षाओं पर भरोसा कब मजबूत होगा? पहाड़ से पलायन कब रुकेगा? सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टर कब मिलेंगे?दूरस्थ गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कब पहुंचेगी? बरसात में हर साल सड़कें टूटने और गांवों के अलग-थलग पड़ने का स्थायी समाधान कब होगा? और सबसे बड़ा सवालकृ कि जिस पहाड़ को बचाने के नाम पर हर चुनाव में राजनीति होती है, उस पहाड़ में रहने वाले युवाओं का भविष्य कौन बचाएगा?
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सबसे बड़ा सवाल
भाजपा और कांग्रेस चाहे जितनी जोर से एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ें, लोकतंत्र में जनता को यह अधिकार है कि वह दोनों से पूछेकृआपकी लड़ाई किसके लिए है?यदि लड़ाई केवल एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए है तो जनता के सवाल फिर अनुत्तरित रह जाएंगे। उत्तराखंड को ऐसी राजनीति चाहिए जो मंच के शुद्धिकरण से आगे बढ़कर व्यवस्था के शुद्धिकरण की बात करे। ऐसी राजनीति चाहिए जो धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विवादों पर अपनी राय रखे, लेकिन साथ ही रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा जैसे सवालों से आंख न चुराए। क्योंकि चुनाव मंच कौन साफ करता है, इस पर नहींकृप्रदेश की व्यवस्था कौन साफ करेगा, इस पर होना चाहिए। और अगर भाजपा-कांग्रेस की सियासी जंग में जनता के सवाल ही गायब हो जाएं, तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है।
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