बुधवार, 1 जुलाई 2026
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का संकट
प्रदेश में ढाई दशक में बूढ़ा वट वृक्ष बनकर रह गई उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति
जिस पहचान और अस्मिता के दम पर खड़ा हुआ था आंदोलन, राष्ट्रीय दलों के चक्रव्यूह में फंसा
आज खुद अपने ही घर में बेगाना हो गया है एकमात्र क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक समय ऐसा भी था, जब क्षेत्रीय दलों की आवाज सत्ता के गलियारों में मजबूती से गूंजती थी। अलग राज्य आंदोलन के दौरान और उसके बाद शुरुआती वर्षों में क्षेत्रीय राजनीति केवल चुनावी विकल्प नहीं, बल्कि पहाड़ की अस्मिता, स्थानीय अधिकारों और जनभावनाओं की प्रतिनिधि मानी जाती थी। लेकिन आज जब राज्य अपने गठन के ढाई दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति का दौर समाप्ति की ओर है?
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लड़ाई में एकमात्र क्षेत्रीय दल, उत्तराखंड क्रांति दल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राज्य गठन के बाद लोगों को उम्मीद थी कि यह दल प्रदेश की राजनीति में एक मजबूत शक्ति के रूप में उभरेगा और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय दलों के मुकाबले अधिक मजबूती से उठाएगा। शुरुआती चुनावों में यूकेडी ने अपनी उपस्थिति दर्ज भी कराई, लेकिन धीरे-धीरे पार्टी का जनाधार सिमटता चला गया। इस गिरावट के पीछे कई कारण रहे। सबसे बड़ा कारण संगठनात्मक कमजोरी और लगातार गुटबाजी रही। पार्टी कई बार टूट का शिकार हुई, नेतृत्व को लेकर विवाद सामने आए और कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे राष्ट्रीय दलों की ओर खिसकता गया। परिणाम यह हुआ कि राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाला दल राजनीतिक मुख्यधारा से लगभग बाहर हो गया।
दूसरी ओर, भाजपा और कांग्रेस ने क्षेत्रीय मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल करना शुरू कर दिया। भू-कानून, मूल निवास, पलायन, बेरोजगारी और स्थानीय संसाधनों पर अधिकार जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय दलों ने भी उठाया, जिससे क्षेत्रीय दलों की विशिष्ट पहचान कमजोर होती गई। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय राजनीति पूरी तरह समाप्त हो गई है। दरअसल, जिन मुद्दों पर क्षेत्रीय दलों का जन्म हुआ था, वे आज भी जिंदा हैं। पहाड़ों से लगातार पलायन हो रहा है, युवाओं में बेरोजगारी को लेकर असंतोष है, भूमि और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार की बहस जारी है और कई वर्गों में यह भावना भी है कि राज्य आंदोलन के मूल सपने अभी पूरे नहीं हुए हैं।
यही कारण है कि समय-समय पर क्षेत्रीय राजनीति की आवश्यकता फिर महसूस होने लगती है। जब भी स्थानीय अस्मिता और उत्तराखंडियत के सवाल प्रमुखता से उठते हैं, तब क्षेत्रीय दलों के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलते दिखाई देते हैं। लेकिन इसके लिए केवल भावनात्मक मुद्दे पर्याप्त नहीं होंगे। क्षेत्रीय दलों को मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, युवा चेहरों और जमीनी आंदोलनों के जरिए खुद को पुनर्जीवित करना होगा।
आज उत्तराखंड की राजनीति दो राष्ट्रीय दलों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई दिखाई देती है, लेकिन लोकतंत्र में राजनीतिक रिक्तता हमेशा बनी नहीं रहती। यदि जनता को यह महसूस होता है कि उनके स्थानीय मुद्दों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, तो क्षेत्रीय राजनीति एक बार फिर नई ऊर्जा के साथ उभर सकती है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि क्षेत्रीय राजनीति का दौर खत्म हो रहा है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या क्षेत्रीय दल बदलते राजनीतिक दौर के अनुरूप खुद को बदल पाने में सफल होंगे? यदि वे ऐसा कर पाए, तो उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय स्वर फिर बुलंद हो सकते हैं। लेकिन यदि वे आंतरिक संघर्ष और नेतृत्व संकट से बाहर नहीं निकल पाए, तो राज्य आंदोलन की विरासत केवल इतिहास की किताबों तक सीमित होकर रह जाएगी।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें