शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

राजधानी में ‘हाईटेक’ शासन, गांवों में नेटवर्क का ‘अकाल’

डिजिटल इंडिया के दावों को मुंह चिढ़ा रहे दून के 170 गांवों में सिग्नल नहीं ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं और आपात सेवाओं का लाभ नहीं ले पा रहे राजधानी में बैठकर तकनीकी विकास की बन रही है कागजों में सभी योजनाएं देहरादून। एक तरफ डिजिटल इंडिया के जरिए देश को तकनीक की ताकत से जोड़ने के दावे हैं, दूसरी तरफ उत्तराखंड की राजधानी के जिले में ही 170 गांव नेटवर्क की पहुंच से दूर बताए जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब देहरादून जैसे महत्वपूर्ण जिले के इतने गांवों तक मोबाइल नेटवर्क नहीं पहुंच पाया, तो दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में डिजिटल क्रांति की हकीकत क्या होगी? राजधानी में बैठकर तकनीकी विकास की योजनाएं बनाने वाली व्यवस्था के लिए यह स्थिति किसी आईने से कम नहीं, जिसमें विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई साफ दिखाई देती है। डिजिटल इंडिया का उद्देश्य सरकारी सेवाओं को आम नागरिक तक आसान और पारदर्शी तरीके से पहुंचाना है। सरकारी योजनाओं के आवेदन से लेकर बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रमाणपत्रों तक, आज बहुत कुछ इंटरनेट पर निर्भर होता जा रहा है। लेकिन जिस गांव में मोबाइल नेटवर्क ही उपलब्ध नहीं है, वहां डिजिटल सुविधाओं का लाभ पहुंचाने के दावे आखिर किस काम के? तकनीक तभी सशक्तीकरण का माध्यम बन सकती है, जब उसकी पहुंच अंतिम व्यक्ति तक हो। अन्यथा डिजिटल क्रांति का लाभ उन लोगों तक सिमटकर रह जाता है, जिनके पास पहले से ही बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं। देहरादून को प्रदेश की प्रशासनिक राजधानी होने का लाभ मिलता है। यहां शासन-सचिवालय, प्रमुख विभागों के कार्यालय और आधुनिक शहरी सुविधाओं का विस्तार है। स्मार्ट तकनीक, आनलाइन सेवाओं और डिजिटल प्रशासन की बातें भी खूब होती हैं। इसके बावजूद जिले के 170 गांवों के नेटवर्क से दूर होने की जानकारी व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है। यह केवल मोबाइल पर बात करने या इंटरनेट चलाने की सुविधा का मामला नहीं है। नेटवर्क का अभाव ग्रामीणों के जीवन, आजीविका और अवसरों से सीधे जुड़ा है। विद्यार्थियों को आनलाइन अध्ययन सामग्री हासिल करने में परेशानी होती है। युवाओं के लिए नौकरी के आवेदन, प्रतियोगी परीक्षाओं की सूचनाएं और ऑनलाइन प्रशिक्षण मुश्किल हो जाते हैं। ग्रामीण उद्यमियों को अपने उत्पादों के विपणन और भुगतान संबंधी सुविधाओं में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। सबसे गंभीर स्थिति आपातकाल में पैदा होती है। किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने, दुर्घटना की सूचना देने या प्राकृतिक आपदा के दौरान मदद मांगने के लिए संचार बेहद जरूरी है। नेटवर्क नहीं होने पर सूचना पहुंचने में देरी भी जोखिम बढ़ा सकती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संचार सुविधा से वंचित गांवों के नागरिकों को विकास की दौड़ में पीछे छोड़ दिया गया है? सरकारें लगातार सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन करने पर जोर दे रही हैं। इससे कागजी कार्रवाई घटाने, पारदर्शिता बढ़ाने और नागरिकों को घर के पास सुविधाएं उपलब्ध कराने की उम्मीद की जाती है। लेकिन आनलाइन व्यवस्था की पहली शर्त ही इंटरनेट है। यदि गांव में नेटवर्क नहीं है, तो ग्रामीणों को छोटी-छोटी सेवाओं के लिए भी कस्बों या शहरों का रुख करना पड़ सकता है। यह स्थिति डिजिटल व्यवस्था की एक बुनियादी कमजोरी उजागर करती है। सेवाओं को ऑनलाइन करना आसान हो सकता है, लेकिन उन सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि तकनीक के अभाव में नागरिकों को अतिरिक्त समय, पैसा और श्रम खर्च करना पड़े, तो डिजिटल सुविधा का उद्देश्य ही अधूरा रह जाता है। डिजिटल इंडिया की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने सरकारी कार्यालय आनलाइन हो गए या कितनी सेवाएं मोबाइल पर उपलब्ध करा दी गईं। असली कसौटी यह है कि कितने गांवों तक भरोसेमंद नेटवर्क पहुंचा और कितने नागरिक बिना अतिरिक्त परेशानी के इन सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं। नेटवर्क विस्तार में दूरसंचार कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन दुर्गम क्षेत्रों में बुनियादी संचार ढांचा विकसित करने के लिए सरकार की नीतियों, प्रशासनिक समन्वय और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है। व्यावसायिक लाभ कम होने के कारण यदि कुछ क्षेत्रों में कंपनियां नेटवर्क विस्तार को प्राथमिकता नहीं देतीं, तो ऐसे गांवों को जोड़ने के लिए प्रभावी सार्वजनिक नीति की आवश्यकता होती है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जिले के इन 170 गांवों की पहचान किन आधारों पर की गई है। इनमें कितने गांव पूरी तरह नेटवर्क विहीन हैं और कितने गांवों में केवल कमजोर या अस्थिर सिग्नल की समस्या है? कितने गांवों में मोबाइल टावर लगाने की योजना स्वीकृत है? कितने प्रस्ताव बजट, भूमि, बिजली अथवा अन्य कारणों से लंबित हैं? और इन सभी गांवों को नेटवर्क से जोड़ने की समयसीमा क्या है? जब तक इन सवालों के जवाब सार्वजनिक नहीं होंगे, तब तक डिजिटल समावेशन के दावे अधूरे ही रहेंगे। केवल योजनाओं की घोषणा से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए गांववार कार्ययोजना, जिम्मेदार विभागों का निर्धारण और नियमित प्रगति की निगरानी आवश्यक है। उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी राज्यों से अलग हैं। पहाड़ी इलाकों में बस्तियों की दूरी, कठिन भूभाग, मौसम और सीमित आधारभूत ढांचा संचार सेवाओं के विस्तार को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। लेकिन यही परिस्थितियां मजबूत संचार व्यवस्था की आवश्यकता को और बढ़ाती हैं। पलायन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों से जूझ रहे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए इंटरनेट नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है। इससे विद्यार्थियों को शिक्षा के बेहतर अवसर मिल सकते हैं, स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार मिल सकता है और ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है। आपदा के समय समय पर सूचना पहुंचाने में भी संचार व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में नेटवर्क से वंचित गांवों को केवल तकनीकी विकास की सूची में पीछे छूटे क्षेत्रों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह समान अवसर, नागरिक सुविधाओं और क्षेत्रीय विकास से जुड़ा प्रश्न है। यदि राजधानी के जिले में ही संचार की ऐसी खाई मौजूद है, तो सरकार को इसे प्राथमिकता के आधार पर दूर करना चाहिए। डिजिटल इंडिया का सपना तभी पूरा होगा, जब तकनीक का लाभ शहरों और गांवों के बीच भेदभाव किए बिना हर नागरिक तक पहुंचे। विकास का अर्थ केवल बड़े शहरों में आधुनिक सुविधाओं का विस्तार नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों तक बुनियादी सेवाएं पहुंचाना भी है, जहां आज भी लोग सामान्य संचार सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। देहरादून जिले के 170 गांवों को नेटवर्क से जोड़ने के लिए सरकार को समयबद्ध योजना बनानी चाहिए। दूरसंचार कंपनियों के साथ समन्वय, आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास, वैकल्पिक संचार तकनीकों का उपयोग और नियमित निगरानी जैसे कदम उठाने होंगे। साथ ही, गांववार स्थिति सार्वजनिक कर यह भी बताना होगा कि नेटवर्क विस्तार में देरी क्यों हो रही है और समस्या का समाधान कब तक होगा। विडंबना देखिए कि देश डिजिटल भविष्य की ओर तेजी से बढ़ने का दावा कर रहा है, लेकिन राजधानी के जिले में ही सैकड़ों नहीं तो कम से कम 170 गांवों के नेटवर्क से दूर होने की बात सामने आ रही है। यह आंकड़ा केवल संचार व्यवस्था की कमी नहीं दिखाता, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़ा करता है। डिजिटल इंडिया का असली इम्तिहान महानगरों के चमकते कार्यालयों या सरकारी प्रस्तुतियों में नहीं, उन गांवों में है जहां मोबाइल पर सिग्नल तलाशना भी चुनौती बना हुआ है। सरकार को यह तय करना होगा कि डिजिटल विकास केवल विज्ञापनों और घोषणाओं तक सीमित रहेगा या वास्तव में गांवों की चौखट तक पहुंचेगा। क्योंकि जिस गांव तक नेटवर्क नहीं पहुंचता, वहां डिजिटल क्रांति का दावा नहीं, केवल उसका इंतजार पहुंचता है।

कोई टिप्पणी नहीं: