शनिवार, 19 सितंबर 2026

फर्जीवाड़े की ‘डाक्टरी’ पर सरकारी मुहर

स्वतंत्रता सेनानियों के हक पर डाका, सोता रहा तंत्र एक हफ्ते की मियाद या लीपापोती की है नई तैयारी चार अभ्यर्थियों के एमबीबीएस दाखिले पहले ही निरस्त देहरादून। उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के तहत एमबीबीएस दाखिलों में कथित फर्जी प्रमाणपत्रों का मामला अब सीमित संख्या में सामने आए मामलों से कहीं बड़ा होता दिखाई दे रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता प्रदीप बहुगुणा ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल को 370 संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची सौंपते हुए उनके स्थायी निवास, शैक्षणिक अभिलेख और आरक्षण से जुड़े प्रमाणपत्रों की व्यापक जांच की मांग की है। मंत्री ने जिलाधिकारियों से एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट तलब की है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि शुरुआती जांच में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के प्रमाणपत्रों में गड़बड़ी पाए जाने के बाद चार एमबीबीएस दाखिले निरस्त किए जा चुके हैं। प्रशासन की जांच में जिस स्वतंत्रता सेनानी के नाम का प्रमाणपत्र लगाया गया था, उसका नाम संबंधित सरकारी पंजिका में नहीं मिला। आवेदन में दिए गए पतों की स्थलीय जांच में भी कई विसंगतियां सामने आईं। जांच के दौरान एक ही स्वतंत्रता सेनानी धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का इस्तेमाल कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों में किए जाने का मामला सामने आया। प्रशासनिक जांच में संबंधित नाम सरकारी अभिलेखों में नहीं मिलने और आवेदकों के बताए पतों पर परिवार के नहीं पाए जाने जैसी बातें सामने आईं। शपथपत्रों और पारिवारिक विवरणों में भी विसंगतियां दर्ज की गईं। इसके बाद चारों प्रमाणपत्र निरस्त किए गए और एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने इनके आधार पर हुए एमबीबीएस दाखिले भी रद्द कर दिए। संबंधित प्रकरण में पुलिस मुकदमा भी दर्ज किया गया है। नए स्तर पर सामने आई 370 अभ्यर्थियों की सूची ने जांच का दायरा काफी बढ़ा दिया है। शिकायतकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि सूची में शामिल कुछ अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड के बाहर के राज्यों में पढ़ाई की, इसके बावजूद उन्होंने उत्तराखंड का स्थायी निवास और स्वतंत्रता सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र किस आधार पर हासिल किया। हालांकि सूची में शामिल प्रत्येक व्यक्ति को संदिग्ध या दोषी मानना उचित नहीं होगा। 370 नाम जांच का विषय हैं, दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं। इसलिए अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती निष्पक्ष और दस्तावेज-आधारित सत्यापन की है। मामले की पुलिस जांच में अब आनलाइन आवेदन प्रक्रिया का डिजिटल रिकार्ड महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आवेदन से लेकर प्रमाणपत्र अपलोड करने और स्वीकृति तक की प्रक्रिया का रिकार्ड उपलब्ध होने के कारण यह पता लगाया जा सकता है कि दस्तावेज किस स्तर पर प्रस्तुत हुए और किन अधिकारियों अथवा स्तरों से उनका सत्यापन किया गया। यही जांच का सबसे अहम बिंदु है। यदि कहीं फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, तो केवल लाभ लेने वाले अभ्यर्थी तक जांच सीमित रखने के बजाय यह भी देखना होगा कि प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की सरकारी प्रक्रिया में कहां चूक हुई। चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग को संदिग्ध दस्तावेज मिलने पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब 370 नामों की जांच में प्रशासन को यह तय करना होगा कि कौन-सा प्रमाणपत्र वास्तविक है, कौन-सा संदिग्ध है और किन मामलों में दस्तावेजों की सत्यता पर कोई प्रश्न नहीं है। यह प्रकरण केवल कुछ एमबीबीएस सीटों का विवाद नहीं है। यदि जांच में बड़े पैमाने पर दस्तावेजी गड़बड़ियां प्रमाणित होती हैं तो इससे प्रमाणपत्र जारी करने, राजस्व अभिलेखों के सत्यापन और चिकित्सा शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था की निगरानी पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जांच पारदर्शी हो और वास्तविक पात्र अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित न हों। स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के लिए निर्धारित अवसर किसी अपात्र व्यक्ति के कारण छिनना भी उतना ही गंभीर विषय है जितना किसी निर्दाेष अभ्यर्थी को बिना पर्याप्त सत्यापन के संदेह के घेरे में रखना। 370 नामों की सूची अब सरकार के लिए केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गई है। जांच रिपोर्ट यह तय करेगी कि मामला कुछ फर्जी प्रमाणपत्रों तक सीमित है या इसके पीछे प्रमाणपत्र जारी करने और सत्यापन की व्यवस्था में कहीं बड़ी खामी मौजूद है।

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