गुरुवार, 9 जुलाई 2026
‘हाथियों’ का रास्ता और ‘इंसानों’ की सड़क
हरियाली पर कुल्हाड़ी
शिवालिक एलीफेंट रिजर्व में हजारों पेड़ों की कटाई, पर्यावरणविद चिंतित
)षिकेश कारिडोर परियोजना के लिए दांव पर लगा 3995 पेड़ों का जीवन
विकास और प्रकृति के बीच नई जंग,विकास के नाम पर एक जंगल की मौत
देहरादून। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यह पहचान केवल मंदिरों और तीर्थों से नहीं, बल्कि उसके घने जंगलों, वन्यजीवों और हिमालयी पारिस्थितिकी से भी जुड़ी है। लेकिन अब एक बार फिर विकास और पर्यावरण आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। )षिकेश क्षेत्र में प्रस्तावित चार लेन सड़क/कारिडोर परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई की संभावना ने पर्यावरणविदों, स्थानीय नागरिकों और वन संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परियोजना के तहत शिवालिक एलीफेंट रिजर्व क्षेत्र में लगभग 3995 पेड़ों को हटाने का प्रस्ताव है, जिसे लेकर व्यापक बहस छिड़ गई है।
सरकार और परियोजना से जुड़े विभागों का तर्क है कि )षिकेश और देहरादून के बीच लगातार बढ़ते यातायात दबाव को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण आवश्यक है। उनका कहना है कि इससे जाम कम होगा, यात्रा सुरक्षित बनेगी और चारधाम यात्रा सहित क्षेत्रीय संपर्क बेहतर होगा। लेकिन पर्यावरणविद पूछ रहे हैं कि क्या विकास का एकमात्र रास्ता जंगलों को काटकर ही निकलेगा? उनका कहना है कि यदि मार्ग हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले क्षेत्र से होकर गुजरता है, तो इसके दूरगामी पारिस्थितिक प्रभाव हो सकते हैं।
शिवालिक एलीफेंट रिजर्व केवल एक वन क्षेत्र नहीं, बल्कि हाथियों और अन्य वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कारिडोर वन्यजीवों की आवाजाही और जैव विविधता के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। यदि बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान होता है और आवास खंडित होते हैं, तो मानवदृवन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। यही चिंता पर्यावरण समूह लगातार उठा रहे हैं। इस परियोजना को लेकर न्यायिक स्तर पर भी सवाल उठ चुके हैं। एक याचिका की सुनवाई के दौरान उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने यह पूछा था कि क्या पेड़ों की कटाई कम करने के लिए एलिवेटेड रोड जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। अदालत ने संबंधित पक्षों से वैकल्पिक सुझावों पर भी जवाब मांगा था।
यही प्रश्न आज आम नागरिक भी पूछ रहा हैकृयदि तकनीकी विकल्प उपलब्ध हैं, तो क्या पर्यावरणीय नुकसान कम करने वाले मॉडल को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए?यही उत्तराखण्ड वह भूमि है जहां से विश्वप्रसि( चिपको आंदोलन ने जन्म लिया। ग्रामीण महिलाओं और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने पेड़ों से चिपककर जंगलों को बचाने का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया। आज उसी राज्य में विकास परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान की खबरें लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि क्या विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की हमारी क्षमता कमजोर पड़ रही है?
एक परिपक्व पेड़ केवल लकड़ी नहीं होता। वह पक्षियों का घर, मिट्टी का संरक्षक, भूजल संरक्षण का माध्यम और कार्बन अवशोषण का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। हजारों पेड़ों का हटना केवल हरियाली कम होना नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डाल सकता है। उत्तराखण्ड पहले ही जंगल की आग, भूस्खलन, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में पर्यावरण विशेषज्ञ विकास परियोजनाओं में अधिक संवेदनशील योजना बनाने की मांग कर रहे हैं। सरकार का पक्ष यह है कि आधुनिक सड़कें राज्य की आर्थिक प्रगति, पर्यटन, आपदा प्रबंधन और आवागमन के लिए आवश्यक हैं। साथ ही, परियोजनाओं के तहत प्रतिपूरक वनीकरण और अन्य पर्यावरणीय शर्तों का पालन किया जाता है।
हालांकि, पर्यावरण समूहों का कहना है कि केवल पौधे लगा देना दशकों पुराने प्राकृतिक जंगलों की भरपाई नहीं कर सकता। वह प्रतिपूरक पौधरोपण की गुणवत्ता और उसकी दीर्घकालिक सफलता पर भी सवाल उठाते रहे हैं। उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में यह बहस केवल एक सड़क परियोजना तक सीमित नहीं है। प्रश्न यह है कि आने वाले वर्षों में राज्य किस प्रकार का विकास मॉडल अपनाएगाकृऐसा जो तेज़ तो हो, लेकिन प्रकृति की कीमत पर या ऐसा जो आधुनिक भी हो और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी भी।
)षिकेश कारिडोर का विवाद केवल पेड़ों की संख्या का विवाद नहीं है। यह उस सोच की परीक्षा है, जिसमें विकास और पर्यावरण को विरोधी नहीं बल्कि साझेदार माना जाना चाहिए। देवभूमि की पहचान केवल चौड़ी सड़कों से नहीं बनेगी। उसकी असली ताकत उसके जंगल, नदियां और जैव विविधता हैं। यदि विकास की दौड़ में इन्हीं को सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़े, तो आने वाली पीढ़ियां शायद हमसे यही पूछेंकृक्या हमने सड़कें तो बना लीं, लेकिन जंगल बचा पाए?
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