मंगलवार, 8 सितंबर 2026

चुनावी हुंकार से पहले ‘म्यान’ से निकलीं तलवारें

हल्द्वानी शुद्धिकरण पर सामाजिक अस्मिता बनाम देवभूमि की साख की जंग बार-बार नकारे जाने से बौखलाई कांग्रेस, देवभूमि को बदनाम करने में जुटी भाजपा का पलटवारकृदलितों की नहीं, युवराज के झूठ को सच साबित करने की देहरादून। उत्तराखंड में 2027 की चुनावी जंग अभी औपचारिक रूप से शुरू भी नहीं हुई, लेकिन सियासी तलवारें म्यान से बाहर आ चुकी हैं। हल्द्वानी के कथित मंच शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच शुरू हुआ विवाद अब सीधे सियासी प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल गया है। कांग्रेस सड़क पर है तो भाजपा बयानबाजी के मोर्चे पर। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और दलित अस्मिता से जोड़ रही है, वहीं भाजपा ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया है कि बार-बार जनता द्वारा नकारे जाने से बौखलाई पार्टी देवभूमि को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। भाजपा ने कांग्रेस पर हमला और तीखा करते हुए कहा कि कांग्रेस को दलितों के सम्मान की चिंता नहीं, बल्कि अपने युवराज के कथित झूठ को सच साबित करने की चिंता है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस एक विवाद को राजनीतिक हथियार बनाकर उत्तराखंड के सामाजिक सौहार्द और देवभूमि की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रही है। यानी चुनावी मौसम आने से पहले ही उत्तराखंड में शुद्धिकरण बनाम राजनीतिक शुद्धता की नई जंग छिड़ गई है और इस जंग में सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों प्रमुख दल एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने में इतने व्यस्त हैं कि प्रदेश के असली सवालों की आवाज लगातार धीमी पड़ती जा रही है। भाजपा ने कांग्रेस के आंदोलन और उसके नेताओं के बयानों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस को वास्तव में दलित समाज के सम्मान की चिंता है तो उसे राजनीतिक तमाशे के बजाय तथ्यों और कानून की प्रक्रिया पर भरोसा करना चाहिए। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस पूरे घटनाक्रम को अपनी राजनीतिक जरूरत के मुताबिक पेश कर रही है। पार्टी ने कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि विपक्ष को उत्तराखंड की जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर बात करने के बजाय ऐसा विषय मिल गया है, जिसके जरिए भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा सकती है। भाजपा के निशाने पर कांग्रेस नेतृत्व भी है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अपने शीर्ष नेतृत्व के कथित दावों को उत्तराखंड की घटना के सहारे सही साबित करने की कोशिश कर रही है। भाजपा का सीधा संदेशकृकांग्रेस को जनता ने नकार दिया है, इसलिए अब वह विवादों में राजनीतिक जमीन तलाश रही है। दूसरी ओर कांग्रेस इस मुद्दे को हाथ से जाने देने के मूड में नहीं है। पार्टी इसे केवल एक स्थानीय विवाद मानने के बजाय सामाजिक सम्मान और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर सरकार पर दबाव बना रही है। कांग्रेस का तर्क है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय के सम्मान से जुड़ा सवाल उठाना राजनीति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। पार्टी सरकार से पूरे मामले पर जवाब और कार्रवाई की मांग कर रही है। कांग्रेस का आंदोलन इस बात का संकेत भी है कि पार्टी आगामी चुनाव से पहले सामाजिक मुद्दों को राजनीतिक लामबंदी के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है। यहीं से भाजपा और कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई देती है। भाजपाकृकांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक षड्यंत्र बताकर खारिज करना चाहती है। कांग्रेसकृइसी विवाद को सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक अभियान में बदलना चाहती है। लेकिन असली सवाल कहीं और है...। हल्द्वानी का विवाद राजनीतिक मंच पर जितना बड़ा हो गया है, उतना ही बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड के बाकी मुद्दे इसी शोर में दब जाएंगे? प्रदेश का बेरोजगार युवा नौकरी मांग रहा है। पहाड़ का गांव पलायन से खाली हो रहा है। बरसात में सड़कें टूट रही हैं। आपदा प्रभावित परिवार राहत और पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी चुनौती हैं। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं। कृषि और बागवानी से जुड़े लोग बाजार और बेहतर आय की मांग कर रहे हैं। महिलाएं स्थानीय स्तर पर रोजगार और सुरक्षित आजीविका चाहती हैं। लेकिन राजनीतिक मंच पर इस वक्त सबसे तेज आवाज किसकी है?कृशुद्धिकरण विवाद की। यही वह बिंदु है जहां जनता और राजनीति के बीच दूरी दिखाई देती है। 2027 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनने जा रहा है। भाजपा सत्ता में वापसी के लिए अपना रिकार्ड और संगठन सामने रखेगी, जबकि कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करेगी। ऐसे में कोई भी ऐसा मुद्दा जो भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा कर सके, राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। शुद्धिकरण विवाद भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। कांग्रेस के लिए यह सरकार को घेरने का अवसर है। भाजपा के लिए कांग्रेस पर हमला करने का अवसर। लेकिन जनता के लिए? जनता के लिए सवाल यह है कि इससे उसके जीवन में क्या बदलेगा? क्या इससे रोजगार आएगा? क्या पलायन रुकेगा? क्या गांव में डाक्टर पहुंचेगा? क्या बरसात में सड़क बंद नहीं होगी? क्या युवाओं को घर के पास काम मिलेगा? इन सवालों का जवाब न भाजपा के आरोप में है, न कांग्रेस के आंदोलन में। भाजपा ने जहां इसे देवभूमि की छवि से जोड़ दिया है, वहीं कांग्रेस इसे दलित सम्मान के सवाल के रूप में देख रही है। दोनों दलों के अपने राजनीतिक तर्क हैं। लेकिन यही वह जगह है जहां राजनीतिक बहस को सावधानी की जरूरत है। किसी घटना की जांच, दोष तय करना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना अलग बात है। उसे चुनावी ध्रुवीकरण का हथियार बनाना अलग। उत्तराखंड की सामाजिक संरचना बेहद संवेदनशील है। इसलिए राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी बड़ी है। आरोप लगाना आसान है, सामाजिक भरोसा बचाना मुश्किल। शुद्धिकरण विवाद ने एक और संकेत दे दिया हैकृ2027 का चुनाव केवल विकास के आंकड़ों की लड़ाई नहीं होगा। यह नैरेटिव की लड़ाई भी होगा। कौन जनता को यह समझाने में सफल होता है कि उसके सामने सबसे बड़ा खतरा क्या है? कौन यह साबित करता है कि असली मुद्दा क्या है? कौन विरोधी दल को जनता के सवालों से भटका हुआ साबित करता है? और कौन अपने पक्ष में सामाजिक समीकरण खड़ा करता है? यही आने वाले महीनों की राजनीति का केंद्रीय खेल होगा। भाजपा कांग्रेस को नकारात्मक और विवाद की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में पेश करेगी। कांग्रेस भाजपा को सत्ता के अहंकार और सामाजिक संवेदनशीलता की अनदेखी करने वाली सरकार के रूप में घेरने की कोशिश करेगी। यानी असली चुनाव से पहले ही किसका नैरेटिव चलेगा की लड़ाई शुरू हो चुकी है।

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