सोमवार, 8 जून 2026
‘फास्ट फूड’ के दौर में ‘झंगोरे की खीर’ का जलवा
---मीठा खाने की चाहत भी पूरी और वजन बढ़ने का डर भी खत्म, यह पूरी तरह से ग्लूटेन-फ्री
---देश के बड़े रेस्टोरेंट्स में पहाड़ी थाली के साथ बनी झंगोरे की खीर परोसना स्टेटस सिंबल
---कभी पर्वतीय घरों की पारंपरिक मिठाई अब सेहतमंद भोजन के रूप में बना रही पहचान
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य और देवस्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का पारंपरिक खान-पान भी अपनी अलग पहचान रखता है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में एक नाम है झंगोरे की खीर जो वर्षों से पर्वतीय संस्कृति और खान-पान का अभिन्न हिस्सा रही है। बदलते दौर में जहां आधुनिक खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ा है, वहीं झंगोरे की खीर अपनी पौष्टिकता और स्वाद के कारण फिर से लोगों की पसंद बनती जा रही है।
झंगोरा, जिसे अंग्रेजी में बार्नयार्ड मिलेट कहा जाता है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों में शामिल है। कम पानी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी इसकी खेती आसानी से हो जाती है। यही कारण है कि इसे पहाड़ की जीवनशैली और कृषि संस्कृति का आधार माना जाता रहा है।
पहाड़ के गांवों में झंगोरे की खीर केवल एक मिठाई नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा है। शादी-विवाह, पूजा-पाठ, नामकरण संस्कार और धार्मिक आयोजनों में इसे विशेष रूप से बनाया जाता है। दूध, घी, मेवा और झंगोरे से तैयार होने वाली यह खीर मेहमानों के स्वागत का भी प्रमुख व्यंजन रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले जब बाजारों में मिठाइयों की उपलब्धता कम थी, तब झंगोरे की खीर ही पर्वतीय परिवारों की सबसे खास मिठाई हुआ करती थी। इसका स्वाद आज भी लोगों को अपने बचपन और गांव की याद दिला देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार झंगोरा फाइबर, प्रोटीन, आयरन और कई आवश्यक खनिज तत्वों से भरपूर होता है। इसमें ग्लूटेन नहीं होता, जिससे यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बन रहा है। मधुमेह और वजन नियंत्रित रखने वालों के लिए भी इसे लाभदायक माना जाता है। यही वजह है कि जिस झंगोरे को कभी केवल पहाड़ की फसल माना जाता था, आज वह देश और विदेश के बाजारों में सुपरफूड के रूप में पहचान बना रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के बावजूद झंगोरे की खीर आज भी गांवों की रसोई में अपनी जगह बनाए हुए है। कई स्वयं सहायता समूह और स्थानीय उद्यमी झंगोरे से जुड़े उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इससे स्थानीय किसानों को भी नई उम्मीद मिली है। झंगोरे की खीर केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इसमें पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, खेतों की मेहनत और पारंपरिक जीवनशैली की झलक दिखाई देती है। आधुनिकता के इस दौर में भी जब लोग अपने पारंपरिक स्वाद की ओर लौट रहे हैं, तब झंगोरे की खीर उत्तराखंड की पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का काम कर रही है। आज के दौर में पिज्जा-बर्गर के दीवाने अब देवभूमि के इस पारंपरिक स्वाद के आगे सरेंडर कर रहे हैं। कभी गरीबों का राशन समझा जाने वाला झंगोरा अब बड़े-बड़े होटलों के डेजर्ट मेन्यू की शान बन चुका है। स्वाद ऐसा कि उंगलियां चाटते रह जाएं और सेहत ऐसी कि डाक्टर भी हैरान रह जाएं।
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