गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026
udaydinmaan: गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’
udaydinmaan: गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’: डीएवी कालेज प्रकरण में एफआईआर के बाद भी यूपीएल फाइनल में प्रस्तुति का फैसला सवालों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकता,स्थानीय कलाकारों क...
गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’
डीएवी कालेज प्रकरण में एफआईआर के बाद भी यूपीएल फाइनल में प्रस्तुति का फैसला
सवालों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकता,स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की मांग
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में मंच की मर्यादा और स्थानीय कलाकारों के सम्मान को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। अप्रैल में देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में मंच से कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल को लेकर विवादों में आए हरियाणवी गायक मासूम शर्मा को अब उत्तराखंड प्रीमियर लीग के ग्रैंड फिनाले में दोबारा प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। रायपुर स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में होने वाले समापन समारोह में मासूम शर्मा की प्रस्तुति प्रस्तावित है।
मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि डीएवी पीजी कालेज के अप्रैल के कार्यक्रम में कथित आपत्तिजनक भाषा के मामले में डालनवाला कोतवाली में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी और गायक को बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस भी जारी किया था। बाद में शर्मा ने अपने व्यवहार के लिए सार्वजनिक रूप से खेद जताया था। अब सवाल यह है कि जब उसी प्रकरण की गूंज अभी पूरी तरह थमी भी नहीं थी, तो प्रदेश के इतने बड़े सार्वजनिक आयोजन के लिए उन्हीं कलाकार का चयन कैसे हुआ? कांग्रेस समेत विभिन्न संगठनों ने आयोजन समिति और सरकार से इस चयन की प्रक्रिया तथा पूर्व विवाद की समीक्षा को लेकर सवाल किए हैं। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष लालचंद शर्मा ने भी पूछा कि विवाद के बावजूद यूपीएल फाइनल में उन्हें मंच देने का निर्णय क्यों लिया गया और क्या कलाकारों के चयन को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं।
विवाद का दूसरा पहलू उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों से जुड़ा है। गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा के साथ प्रदेश में नई पीढ़ी के अनेक गायक, वादक और संगीत समूह लगातार काम कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रदेश के बड़े सार्वजनिक मंचों पर स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता कितनी मिल रही है। मूल निवास और भू-कानून संघर्ष समिति ने भी यही मुद्दा उठाते हुए कहा कि उसका विरोध किसी बाहरी कलाकार से नहीं, बल्कि मंच पर अश्लीलता, गाली-गलौज और आपत्तिजनक भाषा से है। समिति ने सीएयू के साथ बातचीत में भविष्य के आयोजनों में उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की शर्त रखी।
कार्यक्रम को लेकर विरोध के बीच क्रिकेट एसोसिएशन आफ उत्तराखंड की ओर से बताया गया कि कलाकार को कार्यक्रम का आधा भुगतान पहले ही किया जा चुका है, इसलिए इस समय कार्यक्रम रद्द करना संभव नहीं है। बातचीत के बाद यह सहमति बनी कि मासूम शर्मा मंच से उत्तराखंड की जनता से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेंगे और भविष्य में आपत्तिजनक भाषा अथवा फूहड़ प्रस्तुति नहीं करने की बात स्पष्ट करेंगे। उत्तराखंड क्रांति दल ने हालांकि कार्यक्रम रद्द कर स्थानीय कलाकारों को अवसर देने की मांग की है। दल ने कार्यक्रम रद्द नहीं होने की स्थिति में स्टेडियम के बाहर विरोध की चेतावनी भी दी है। पुलिस ने भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की बात कही है।
पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तराखंड के बड़े मंचों पर कलाकारों के चयन का कोई सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड होना चाहिए? कलाकार किसी भी प्रदेश का हो सकता है और देशभर के कलाकारों का उत्तराखंड में स्वागत भी होना चाहिए, लेकिन स्थानीय प्रतिभाओं को लगातार हाशिये पर रखकर बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता देने की शिकायत लंबे समय से सामने आती रही है।
देवभूमि की पहचान केवल पर्यटन और क्रिकेट तक सीमित नहीं है। यहां की पहचान उसकी लोकभाषाओं, लोकधुनों, परंपराओं और उन कलाकारों से भी बनती है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद पहाड़ की संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाया है। इसलिए सवाल मासूम शर्मा के कार्यक्रम से आगे बढ़कर उत्तराखंड की सांस्कृतिक नीति और आयोजकों की प्राथमिकताओं का भी है। बड़े मंचों पर बाहर से आने वाले कलाकारों का स्वागत हो, लेकिन क्या उसी मंच पर पहाड़ की अपनी आवाज को भी उतनी ही जगह मिलेगीकृयह सवाल अब उत्तराखंड के कलाकारों और सांस्कृतिक जगत के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल,भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
भाजपा बोलीकृनकारात्मक नैरेटिव से कांग्रेस की हताशा उजागर
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा मजबूत करने की आज जरूरत
कांग्रेस के आरोपों को बताया है राजनीतिक रणनीति का हिस्सा
देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सियासी घमासान तेज होता दिखाई दे रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का माहौल बनाने और नकारात्मक नैरेटिव को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल खड़े करना राजनीतिक असहमति से आगे की बात है और इससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस को चुनावी मुद्दों पर जनता के बीच जाना चाहिए, लेकिन इसके बजाय वह चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सवाल खड़े कर रही है। पार्टी के मुताबिक, संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का अधिकार सभी राजनीतिक दलों को है, लेकिन आरोपों के साथ ठोस तथ्य और प्रमाण भी सामने रखे जाने चाहिए।
भाजपा का यह हमला ऐसे समय में आया है, जब मतदाता सूची, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी पारदर्शिता और मताधिकार से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रही है। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की भूमिका चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की है। ऐसे में बिना ठोस आधार के लगातार अविश्वास का वातावरण बनाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे पर असर पड़ सकता है। पार्टी ने कांग्रेस से आरोपों के बजाय तथ्य सामने रखने को कहा है।
हालांकि, कांग्रेस का पक्ष इससे अलग है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और निर्वाचन व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाना लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी प्रक्रिया में उसे कोई आपत्ति दिखाई देती है तो उसे सार्वजनिक करना संवैधानिक अधिकार है। कांग्रेस इसे संस्थाओं के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बताती रही है। यही विरोधाभास अब उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। भाजपा इसे कांग्रेस की हताशा और नकारात्मक राजनीति के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक निगरानी और चुनावी पारदर्शिता का प्रश्न बता रही है।
विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ सकता है। खासतौर पर मतदाता सूची और एसआईआर जैसे मुद्दे यदि चुनावी बहस के केंद्र में आते हैं तो दोनों दलों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है। ऐसे में असली कसौटी यही होगी कि आरोपों और राजनीतिक दावों के बीच तथ्य कितने स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखे जाते हैं।
युवाओं में राष्ट्रवादी विचारों की मजबूती का संकेत
भाजपा ने युवाओं के रुझान को बताया बदलती राजनीतिक सोच का संकेत
प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर विपक्ष के सामने बढ़ी चुनौती
इसे चुनावी समर्थन का सीधा संकेत मानना राजनीतिक दलों के लिए जल्दबाजी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसी बीच युवाओं के बीच राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विचारों की स्वीकार्यता को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा इसे युवाओं में राष्ट्रवादी विचारों की मजबूती का संकेत मान रही है और इसे आगामी विधानसभा चुनाव के लिहाज से महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के रूप में देख रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि आज का युवा केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की वैश्विक भूमिका, सेना, सीमांत क्षेत्रों और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर भी अपनी राय रखता है। पार्टी के मुताबिक युवाओं में इन विषयों को लेकर बढ़ती रुचि उसके लिए सकारात्मक संकेत है।
उत्तराखंड के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी का सामाजिक और आर्थिक संबंध सेना तथा पूर्व सैनिक परिवारों से जुड़ा रहा है। सीमांत जिलों की भौगोलिक परिस्थितियां और सैन्य परंपरा भी राष्ट्र और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को यहां विशेष महत्व देती हैं। भाजपा इसी सामाजिक पृष्ठभूमि को अपनी राजनीतिक संवाद रणनीति से जोड़ रही है। हालांकि, युवाओं की राजनीतिक प्राथमिकताएं केवल राष्ट्रवाद तक सीमित नहीं हैं। रोजगार, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, शिक्षा, पलायन, कौशल विकास और स्थानीय स्तर पर अवसर जैसे मुद्दे भी उत्तराखंड के युवा मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए युवाओं के बीच राष्ट्रवादी विचारों की मौजूदगी को चुनावी समर्थन का सीधा संकेत मानना राजनीतिक दलों के लिए जल्दबाजी होगी।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल युवाओं के सवालों को रोजगार और आर्थिक अवसरों से जोड़कर सरकार को घेरते रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि राष्ट्र निर्माण की चर्चा के साथ युवाओं को रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर भविष्य के अवसर भी चाहिए। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के बीच राजनीतिक विमर्श का स्वरूप महत्वपूर्ण होगा। राष्ट्रवाद बनाम रोजगार जैसी सरल राजनीतिक तस्वीर से आगे युवाओं के सामने कई मुद्दे एक साथ मौजूद हैं। भाजपा राष्ट्रवादी विमर्श को मजबूत करने की कोशिश करेगी, जबकि विपक्ष रोजगार, शिक्षा और सरकार के प्रदर्शन से जुड़े सवालों को प्रमुखता देने की रणनीति अपना सकता है।
उत्तराखंड में युवा मतदाता किस मुद्दे को कितना महत्व देता है, इसका आकलन केवल राजनीतिक दलों के दावों से नहीं, बल्कि चुनावी आंकड़ों और जमीनी रुझानों से ही संभव होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि युवाओं को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति तेज हो गई है और राष्ट्रवाद भी इस राजनीतिक संवाद का एक प्रमुख हिस्सा बनता जा रहा है।
फिर नीट-यूजी पर सियासी घमासान
विधायक विनोद चमोली ने यशपाल आर्य के आरोपों पर किया पलटवार
भाजपा विधायक बोलेकृव्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले तथ्य सामने रखें
बोले-प्रदेश सरकार ने शिकायत मिलते ही जांच का दायरा भी बढ़ा दिया
देहरादून। उत्तराखंड में नीट-यूजी काउंसलिंग के दौरान प्रमाणपत्रों की सत्यता को लेकर सामने आए मामलों ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के आरोपों पर भाजपा प्रदेश प्रवक्ता एवं वरिष्ठ विधायक विनोद चमोली ने पलटवार करते हुए कांग्रेस पर मुद्दे को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया।
दरअसल, नीट-यूजी 2026 की राज्य काउंसलिंग में फर्जी अथवा संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर मेडिकल सीट हासिल करने के मामले सामने आने के बाद जांच और कार्रवाई का सिलसिला जारी है। हाल में 12 और अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने पर उनके सीट आवंटन निरस्त किए गए। विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि सत्यापन प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने सरकार की कार्यप्रणाली और प्रवेश प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के आरोपों के जवाब में चमोली ने कहा कि यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी सामने आती है तो उसकी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से पहले तथ्यों को सामने रखना जरूरी है।
भाजपा का तर्क है कि सरकार ने शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि मामले सामने आते ही जांच के निर्देश दिए और प्रमाणपत्रों के सत्यापन का दायरा बढ़ाया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सभी आरक्षित श्रेणियों से जुड़े प्रमाणपत्रों की जांच के निर्देश दिए थे। शुरुआती जांच में प्रमाणपत्र निरस्त करने के साथ प्रवेश भी रद्द किए गए हैं। चमोली के पलटवार का राजनीतिक संदेश साफ हैकृकि भाजपा इस पूरे प्रकरण को व्यवस्था में सामने आई गड़बड़ी की जांच और दोषियों पर कार्रवाई के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़कर सवाल उठा रही है।
मामले ने इसलिए भी गंभीरता बढ़ा दी है क्योंकि सवाल सिर्फ कुछ अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं है। जांच अब इस बात तक पहुंच रही है कि प्रमाणपत्र जारी करने से लेकर काउंसलिंग में उनके सत्यापन तक कहीं प्रक्रियागत चूक हुई या नहीं। पिछले वर्षों के दाखिलों के रिकॉर्ड की जांच की संभावना भी सामने आई है। ऐसे में नीट-यूजी विवाद अब केवल शिक्षा और चिकित्सा प्रवेश का मुद्दा नहीं रह गया है। विधानसभा चुनाव से पहले यह सरकार की पारदर्शिता बनाम विपक्ष की जवाबदेही की राजनीति का नया अखाड़ा बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में कांग्रेस जहां सरकार से पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही मांग सकती है, वहीं भाजपा कार्रवाई को अपनी सरकार की सख्ती के प्रमाण के तौर पर सामने रख सकती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि फर्जी प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल आखिर किस स्तर पर संभव हुआ और पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी तय होती है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे अब निगाह जांच के निष्कर्ष और कार्रवाई पर रहेगी।
उत्तराखंड में ‘जेन-जी’ मांग रहा है जवाब
रोजगार से लेकर भर्ती और पलायन तक मुद्दों पर मुखर
2027 से पहले राजनीतिक दलों के लिए बढ़ गई चुनौती
हाल के युवा संवाद कार्यक्रमों में यही तस्वीर सामने आई
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में जेन-जी अब केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय पीढ़ी नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण युवा वर्ग बनती दिख रही है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने युवाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ानी शुरू कर दी है। लेकिन जेन-जी का मूड केवल राजनीतिक नारों या नेताओं की अपील तक सीमित दिखाई नहीं देता। रोजगार, पारदर्शी भर्ती, शिक्षा, पलायन, उद्यमिता और डिजिटल अवसर जैसे सवाल उसके राजनीतिक संवाद के केंद्र में हैं। हाल के युवा संवाद कार्यक्रमों में भी यही तस्वीर सामने आई है। मेरे सपनों का उत्तराखंड अभियान के तहत बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और पर्यटन से जुड़े सुझाव दिए। मुख्यमंत्री के साथ हुए संवाद में भी युवाओं ने राज्य के भविष्य को लेकर अपनी प्राथमिकताएं सामने रखीं।
जेन-जी के सामने राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह पीढ़ी केवल भाषण सुनकर संतुष्ट होने वाली नहीं दिखती। वह सवाल पूछती है कि रोजगार कहां है, भर्ती प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, पढ़ाई के बाद अवसर कहां मिलेंगे और पहाड़ में रहने वाले युवाओं के लिए भविष्य की क्या गारंटी है। देशव्यापी युवा सर्वेक्षणों में भी रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को युवाओं की प्रमुख राजनीतिक प्राथमिकताओं में बताया गया है। इससे उत्तराखंड में भी युवा राजनीति को केवल भावनात्मक मुद्दों तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा के अवसरों और भविष्य से जोड़ने की जरूरत सामने आती है।
2026 की प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड में करीब 17 लाख युवा मतदाता हैं और 20 से 29 वर्ष आयु वर्ग की हिस्सेदारी भी महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने की रणनीति पर जोर दे रहे हैं। भाजपा की ओर से युवाओं से संवाद और युवा विद्यार्थी मंथन जैसे कार्यक्रम किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने तीन लाख से अधिक छात्रों से संवाद का कार्यक्रम भी शुरू किया था। वहीं विपक्ष भी युवाओं के बीच रोजगार, भर्ती और शिक्षा जैसे सवालों को प्रमुखता दे रहा है। उत्तराखंड के संदर्भ में युवा सवाल और भी गहरे हैं। पहाड़ से पलायन रोकना है तो रोजगार कहां पैदा होगा? उच्च शिक्षा के बाद युवा राज्य में क्यों रुकेगा? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को पारदर्शी व्यवस्था कैसे मिलेगी? स्थानीय संसाधनों से उद्यमिता के अवसर कैसे बनेंगे?
यही वह सवाल हैं जिनका जवाब चुनावी घोषणा-पत्रों से आगे जमीन पर चाहिए। 2027 की राजनीति में जेन-जी किस दल के साथ जाएगी, इसका निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि उत्तराखंड का युवा अब केवल किसके साथ का सवाल नहीं पूछ रहाकृवह क्यों और क्या मिलेगा का जवाब भी मांग रहा है। यही बदलाव आने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
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