बुधवार, 10 जून 2026

पहाड़ की ‘पगडंडियों’ पर उतरे नेता

चुनावी सरगर्मियां पहाड़ की पगडंडियों तक पहुंची चौपालों, मंदिरों और मेलों में पहुंचने लगे हैं नेताजी मतदाताओं के मूड को भांपने की शुरू हुई कवायद देहरादून। उत्तराखंड में चुनावी बिगुल भले ही आधिकारिक रूप से न बजा हो, लेकिन राजनीतिक दलों और नेताओं ने गांवों की पगडंडियां नापनी शुरू कर दी हैं। आने वाले महीनों में यह गतिविधियां और तेज होंगी। चुनावी सरगर्मियां अभी से पहाड़ की पगडंडियों तक पहुंचने लगी हैं। जिन गांवों में चुनाव के बाद नेताओं की आवाजाही कम हो जाती थी, वहां अब फिर से राजनीतिक चहल-पहल दिखाई देने लगी है। कोई गांव की चौपाल में बैठकर लोगों की समस्याएं सुन रहा है तो कोई धार्मिक आयोजनों, मेलों और सामाजिक कार्यक्रमों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। दरअसल, भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि उत्तराखंड की राजनीति का असली मूड देहरादून के दफ्तरों में नहीं, बल्कि पहाड़ के गांवों और कस्बों में तय होता है। यही कारण है कि संभावित प्रत्याशी और वरिष्ठ नेता अभी से गांव-गांव जाकर जनता का रुख जानने की कोशिश कर रहे हैं। एक समय था जब चुनावी मौसम में ही गांवों में नेताओं की भीड़ दिखाई देती थी, लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग है। कई विधानसभा क्षेत्रों में नेता छोटे-छोटे जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीणों से संपर्क साध रहे हैं। गांव की चौपाल, चाय की दुकान और मंदिर परिसर फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र बनने लगे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे मुद्दे आज भी प्रमुख हैं। नेता इन मुद्दों को सुन रहे हैं और जनता को भरोसा दिला रहे हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर कराया जाएगा। पर्वतीय जिलों में पलायन का मुद्दा आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। गांवों में खाली होते घर, बंद पड़े स्कूल और खेती से दूर होती नई पीढ़ी लोगों की चिंता का विषय हैं। ऐसे में जो नेता गांवों तक पहुंच रहे हैं, उन्हें सबसे अधिक सवाल रोजगार और पलायन पर सुनने पड़ रहे हैं। युवाओं का एक बड़ा वर्ग सरकारी नौकरियों, स्वरोजगार और पर्यटन आधारित रोजगार के अवसरों को लेकर जवाब मांग रहा है। यही कारण है कि राजनीतिक दल भी अपने भविष्य के चुनावी एजेंडे में इन मुद्दों को प्रमुखता देने की तैयारी कर रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सरकार विकास, निवेश, सड़क और धार्मिक पर्यटन परियोजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में जनता के बीच ले जा रही है। पार्टी के नेता गांवों में जाकर सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से संवाद कर रहे हैं और विकास कार्यों का फीडबैक ले रहे हैं। भाजपा की रणनीति यह संदेश देने की है कि डबल इंजन सरकार ने उत्तराखंड के विकास को नई गति दी है और इसी गति को आगे बढ़ाने के लिए जनता का समर्थन जरूरी है। वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल की संभावनाओं को भुनाने की तैयारी में है। पार्टी के नेता महंगाई, बेरोजगारी, पलायन और स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं। कांग्रेस का प्रयास है कि गांवों में भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार किया जाए और सरकार की कमियों को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया जाए। पार्टी संगठन भी बूथ स्तर पर अपनी सक्रियता बढ़ाने की कवायद में जुटा है ताकि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय किया जा सके। कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय नेता और संभावित निर्दलीय उम्मीदवार भी अभी से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी बढ़ी है। वह स्थानीय मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ की राजनीति में व्यक्तिगत संपर्क और जनसरोकारों का महत्व आज भी बरकरार है। सोशल मीडिया के दौर में भी गांव की चौपाल और घर-घर संपर्क का कोई विकल्प नहीं बन पाया है।

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