गुरुवार, 16 जुलाई 2026

यहाँ मूर्तियाँ नहीं, प्रकृति है पहला भगवान

देवभूमि का लोकपर्व हरेला और प्रकृति से है देवत्व का नाता आधुनिक पर्यावरण संकट को रास्ता दिखाती पहाड़ की परंपराएँ पहाड़ में जंगल देवता, नदियाँ माँ और पेड़ है जीवन का आधार पहाड़ के गांवों में सदियों से होती आ रही है प्रकृति की पूजा देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में यदि किसी ने सबसे पहले पूजा जाना सीखा, तो वह पत्थर की मूर्तियाँ नहीं थीं, बल्कि प्रकृति थी। यहाँ के लोगों ने सदियों पहले ही समझ लिया था कि जंगल बचेंगे तो जीवन बचेगा, नदियाँ बहेंगी तो सभ्यता बचेगी और पेड़ रहेंगे तो आने वाली पीढ़ियाँ सांस ले सकेंगी। इसलिए देवभूमि के लोगों ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि देवत्व का दर्जा दिया। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब पहाड़ के गांवों की सदियों पुरानी परंपराएँ आधुनिक विज्ञान को यह संदेश दे रही हैं कि प्रकृति का संरक्षण कानूनों से नहीं, संस्कारों से होता है। उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सावन के आगमन से पहले घरों में सात या नौ प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। दस दिन बाद जब उनकी हरी-भरी पौध निकलती है, तो उसे देवताओं को अर्पित किया जाता है और परिवार के बुजुर्ग उसे आशीर्वाद स्वरूप सबके सिर पर रखते हैं। इसी दिन पौधे लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आज सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर वृक्षारोपण अभियान चलाती हैं, लेकिन पहाड़ का समाज यह काम बिना किसी सरकारी आदेश के पीढ़ियों से करता आया है। पहाड़ के गांवों में आज भी पीपल, बरगद, बांज, बुरांश, देवदार, आंवला, बेल और तुलसी जैसे वृक्षों की पूजा की जाती है। कई गांवों में ऐसे देववन हैं जहाँ पेड़ काटना तो दूर, सूखी लकड़ी तक उठाना वर्जित माना जाता है। मान्यता है कि इन जंगलों में स्थानीय देवताओं का वास होता है। शायद यही कारण है कि जहाँ कानून जंगल नहीं बचा पाए, वहाँ आस्था ने सदियों तक उन्हें सुरक्षित रखा। गंगा, यमुना, सरयू, रामगंगा, कोसी, अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी और पिंडर जैसी नदियाँ उत्तराखंड में केवल जल का स्रोत नहीं हैं। यहाँ उन्हें माँ कहा जाता है। नदी किनारे दीपदान, जल पूजा और स्नान की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जल के प्रति सम्मान का प्रतीक है। पहाड़ का समाज जानता था कि नदी गंदी होगी तो जीवन भी दूषित होगा। खेती शुरू करने से पहले खेत की पूजा, हल की पूजा और बीज बोने से पहले भूमि को प्रणाम करना आज भी कई गांवों में परंपरा है। पहाड़ का किसान धरती को कभी जीतने की वस्तु नहीं मानता। वह उसे माता कहकर संबोधित करता है। उत्तराखंड के अधिकांश लोकदेवता जंगलों, पर्वतों, जलस्रोतों और चरागाहों से जुड़े हुए हैं। गोलू देवता, नरसिंह देवता, गंगनाथ, ऐड़ी देवता, महासू देवता, नागराजा और स्थानीय ग्राम देवताओं की पूजा में प्रकृति का विशेष स्थान होता है। कई मंदिर आज भी घने जंगलों के बीच बने हुए हैं, जहाँ पहुँचने के लिए प्रकृति के बीच से गुजरना पड़ता है। जब जंगलों पर संकट आया, तब पहाड़ की महिलाओं ने पेड़ों को गले लगाकर उन्हें बचाया। चिपको आंदोलन केवल पर्यावरण आंदोलन नहीं था। यह उस संस्कृति का विस्तार था, जिसमें पेड़ को परिवार का सदस्य माना जाता है। गौरा देवी और उनकी साथियों ने दुनिया को बता दिया कि जंगल लकड़ी का ढेर नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक विकास की दौड़ में प्रकृति के प्रति वही संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम होती जा रही है। पहाड़ों में अंधाधुंध सड़क कटान, जंगलों की कटाई, अनियोजित निर्माण और बढ़ते प्रदूषण ने पारंपरिक प्रकृति संरक्षण की व्यवस्था को कमजोर किया है। आज जिन पहाड़ों पर कभी घने जंगल थे, वहाँ कई स्थानों पर केवल मलबा दिखाई देता है। जहाँ कभी पक्षियों का कलरव सुनाई देता था, वहाँ अब मशीनों की आवाज़ गूंजती है। हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण संरक्षण पर कोई कानून नहीं लिखा। उन्होंने केवल इतना कहाकृपेड़ मत काटो, उनमें देवता रहते हैं। यह एक धार्मिक वाक्य नहीं था, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सबसे सरल और प्रभावी सूत्र था। आज विज्ञान भी यही कह रहा है कि यदि पृथ्वी को बचाना है तो जंगल बचाने होंगे, जलस्रोत बचाने होंगे और जैव विविधता बचानी होगी। आज जब सरकारें एक पेड़ माँ के नाम, हरेला महोत्सव और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चला रही हैं, तब यह याद रखना भी जरूरी है कि पौधा लगाना पर्याप्त नहीं हैकृउसे बचाना भी उतना ही आवश्यक है। पहाड़ की संस्कृति हमें यही सिखाती है कि प्रकृति का उपयोग करो, लेकिन उसका शोषण मत करो। पहाड़ की असली पहचान केवल चारधाम, बर्फीली चोटियाँ या पर्यटन नहीं हैं। उसकी सबसे बड़ी पहचान वह जीवन-दर्शन है, जिसमें प्रकृति को ईश्वर का रूप माना गया। यदि हम इस परंपरा को बचा सके, तो केवल पहाड़ ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। क्योंकि पहाड़ के बुजुर्ग आज भी कहते हैंकृजंगल बचेंगे तो जल बचेगा, जल बचेगा तो कल बचेगा।

कोई टिप्पणी नहीं: