बुधवार, 3 जून 2026

चुनावी वैतरणी में ‘आल वेदर रोड’

उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 के संभावित मुद्दे -भाग-24 चारधाम आल वेदर रोड परियोजनाः विकास की पहचान या जनसरोकारों का सवाल ---भाजपा बताएगी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि, कांग्रेस उठा सकती है पर्यावरण और विस्थापन के सवाल ---सड़क चौड़ीकरण, पर्यटन और रोजगार के दावे बनाम भूस्खलन और पारिस्थितिकी की चिंता ---देश-विदेश के हजारों तीर्थयात्रियों की सुविधा और पहाड़ की संवेदनशीलता के बीच होगी चुनावी जंग देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही विकास और पर्यावरण के मुद्दे फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने लगे हैं। लगभग 12000 करोड़ रुपये की लागत वाली 900 किलोमीटर लंबी चारधाम आल वेदर रोड परियोजना इस समय सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए सबसे बड़ा चुनावी हथियार बन चुकी है। एक तरफ जहां यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सुगम धार्मिक पर्यटन का मुख्य जरिया बनी है, वहीं दूसरी तरफ यह पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है, जिससे जनता के बीच कशमकश की स्थिति है। सत्ता पक्ष चीन सीमा से सटे )षिकेश-माना और गंगोत्री मार्गों की 10 मीटर चौड़ाई को देश की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बता रहा है। रिकार्ड तोड़ धार्मिक पर्यटन और होमस्टे क्रांति को रिवर्स-पलायन का जरिया बताकर भाजपा इसे अपना सबसे मजबूत चुनावी ट्रंप कार्ड मान रही है। भाजपा के लिए यह महत्वाकांक्षी परियोजना चुनावी वैतरणी पार करने का एक मजबूत आधार है। सरकार इसे अपनी डबल इंजन सरकार की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचागत उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। इसके केंद्र में पहला मुद्दा सामरिक महत्व का है। )षिकेश-माना-गंगोत्री और टनकपुर-पिथौरागढ़ जैसे मार्ग सीधे चीन सीमा को जोड़ते हैं। हाल के वर्षों में भारत-चीन सीमा पर उपजे विवादों के मद्देनजर, सेना के भारी टैंक, मिसाइल लान्चर और सैन्य रसद को सीमा तक तेजी से पहुंचाने के लिए इन सड़कों का डबल-लेन होना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी दिसंबर 2021 में देश की सुरक्षा चिंताओं को सर्वाेपरि मानते हुए इस चौड़ाई को हरी झंडी दी थी। दूसरा बड़ा पहलू धार्मिक पर्यटन और आर्थिकी का है। आल वेदर रोड बनने से चारधाम की यात्रा अब बारहमासी और अत्यधिक सुगम होने का दावा किया जा रहा है। यात्रा सुगम होने से राज्य में रिकार्ड तोड़ श्र(ालु पहुंच रहे हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर होटल, होमस्टे, टैक्सी आपरेटरों और छोटे व्यापारियों की आर्थिकी में अभूतपूर्व उछाल आया है। सरकार इसे पहाड़ से होने वाले पलायन को रोकने वाले एक बड़े आर्थिक हथियार के रूप में जनता के सामने रख रही है। विपक्ष और पर्यावरणविदों का आरोप है कि पहाड़ों को 90 डिग्री के सीधे वर्टिकल कट दिए जाने से सैकड़ों नए लैंडस्लाइड जोन बन गए हैं। भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन में जंगलों का कटान और नदियों में मलबे की डंपिंग से धराली जैसी फ्लैश फ्लड की घटनाएं बढ़ रही हैं। पर्यावरणविदों के अनुसार सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों को अवैज्ञानिक तरीके से सीधे वर्टिकल कट दिए जा रहे हैं, जिससे संवेदनशील और कच्चे हिमालयी पहाड़ पूरी तरह अस्थिर हो चुके हैं। इसके कारण चारधाम मार्गों पर सैकड़ों नए भूस्खलन क्षेत्र पैदा हो गए हैं, जो बरसात के दिनों में यात्रियों और स्थानीय निवासियों की जान के लिए खतरा बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, सड़क चौड़ीकरण से निकलने वाले लाखों टन मलबे को सीधे नदियों और बरसाती गदेरों में डंप किया जा रहा है। इससे नदियों का तल उथला हो रहा है, पानी के प्राकृतिक स्रोत सूख रहे हैं और जोशीमठ जैसी जमीन धंसने की घटनाएं अन्य संवेदनशील गांवों में भी पैर पसार रही हैं। उत्तराखंड का मतदाता इस समय एक बेहद अजीब द्वंद्व से गुजर रहा है। पहाड़ का आम नागरिक बेहतर बुनियादी ढांचा, चौड़ी सड़कें, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार की आकांक्षा तो रखता है, लेकिन वह हालिया वर्षों में आई प्राकृतिक आपदाओं और अपने पुश्तैनी गांवों के दरकने से डरा हुआ भी है। सीमावर्ती जिलों जैसे उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग के स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि सड़कें सुगम होने से व्यापारिक गतिविधियां निश्चित रूप से बढ़ी हैं, लेकिन मानसून आते ही जब पहाड़ दरकते हैं, तो हफ्तों तक जिंदगी थम जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2027 के चुनाव में यह मुद्दा केवल खोखली बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्तारूढ़ दल राष्ट्रीय सुरक्षा और सुगम धार्मिक आर्थिकी के अपने राष्ट्रवाद प्रेरित नैरेटिव से जनता का भरोसा बरकरार रख पाता है, या विपक्ष पहाड़ के अस्तित्व, मलबे की डंपिंग और पर्यावरणीय तबाही के स्थानीय मुद्दों को वोट बैंक में तब्दील करने में कामयाब होता है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में चारधाम प्रोजेक्ट दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के रूप में सामने आ सकता है। भाजपा इसे विकास, धार्मिक पर्यटन और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की सफलता के रूप में प्रचारित करेगी, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल पर्यावरणीय चुनौतियों, भू-स्खलन और स्थानीय चिंताओं को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करेंगे। स्पष्ट है कि उत्तराखंड की राजनीति में चारधाम प्रोजेक्ट केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि विकास, आस्था, पर्यावरण और जनसरोकारों के बीच संतुलन की बहस का प्रतीक बन चुका है। यही वजह है कि 2027 के चुनावी रण में यह मुद्दा मतदाताओं के बीच व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है। बाक्स भाजपा का दावा और कांग्रेस के सवाल भाजपा का दावा है कि चारधाम प्रोजेक्ट के कारण यात्रा मार्ग पहले की तुलना में अधिक सुगम हुए हैं, यात्रा समय कम हुआ है और पर्यटन तथा स्थानीय कारोबार को नई गति मिली है। पार्टी आगामी चुनाव में इसे अपनी उपलब्धियों की सूची में प्रमुख स्थान दे सकती है। साथ ही यह संदेश देने का प्रयास होगा कि केंद्र और राज्य सरकार ने धार्मिक पर्यटन को नई पहचान दी है। दूसरी ओर कांग्रेस और विभिन्न सामाजिक संगठन परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप है कि सड़क चौड़ीकरण के दौरान बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई और पहाड़ों की अनियोजित कटिंग से कई स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। विपक्ष का कहना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय लोगों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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