गुरुवार, 24 सितंबर 2026
उत्तराखंड में चुनावी उल्टी गिनती शुरू
मिशन-2027 के लिए बूथ तक पहुंच गई है भाजपा
कांग्रेस ने भी तेज की सरकार को घेरने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव-2027 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। चुनाव आयोग की घोषणा अभी बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी मौसम दस्तक दे चुका है। सत्ता की हैट्रिक के लक्ष्य के साथ भाजपा संगठन को बूथ से लेकर घर तक सक्रिय करने में जुटी है, तो कांग्रेस सरकार के कामकाज, बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था और जनसरोकारों के मुद्दों को लेकर मैदान तैयार कर रही है। विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मार्च 2027 में पूरा होना है। सामान्य चुनावी कार्यक्रम के हिसाब से इससे पहले मतदान होना है। फिलहाल समय से पहले चुनाव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में आने वाले महीने दोनों प्रमुख दलों के लिए संगठन, मुद्दों और उम्मीदवारों की जमीन तैयार करने के लिहाज से निर्णायक होंगे।
भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। पार्टी ने बूथ सशक्तीकरण, शक्ति केंद्रों की बैठक और घर-घर संपर्क जैसे कार्यक्रमों को गति दी है। सितंबर में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरे के दौरान भी संगठन और आगामी चुनाव की रणनीति पर मंथन हुआ। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने का नहीं, बल्कि सत्ता में लगातार दो कार्यकाल के बाद स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली नाराजगी और अपेक्षाओं को साधने का भी होगा। पार्टी विकास, सांस्कृतिक पहचान और सरकार के फैसलों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब चुनावी तैयारी को गति दे रही है। प्रदेश संगठन को मजबूत करने, मोर्चों और विभागों को सक्रिय करने तथा राज्यभर में जनसंपर्क बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, महिला सुरक्षा और सरकार के कामकाज को प्रमुख मुद्दों के रूप में उठा रहा है।
राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के प्रस्तावित दौरों से भी कांग्रेस चुनावी माहौल को गर्म करने की तैयारी में है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि सरकार विरोधी मुद्दों को केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित न रखते हुए उन्हें बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेतृत्व के साथ किस तरह जोड़ा जाए। 2027 का चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष की पारंपरिक लड़ाई तक सीमित रहने के संकेत नहीं दे रहा। उत्तराखंड में भू-कानून, मूल निवास, पलायन, रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, महिला सुरक्षा, चारधाम और पर्यटन, ग्रामीण सड़कें, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा राज्य की सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दे पहले ही राजनीतिक विमर्श में जगह बना चुके हैं। हल्द्वानी रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ विवाद भी राजनीतिक टकराव का हिस्सा बन चुका है। इस मुद्दे को लेकर दोनों दलों की अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आई हैं।
भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई के बावजूद क्षेत्रीय और छोटे दलों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड क्रांति दल समेत अन्य राजनीतिक संगठन अपने-अपने मुद्दों के साथ चुनावी जमीन तलाश रहे हैं। कई सीटों पर तीसरे विकल्प की मौजूदगी मुकाबले का गणित प्रभावित कर सकती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएगा, टिकटों को लेकर दलों के भीतर दावेदारियों का दबाव बढ़ेगा। मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति, जातीय-सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय असंतोष और जीत-हार का पिछला रिकार्ड टिकट वितरण में महत्वपूर्ण कारक बन सकते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ और मैदान का संतुलन हमेशा अहम रहा है। कुमाऊं और गढ़वाल के साथ मैदानी जिलों की राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं। ऐसे में कोई भी दल केवल राज्यव्यापी नारे के सहारे चुनावी गणित नहीं साध सकता।
चुनावी शंखनाद चाहे दल कर रहे हों, अंतिम फैसला मतदाता को करना है। आने वाले महीनों में राजनीतिक दल अपने-अपने दावे जनता के सामने रखेंगे। भाजपा अपने कार्यकाल और नीतियों का हिसाब देगी, कांग्रेस सरकार की कमियां गिनाएगी और क्षेत्रीय दल अपने मुद्दों को केंद्र में लाने की कोशिश करेंगे। अब उत्तराखंड की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू हो चुका हैकृदावों से ज्यादा उनके प्रमाण, नारों से ज्यादा जमीन पर काम और आरोपों से ज्यादा जनता के सवालों का जवाब। 2027 का चुनाव अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन उसकी राजनीतिक घड़ी चल पड़ी है। अब हर बूथ पर सवाल होगा, हर सीट पर गणित होगा और हर दल को अपने दावों का हिसाब जनता के सामने रखना होगा।
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