बुधवार, 1 जुलाई 2026
जख्या और फरड़ पहाड़ की आत्मा
पीढ़ियों से चली आ रही पहाड़ की खाद्य परंपरा
पहाड़ की रसोई से उठती मिट्टी की सौंधी खुशबू
यह मसाला ही नहीं, बल्कि पहाड़ की है स्मृतियां
देहरादून। पहाड़ की रसोई में जब चूल्हे पर लोहे की कढ़ाई चढ़ती है, उसमें सरसों का तेल गर्म होता है और फिर एक चुटकी जख्या या फरड़ उसमें डाली जाती है, तो उठने वाली छन्न-छन्न की आवाज केवल तड़के की नहीं होती, बल्कि वह पहाड़ की आत्मा की आवाज होती है। उसकी सुगंध पूरे घर में फैल जाती है और बरबस ही बचपन, गांव और मां के हाथों के बने भोजन की यादें ताजा हो उठती हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ों में जख्या और फरड़ केवल मसाले नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी खाद्य परंपरा हैं, जिसने सादगी भरे पहाड़ी भोजन को एक अनूठी पहचान दी है। पहाड़ के लोगों के लिए भोजन कभी केवल पेट भरने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के साथ एक गहरा रिश्ता भी रहा है। इसी रिश्ते का स्वाद हैं जख्या और फरड़।
पहाड़ की दाल हो, आलू के गुटके, कापा, फाणु, चौंसू या फिर मौसमी सब्जियांकृइन सबका असली स्वाद जख्या और फरड़ के तड़के से ही निखरता है। इनकी सुगंध इतनी अलग और मनमोहक होती है कि साधारण-सा भोजन भी स्वाद का उत्सव बन जाता है। गांवों में आज भी बुजुर्ग कहते हैं जख्या पड़ जाए तो भोजन में जान आ जाती है। शायद यही वजह है कि पहाड़ से दूर रहने वाले लोग भी अपने गांव जाते समय जख्या और फरड़ की छोटी-छोटी पोटलियां साथ लेकर लौटते हैं, ताकि शहर की रसोई में भी पहाड़ की खुशबू जिंदा रह सके।
एक समय था जब पहाड़ के घरों में गैस चूल्हे नहीं थे। मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ियां जलती थीं और मां या दादी कढ़ाई में जख्या का तड़का लगाती थीं। उसकी खुशबू आंगन से लेकर खेतों तक पहुंच जाती थी। बच्चे खेलते-खेलते घर की ओर दौड़ पड़ते थे, क्योंकि उन्हें पता होता था कि आज खाने में कुछ खास बना है। आज भले ही जीवन की रफ्तार बदल गई हो, लेकिन जख्या और फरड़ की खुशबू अब भी लोगों को उनके बचपन और गांव की यादों से जोड़ देती है।
जख्या और फरड़ केवल स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माने जाते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि ये पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं और शरीर को गर्म रखने में भी मदद करते हैं। पहाड़ के कठिन जीवन और सीमित संसाधनों के बीच इन्हीं प्राकृतिक मसालों ने भोजन को स्वाद और स्वास्थ्य दोनों प्रदान किए। बाजारवाद और आधुनिक खान-पान के दौर में कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ लोगों की थाली से गायब हो गए हैं, लेकिन जख्या और फरड़ आज भी पहाड़ की पहचान बने हुए हैं। अब इनकी मांग देश के बड़े शहरों तक पहुंच चुकी है। आर्गेनिक उत्पादों के बढ़ते चलन ने इन पारंपरिक मसालों को नई पहचान दी है।
कई काश्तकार इनकी खेती की ओर लौट रहे हैं और स्थानीय उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के प्रयास भी हो रहे हैं। यह केवल आर्थिक अवसर नहीं, बल्कि पहाड़ की खाद्य संस्कृति को बचाने की एक महत्वपूर्ण पहल भी है। जब किसी रसोई में जख्या और फरड़ का तड़का लगता है, तो केवल भोजन नहीं पकता, बल्कि पहाड़ की मिट्टी, खेत, जंगल, चूल्हा, मां की ममता और गांव की यादें भी जीवंत हो उठती हैं। क्योंकि जख्या और फरड़ सिर्फ मसाले नहीं हैं, वे पहाड़ की उस विरासत का स्वाद हैं, जो हर पहाड़ी के दिल में बसती है। उनकी खुशबू में घर है, गांव है और अपनेपन का वह एहसास है, जिसे शब्दों में नहीं, केवल महसूस किया जा सकता है।
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