रविवार, 25 अक्टूबर 2026

सत्र से पहले सियासी संग्राम

सदन की कार्यवाही से पहले ही आमने-सामने सत्ता पक्ष और विपक्ष सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस की गैरमौजूदगी ने बढ़ाई सियासी तल्खी विधानसभा सत्र से पहले ही आरोप-प्रत्यारोप की पटकथा है तैयार देहरादून। गैरसैंण में विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले ही उत्तराखंड का सियासी पारा चढ़ने लगा है। सदन के भीतर सरकार को घेरने की तैयारी कर रही कांग्रेस सर्वदलीय बैठक से नदारद रही, तो इस गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ने सरकार के साथ बैठकर सत्र की कार्यवाही पर चर्चा करने से दूरी बनाई है या फिर यह गैरमौजूदगी सरकार के खिलाफ किसी बड़े राजनीतिक संदेश का हिस्सा है? वजह जो भी हो, इतना तय है कि गैरसैंण सत्र की शुरुआत से पहले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तल्खी साफ दिखाई देने लगी है। गैरसैंण उत्तराखंड की भावनाओं, पहाड़ की आकांक्षाओं और राज्य आंदोलन के सपनों से जुड़ा सवाल है। ऐसे में यहां होने वाला विधानसभा सत्र महज विधायी कार्यवाही नहीं, बल्कि सरकार और विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक संदेश देने का अवसर भी होता है। सरकार जहां सत्र को विकास और जनहित के मुद्दों पर अपनी उपलब्धियां सामने रखने के मंच के रूप में देखेगी, वहीं कांग्रेस की कोशिश बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और जनसमस्याओं के सवालों पर सरकार को घेरने की होगी। लेकिन सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस की अनुपस्थिति ने इस टकराव को सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सर्वदलीय बैठक का उद्देश्य सदन की कार्यवाही को सुचारु बनाने, विभिन्न दलों के बीच समन्वय स्थापित करने और विधायी कामकाज को व्यवस्थित करने का होता है। ऐसे में प्रमुख विपक्षी दल की गैरमौजूदगी स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है। क्या कांग्रेस बैठक में शामिल न होकर सरकार को राजनीतिक संदेश देना चाहती है? क्या विपक्ष पहले से ही आक्रामक रणनीति के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर चुका है? या फिर इस दूरी के पीछे कोई अलग राजनीतिक वजह है? इन सवालों के जवाब कांग्रेस के रुख और सरकार की प्रतिक्रिया से ही स्पष्ट होंगे। हालांकि, बैठक में शामिल नहीं होने को अपने आप में कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरी या सरकार की सफलता मान लेना भी जल्दबाजी होगी। विपक्ष की वास्तविक ताकत का आकलन सदन में उठाए जाने वाले मुद्दों, तथ्यों के साथ सरकार को घेरने की क्षमता और जनहित के सवालों पर उसकी सक्रियता से होगा। लेकिन कांग्रेस के सामने यह चुनौती जरूर रहेगी कि उसकी गैरमौजूदगी को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब वह अपनी ठोस राजनीतिक रणनीति से दे। सर्वदलीय बैठक से कांग्रेस की दूरी के बीच सरकार के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं। गैरसैंण में सत्र आयोजित करना राजनीतिक और भावनात्मक महत्व रखता है, लेकिन पहाड़ की समस्याओं का समाधान केवल सत्र आयोजित करने से नहीं होगा। पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, सड़क संपर्क, आपदा प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे सरकार की परीक्षा लेंगे। विपक्ष इन सवालों को कितनी आक्रामकता से उठाता है और सरकार उनका कितना ठोस जवाब देती है, इससे सत्र की राजनीतिक दिशा तय होगी। सत्तापक्ष के लिए विपक्ष की गैरमौजूदगी पर सवाल उठाना आसान हो सकता है, लेकिन इससे जनसमस्याओं से जुड़े सवाल खत्म नहीं हो जाते। इसी तरह कांग्रेस के लिए सरकार पर हमला करना पर्याप्त नहीं होगा। उसे यह भी दिखाना होगा कि उसके पास समस्याओं के समाधान को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण और वैकल्पिक नीतियां हैं। राजनीतिक बयानबाजी के बीच जनता यह देखना चाहेगी कि उसके मुद्दों पर कौन गंभीर है और कौन केवल सियासी बढ़त बनाने में जुटा है। गैरसैंण सत्र से पहले का घटनाक्रम संकेत दे रहा है कि इस बार मुकाबला केवल सदन के भीतर तक सीमित नहीं रहने वाला। कांग्रेस यदि सड़क और सदन दोनों जगह सरकार को घेरने की रणनीति अपनाती है, तो भाजपा भी विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के साथ उसके राजनीतिक रुख पर सवाल उठा सकती है। ऐसे में विधानसभा की कार्यवाही के साथ-साथ दोनों दलों की बयानबाजी भी सियासी माहौल को गर्म रखेगी। आखिरकार, सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस की गैरमौजूदगी से उठा विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता हैकृक्या उत्तराखंड की राजनीति में जनहित के मुद्दे प्राथमिकता पाएंगे या राजनीतिक टकराव ही सत्र की पहचान बनेगा? गैरसैंण की धरती पर होने वाली कार्यवाही का महत्व तभी सार्थक होगा, जब सत्ता पक्ष अपनी जवाबदेही निभाए और विपक्ष अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करे। जनता को बैठकों में मौजूदगी या गैरमौजूदगी से अधिक इस बात से मतलब है कि उसके सवाल सदन में कितनी मजबूती से उठते हैं और सरकार उन पर क्या कार्रवाई करती है।

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