बुधवार, 3 जून 2026

पहाड़ में पलायन ने छीनी ‘बचपन की छांव’

---पहाड़ के गांवों में दादा-दादी और नाना-नानी से दूर हो रहे नौनिहाल, टूट रहे रिश्तों के अनकहे धागे ---रोजगार की तलाश में शहरों की ओर बढ़ते कदमों ने बच्चों के बचपन से भी बुजुर्गों का स्नेह छीना ---पहाड़ की सामाजिक संस्कृति की सबसे मजबूत कड़ी पर लग गई है आज पलायन की नजर देहरादून। पहाड़ के चमोली जिले के दरमोड़ा गांव में 75 वषीय कमला देवी हर शाम घर के आंगन में बैठकर सड़क की ओर देखती हैं। उनकी आंखें किसी राहगीर को नहीं, बल्कि उस उम्मीद को तलाशती हैं कि शायद इस बार छुट्टियों में उनका पोता घर आ जाए। पोता अब देहरादून के एक निजी स्कूल में पढ़ता है। साल में एक-दो बार ही गांव आ पाता है। मोबाइल पर बात तो होती है, लेकिन कमला देवी कहती हैं, फोन में बच्चे की आवाज सुनाई देती है, उसकी हंसी नहीं दिखती। उत्तराखंड के पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने केवल गांवों की आबादी कम नहीं की है, बल्कि पीढ़ियों के बीच मौजूद आत्मीय रिश्तों को भी कमजोर कर दिया है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में हजारों परिवार शहरों में बस गए हैं। इसके साथ ही बच्चों और उनके दादा-दादी, नाना-नानी के बीच का वह रिश्ता भी दूर होता जा रहा है, जो कभी पहाड़ की सामाजिक संस्कृति की सबसे मजबूत कड़ी हुआ करता था। एक समय था जब गांवों के आंगन बच्चों की किलकारियों से गूंजते थे। दादी की कहानियां, नानी के लोकगीत, दादा के अनुभव और नाना की सीख बच्चों के व्यक्तित्व का हिस्सा बनते थे। आज इन आंगनों में सन्नाटा है। बुजुर्ग अकेले हैं और बच्चे शहरों की भागदौड़ में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। पौड़ी जिले के पाटयों गांव में रहने वाले 82 वर्षीय मोहन सिंह बताते हैं कि उनका नाती दिल्ली में रहता है। जब वह छोटा था तो हर गर्मियों में गांव आता था। अब पढ़ाई और कोचिंग के कारण वर्षों निकल जाते हैं। कभी-कभी वीडियो कॉल पर बात हो जाती है, लेकिन वह बात कहां जो गोद में बैठकर होती थी। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं, भावनात्मक भी है। बच्चों को बुजुर्गों का अनुभव और संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं, वहीं बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा की भावना से जूझ रहे हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने और पलायन की बढ़ती प्रवृत्ति ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है। पहाड़ की लोक संस्कृति में बुजुर्ग केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि परंपराओं और लोक ज्ञान के जीवित स्रोत होते थे। लोककथाएं, रीति-रिवाज, त्योहारों की परंपराएं और स्थानीय इतिहास बच्चों तक इन्हीं के माध्यम से पहुंचता था। अब यह श्रृंखला धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि पहाड़ों में रोजगार और शिक्षा के बेहतर अवसर विकसित किए जाएं तो पलायन की गति को कम किया जा सकता है। इससे न केवल गांवों की रौनक लौटेगी, बल्कि परिवारों के बिखरते रिश्तों को भी नई मजबूती मिलेगी। आज भी पहाड़ के हजारों गांवों में कई दादा-दादी और नाना-नानी अपने बच्चों और पोते-पोतियों की राह देख रहे हैं। उनके लिए सबसे बड़ी खुशी कोई सरकारी योजना या आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि घर के आंगन में गूंजती अपने बच्चों की किलकारी है। पलायन ने पहाड़ के गांवों से केवल लोगों को नहीं छीना, उसने बच्चों के बचपन से दादी की कहानियां, नानी की ममता और दादा के अनुभवों की वह अमूल्य धरोहर भी छीन ली है, जो किसी किताब या मोबाइल स्क्रीन पर नहीं मिल सकती।

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