बुधवार, 4 नवंबर 2026
‘पहाड़’ की जमीन पर सियासत ‘गर्म’
भूमि बचाओ-धामी हटाओ से चुनावी रण का आगाज
कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा वार नेताओं को सौंपी कमान
सरकारी जमीनों के कथित बंदरबांट को बनाएगी बड़ा मुद्दा
कांग्रेस पाटी ने की धामी सरकार की घेराबंदी की तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सियासी संघर्ष अब नए मुद्दों और नए नारों के साथ तेज होने लगा है। भाजपा जहां सत्ता में हैट्रिक लगाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार के खिलाफ जमीन के सवाल को बड़ा राजनीतिक हथियार बनाने का फैसला किया है। कांग्रेस ने प्रदेश में चार नवंबर से भूमि बचाओ-धामी हटाओ अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। इस अभियान के जरिए पार्टी सरकारी जमीनों के कथित बंदरबांट, भूमि आवंटन में अनियमितताओं और जमीनों के सौदों में भ्रष्टाचार के आरोपों को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है।
कांग्रेस का यह अभियान महज सरकार के खिलाफ एक विरोध कार्यक्रम नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले राजनीतिक विमर्श बदलने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी ने नारे में ही अपना चुनावी संदेश स्पष्ट कर दिया है। जमीन बचाने की अपील के साथ मुख्यमंत्री को हटाने की मांग जोड़कर कांग्रेस ने सीधे सत्ता को निशाने पर लिया है। पार्टी की कोशिश है कि भूमि का मुद्दा केवल प्रशासनिक या कानूनी बहस तक सीमित न रहे, बल्कि इसे उत्तराखंड की अस्मिता, संसाधनों और भविष्य से जोड़कर राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया जाए।
कांग्रेस ने अभियान को प्रदेशव्यापी स्वरूप देने के लिए अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और गुरदीप सप्पल को नैनीताल, विधायक मनोज तिवारी और पूर्व विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल को अल्मोड़ा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा को रानीखेत तथा विधायक तिलकराज बेहड़ और सुमित हृदयेश को हल्द्वानी की जिम्मेदारी दी गई है। इसी तरह भीमताल में भुवन कापड़ी और आदेश चौहान, देहरादून और ऋषिकेश में हरक सिंह रावत, विकासनगर में प्रीतम सिंह, मसूरी में प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल तथा टिहरी में विधायक विक्रम सिंह नेगी और लखपत बुटोला को जिम्मेदारी सौंपी गई है। हरिद्वार में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत विधायकों के साथ अभियान का नेतृत्व करेंगे। रानीपुर में फुरकान अहमद और वीरेंद्र जाती को जिम्मेदारी दी गई है।
उत्तराखंड में जमीन का सवाल लंबे समय से संवेदनशील रहा है। राज्य गठन के बाद से ही पहाड़ की जमीन, बाहरी निवेश, औद्योगिक गतिविधियों, कृषि भूमि के संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों को लेकर बहस होती रही है। बदलती आर्थिक परिस्थितियों और तेजी से बढ़ते भूमि कारोबार ने इस बहस को और तीखा किया है। कांग्रेस अब इसी संवेदनशीलता को राजनीतिक मुद्दे में बदलना चाहती है। पार्टी का आरोप है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में सरकारी जमीनों के आवंटन और उपयोग में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। निवेश और विकास के नाम पर जमीनों के निस्तारण की प्रक्रिया पर भी कांग्रेस सवाल उठा रही है। पार्टी पहले भी इस संबंध में आरोपपत्र जारी कर जांच की मांग कर चुकी है। अब अभियान के जरिए इन आरोपों को विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचाने की तैयारी है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और तथ्यों के सामने आने के बाद ही उनकी वास्तविकता तय होगी।
इस अभियान की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने कार्यक्रम आयोजित हुए या कितने नेता मंच पर दिखाई दिए। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस जमीन के मुद्दे को आम लोगों की रोजमर्रा की चिंताओं से जोड़ पाएगी? क्या पहाड़ों में जमीन और पलायन, ग्रामीणों के अधिकार, स्थानीय युवाओं के रोजगार तथा शहरी क्षेत्रों में अनियंत्रित भूमि कारोबार जैसे सवालों पर कोई स्पष्ट राजनीतिक विकल्प पेश कर पाएगी? कांग्रेस के सामने अपनी अंदरूनी चुनौतियां भी हैं। प्रदेश में कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद पार्टी लंबे समय से एक मजबूत और साझा राजनीतिक अभियान खड़ा करने के संघर्ष से गुजर रही है। ऐसे में सभी नेताओं को विधानसभा वार जिम्मेदारी सौंपना एक प्रयोग भी है और संगठनात्मक एकजुटता की परीक्षा भी।
दरअसल, 2027 का चुनाव उत्तराखंड में जमीन की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। कांग्रेस ने भूमि बचाओ-धामी हटाओ का नारा देकर यह संकेत दे दिया है कि वह चुनाव में केवल भाजपा सरकार की उपलब्धियों और कमियों पर बहस नहीं करना चाहती, बल्कि राज्य की जमीन, संसाधनों और पहचान को केंद्रीय मुद्दा बनाना चाहती है। अब देखना यह होगा कि चार नवंबर से शुरू होने वाला अभियान जनआंदोलन का रूप लेता है या फिर चुनावी नारों की सियासत तक सिमटकर रह जाता है। कांग्रेस के लिए यह अभियान सत्ता वापसी की राह तलाशने का मौका है, जबकि भाजपा के लिए अपनी नीतियों और फैसलों का बचाव करने की चुनौती। इतना तय है कि उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में अब जमीन केवल जमीन नहीं रहेगी, बल्कि सत्ता के संघर्ष का बड़ा राजनीतिक मैदान बनने जा रही है।
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