मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
क्षेत्रीय अस्मिता को धार देगा ‘यूकेडी’
राज्य आंदोलन की विरासत और क्षेत्रीय मुद्दों के सहारे खोई जमीन तलाशने में जुटा यूकेडी
वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी के आह्वान से कार्यकर्ताओं में बढ़ा जोश, मिशन 2027 के लिए कसी कमर
सत्ता की जंग में क्षेत्रीय अस्मिता का दांव, भाजपा-कांग्रेस के सामने तीसरी ताकत बनने की चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछने के साथ ही उत्तराखंड क्रांति दल ने भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। राज्य आंदोलन की विरासत और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों को केंद्र में रखकर यूकेडी चुनावी मैदान में अपनी खोई ताकत वापस पाने की तैयारी में जुट गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी ने कार्यकर्ताओं में जोश भरते हुए मिशन 2027 के लिए कमर कसने का आह्वान किया। उनके तेवरों से साफ है कि दल आगामी विधानसभा चुनाव को केवल राजनीतिक भागीदारी नहीं, बल्कि उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति में अपनी निर्णायक वापसी के अवसर के रूप में देख रहा है।
यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा और कांग्रेस के बीच सिमटी प्रदेश की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान को फिर से मजबूत करने की है। राज्य गठन के आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले इस दल के पास क्षेत्रीय मुद्दों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन आंदोलन की ताकत को चुनावी सफलता में बदलना उसके लिए अब तक कठिन रहा है। ऐसे में मिशन 2027 की तैयारी पार्टी के लिए राजनीतिक अस्तित्व, संगठनात्मक मजबूती और जनाधार की परीक्षा भी है।
यूकेडी की राजनीति की बुनियाद उत्तराखंड की अस्मिता, जल-जंगल-जमीन, मूल निवास, भू-कानून, पलायन, बेरोजगारी और पहाड़ों के संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार जैसे मुद्दों पर रही है। पार्टी इन सवालों के जरिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति अपना सकती है। दल का तर्क रहा है कि अलग राज्य की स्थापना के पीछे जिस पहाड़-केंद्रित विकास और स्थानीय हितों की रक्षा का सपना था, वह अब भी पूरी तरह साकार नहीं हो पाया है। प्रदेश में रोजगार, पलायन और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियां क्षेत्रीय दल के लिए राजनीतिक अवसर पैदा करती हैं। लेकिन केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा। यूकेडी को यह भी साबित करना होगा कि उसके पास इन समस्याओं का व्यावहारिक समाधान और उन्हें लागू कराने की राजनीतिक क्षमता है।
काशी सिंह ऐरी यूकेडी के उन वरिष्ठ नेताओं में हैं, जिनकी पहचान उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति और राज्य आंदोलन से जुड़ी रही है। ऐसे में कार्यकर्ताओं के बीच उनका संदेश पार्टी की चुनावी तैयारियों को दिशा देने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। मिशन 2027 में दल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नेतृत्व कार्यकर्ताओं के उत्साह को बूथ स्तर की सक्रियता, जनसंपर्क और मजबूत चुनावी संगठन में कितना बदल पाता है। यूकेडी को अपने पुराने समर्थकों को फिर से जोड़ने के साथ युवाओं और नए मतदाताओं तक भी पहुंच बनानी होगी। पहाड़ के सवालों पर मुखर राजनीति करने वाले युवाओं को संगठन से जोड़ना और स्थानीय मुद्दों को चुनावी अभियान का केंद्र बनाना पार्टी के लिए अहम होगा।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल के सामने सबसे बड़ी बाधा भाजपा और कांग्रेस का मजबूत चुनावी ढांचा है। दोनों राष्ट्रीय दलों के पास संसाधन, संगठन और प्रदेशव्यापी राजनीतिक पहुंच है। इसके मुकाबले यूकेडी को सीमित जनाधार और संगठनात्मक कमजोरियों से पार पाना होगा। दल के लिए चुनौती यह भी है कि क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों पर राजनीतिक समर्थन को वोटों में कैसे बदला जाए। मतदाता यदि स्थानीय समस्याओं पर यूकेडी की बातों से सहमत भी हों, तब भी चुनाव में जीत की संभावना, प्रत्याशी की मजबूती और सत्ता में भागीदारी जैसे सवाल उनके निर्णय को प्रभावित करते हैं।
ऐसे में यूकेडी को स्पष्ट चुनावी रणनीति, मजबूत उम्मीदवारों और सीटवार तैयारी पर ध्यान देना होगा। यदि पार्टी केवल भाजपा-कांग्रेस विरोध तक सीमित रहती है, तो उसके सामने प्रभावी तीसरी ताकत बनने की राह कठिन रहेगी। यूकेडी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव महज सीटें हासिल करने का अवसर नहीं, बल्कि यह साबित करने की लड़ाई भी है कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय सवालों की प्रासंगिकता अब भी कायम है। काशी सिंह ऐरी का कार्यकर्ताओं में जोश भरना इसी राजनीतिक तैयारी का हिस्सा है। हालांकि, चुनावी परिणामों पर असर डालने के लिए इस उत्साह को ठोस संगठनात्मक काम में बदलना जरूरी होगा। सवाल यही है कि क्या यूकेडी 2027 में राज्य आंदोलन की विरासत को चुनावी ताकत में बदल पाएगा, या फिर क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे भाजपा-कांग्रेस की सियासी जंग के बीच ही सीमित रह जाएंगे? इसका जवाब पार्टी की घोषणाओं से अधिक उसके संगठन, जनसंपर्क और चुनावी मैदान में प्रदर्शन से तय होगा।
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