मंगलवार, 3 नवंबर 2026
चुनावी रंग में रंगी देवभूमि
कांग्रेस की न्याय यात्रा के जवाब में भाजपा की लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ यात्रा
सड़कों पर सियासी शक्ति प्रदर्शन, 2027 की सत्ता के लिए अभी से बिछने लगी बिसात
भाजपा और कांग्रेस ने प्रदेश की राजनीति को सीधे चुनावी मुकाबले की ओर मोड़ दिया
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले ही अभी नहीं हुई है, लेकिन प्रदेश की सियासत में चुनावी बिगुल बज चुका है। मौसम में बढ़ती ठंड के बीच राजनीतिक पारा चढ़ने लगा है। सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस सड़क पर उतरकर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है, तो भाजपा विपक्ष के आंदोलन को राजनीतिक अवसरवाद और अराजकता से जोड़कर जवाबी हमला बोल रही है। कांग्रेस की न्याय यात्रा के जवाब में भाजपा की लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ यात्रा ने प्रदेश की राजनीति को सीधे चुनावी मुकाबले की ओर मोड़ दिया है।
यह लड़ाई केवल दो यात्राओं की नहीं है। इसके केंद्र में जनता के बीच अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता स्थापित करने, विरोधियों की रणनीति को कमजोर करने और वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले माहौल अपने पक्ष में बनाने की कोशिश है। दोनों प्रमुख दल जानते हैं कि चुनाव की घोषणा के बाद प्रचार की रफ्तार बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। जनता के मन में जगह बनाने के लिए उससे पहले ही मुद्दों, नारों और राजनीतिक संदेशों की जमीन तैयार करनी होगी।
कांग्रेस अपनी न्याय यात्रा के जरिए प्रदेश सरकार को बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, भर्ती प्रक्रियाओं पर उठे सवालों, कानून-व्यवस्था और जनसमस्याओं के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रही है। पार्टी की रणनीति सरकार के खिलाफ असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की है। कांग्रेस चाहती है कि स्थानीय समस्याओं को लेकर उठने वाली आवाजें केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें भाजपा सरकार के विरुद्ध एक व्यापक जनमत का रूप दिया जाए। दूसरी ओर, भाजपा ने लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ का नारा देकर कांग्रेस के आंदोलन की राजनीतिक धार कुंद करने की कोशिश की है। भाजपा का संदेश है कि विपक्ष जनसमस्याओं के समाधान के बजाय राजनीतिक माहौल बनाने में जुटा है। इस जवाबी अभियान के जरिए पार्टी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने और अपने कार्यकर्ताओं को चुनावी मोर्चे पर सक्रिय करने का प्रयास कर रही है।
इस तरह दोनों दलों ने अपने-अपने राजनीतिक आख्यान गढ़ने शुरू कर दिए हैं। कांग्रेस सरकार की जवाबदेही को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है, जबकि भाजपा विपक्ष के विरोध की मंशा पर सवाल उठाकर राजनीतिक बढ़त हासिल करने की कोशिश में है। उत्तराखंड में लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करने के बाद भाजपा के सामने अब तीसरी बार सरकार बनाने की चुनौती है। राज्य की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की परंपरा रही है। ऐसे में वर्ष 2027 का चुनाव भाजपा के लिए केवल सरकार बचाने का मुकाबला नहीं, बल्कि इस धारणा को बदलने की परीक्षा भी होगा कि उत्तराखंड में हर पांच साल में सत्ता बदल जाती है।
भाजपा के पास केंद्र सरकार की योजनाओं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता, संगठनात्मक नेटवर्क और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व को चुनावी ताकत में बदलने का अवसर है। पार्टी विकास कार्यों, बुनियादी ढांचे, धार्मिक पर्यटन और केंद्र-राज्य के समन्वय को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के सामने रख सकती है। लेकिन सत्ता में रहने का लाभ अपने साथ जवाबदेही भी लेकर आता है। बेरोजगारी, पलायन, ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं की कमी, भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर युवाओं की नाराजगी और भ्रष्टाचार के आरोप जैसे सवालों पर सरकार को जनता के सामने अपना पक्ष रखना होगा। केवल विपक्ष को घेरने से इन सवालों का जवाब नहीं मिलेगा। भाजपा की चुनावी रणनीति की असली परीक्षा यही होगी कि वह अपने संगठन के उत्साह को सरकार के कामकाज के प्रति जनता के भरोसे में कितना बदल पाती है।
भाजपा और कांग्रेस के बीच तेज होते मुकाबले का असर प्रदेश के अन्य राजनीतिक दलों पर भी पड़ेगा। उत्तराखंड क्रांति दल सहित क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियां राज्य की मूल अवधारणा, पहाड़ी अस्मिता, रोजगार, भू-कानून, पलायन और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों को लेकर अपनी जगह तलाश सकती हैं। हालांकि, इन मुद्दों पर जनसमर्थन को चुनावी सफलता में बदलने के लिए उन्हें भी मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व और विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी उपस्थिति दिखानी होगी। भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होने की स्थिति में तीसरे विकल्प के लिए राजनीतिक जगह बनाना आसान नहीं होगा, लेकिन क्षेत्रीय सवालों पर जनता की नाराजगी किसी भी दल के लिए अवसर पैदा कर सकती है।
फिलहाल इतना साफ है कि उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की लड़ाई का शुरुआती चरण शुरू हो चुका है। कांग्रेस न्याय के सवालों को चुनावी हथियार बनाना चाहती है, तो भाजपा लोकतंत्र और व्यवस्था के सवालों के जरिए विपक्ष को घेर रही है। दोनों दलों ने अपने-अपने मोर्चे खोल दिए हैं। अब देखना यह होगा कि यह सियासी संग्राम नारों और यात्राओं तक सीमित रहता है या जनता के वास्तविक मुद्दों को केंद्र में लाकर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा देता है।
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