शनिवार, 17 अक्टूबर 2026
चार साल बाद भी अंकिता के सवाल ‘जिंदा’
दिल्ली से उठी मामले में आवाज ने फिर हिलाई उत्तराखंड की सियासत
देश-विदेश तक गूंजा मामला, चुनाव से पहले भाजपा की बढ़ी मुश्किलें
इंडिया गेट पर माता-पिता का धरना, हिरासत व रिहाई से भड़का आक्रोश
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के पहुंचने से राष्ट्रीय राजनीति में भी उछला मुद्दा
देहरादून। अंकिता भंडारी हत्याकांड की आग एक बार फिर उत्तराखंड में सुलग उठी है। बेटी को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे माता-पिता की आवाज अब दिल्ली के इंडिया गेट तक पहुंच गई है। प्रदर्शन के दौरान माता-पिता को हिरासत में लिए जाने और फिर रिहा किए जाने की घटना ने जनाक्रोश को और तेज कर दिया। मामला केवल उत्तराखंड की सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में छा गया है। देश के प्रमुख समाचार माध्यमों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की राजनीति और मानवाधिकारों से जुड़े घटनाक्रमों पर नजर रखने वाले मंचों तक इस प्रकरण की चर्चा हो रही है।
इस बार विवाद के केंद्र में कथित वीआईपी कोण और भाजपा के वरिष्ठ नेता दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने का मुद्दा है। अंकिता के माता-पिता की मांग है कि कथित वीआईपी कोण की जांच पूरी होने तक इस नियुक्ति पर रोक लगाई जाए। परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों को दुष्यंत कुमार गौतम नकार चुके हैं और उन्होंने मानहानि की कानूनी कार्रवाई भी की है। ऐसे में जांच के निष्कर्ष और आरोपों की सत्यता इस पूरे विवाद के निर्णायक पहलू हैं।
14 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया गेट पर अंकिता के माता-पिता के धरने को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने समर्थन दिया। इसके बाद देर रात चले विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने अंकिता के माता-पिता और कई कांग्रेस नेताओं को हिरासत में लिया। उन्हें 15 अक्टूबर की सुबह रिहा कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने मामले को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। अंकिता के पिता ने मांग स्वीकार नहीं होने पर देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की चेतावनी भी दी।
उधर, देहरादून में भी विरोध की आवाज तेज हुई। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, हरक सिंह रावत और प्रीतम सिंह समेत पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने राजभवन के बाहर प्रदर्शन किया। कांग्रेस ने कथित वीआईपी की भूमिका पर स्थिति स्पष्ट करने और दुष्यंत गौतम की नियुक्ति के मामले में सरकार से जवाब मांगा। इस तरह दिल्ली से देहरादून तक एक ही सवाल राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया हैकृअंकिता के मामले में उठ रहे अनुत्तरित सवालों का स्पष्ट जवाब कब मिलेगा?
सितंबर 2022 में ऋषिकेश के निकट वनंतरा रिजार्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करने वाली 19 वर्षीय अंकिता की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में रिजॉर्ट मालिक पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों को अदालत ने दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके बावजूद कथित वीआईपी कोण को लेकर उठते सवालों ने प्रकरण को बार-बार राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में वापस ला दिया है।
अंकिता के परिवार और आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्हें पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और कथित वीआईपी कोण पर स्पष्टता चाहिए। दूसरी ओर, जांच से जुड़े एक पूर्व अधिकारी के हवाले से मीडिया में यह भी रिपोर्ट किया गया है कि पहले की जांच में कथित वीआईपी की भूमिका साबित करने वाला साक्ष्य नहीं मिला था। यही वह बिंदु है, जहां राजनीतिक दावों से अलग जांच के निष्कर्षों, उपलब्ध प्रमाणों और नए आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी हो जाती है।
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह प्रकरण भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती बनता जा रहा है। विपक्ष इसे महिला सुरक्षा, न्याय और सत्ता की जवाबदेही से जोड़कर उठा रहा है। परिवार की मांगों और आंदोलन के प्रति सरकार का रुख अब राजनीतिक बहस का विषय है। विपक्ष के लिए यह मुद्दा सरकार को घेरने का अवसर है, जबकि भाजपा के सामने आरोपों का तथ्यों के आधार पर जवाब देने और जांच को लेकर भरोसा कायम करने की चुनौती है।
हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम आरोपों में आने से उसका दोष सिद्ध नहीं होता। लेकिन किसी संवेदनशील मामले में संदेह और सवाल लगातार बने रहें, तो उन्हें दूर करना शासन और जांच व्यवस्था की जिम्मेदारी है। सरकार के लिए चुनौती केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि जनता को जांच की स्थिति और कानूनी प्रक्रिया के बारे में विश्वसनीय जानकारी मिले। अंकिता भंडारी का मामला एक परिवार के न्याय संघर्ष से आगे बढ़कर उत्तराखंड में महिला सुरक्षा, प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही और जांच व्यवस्था पर भरोसे की कसौटी बन चुका है। परिवार का दिल्ली पहुंचना और राष्ट्रीय नेताओं का समर्थन इस बात का संकेत है कि मामला फिर व्यापक राजनीतिक विमर्श में लौट आया है।
अब निगाहें सरकार, जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया पर हैं। क्या कथित वीआईपी कोण को लेकर उठ रहे सवालों पर स्थिति और स्पष्ट होगी? क्या परिवार को जांच के निष्कर्षों से संतोषजनक जवाब मिलेगा? और क्या राजनीतिक दल इस मामले को आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाकर न्याय की मांग पर केंद्रित रखेंगे? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि अंकिता के नाम पर उठी यह नई लहर केवल कुछ दिनों की राजनीतिक हलचल बनकर रह जाती है या व्यवस्था को जवाबदेह बनाने की दिशा में कोई ठोस परिणाम सामने आता है।
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