शनिवार, 18 जुलाई 2026
भाजपा में बाहर ‘आल इज वेल’ भीतर हलचल
सत्ता बचाने से पहले संगठन संभालने की चुनौती
विधायकों की नाराजगी, कार्यकर्ताओं की चुप्पी
पार्टी में टिकट की दौड़ ने बढ़ाई सियासी धड़कन
देहरादून। उत्तराखंड भाजपा बाहर से जितनी अनुशासित और आत्मविश्वास से भरी दिखाई देती है, भीतर की तस्वीर उतनी ही जटिल बताई जा रही है। सत्ता में लगातार दूसरा कार्यकाल पूरा कर रही पार्टी अब 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रही है, लेकिन चुनावी रणनीति बनाने से पहले उसे अपने ही घर की कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। भाजपा सार्वजनिक मंचों पर संगठन सबसे ऊपर का संदेश दे रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी विकास योजनाओं और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों के सहारे चुनावी माहौल बनाने में जुटे हैं। दूसरी ओर संगठन बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का दावा कर रहा है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि पार्टी के भीतर कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब अभी तलाशा जाना बाकी है।
भाजपा के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा टिकट वितरण को लेकर है। कई मौजूदा विधायक अपने क्षेत्रों में बढ़ते असंतोष का सामना कर रहे हैं। दूसरी तरफ संगठन के भीतर ऐसे नेता भी हैं, जो मानते हैं कि यदि जीत दोहरानी है तो कई सीटों पर नए चेहरे उतारने होंगे। यही वजह है कि चुनाव भले अभी दूर हो, लेकिन टिकट की दौड़ अभी से शुरू हो चुकी है। कई दावेदार संगठन में अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं, तो कई दिल्ली और देहरादून के बीच राजनीतिक संपर्क मजबूत करने में लगे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन माना जाता है। लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद कई क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं की यह शिकायत सुनाई देती है कि उनकी भूमिका चुनाव तक सीमित होकर रह गई है। कुछ कार्यकर्ता यह भी मानते हैं कि स्थानीय स्तर पर उनकी बात प्रशासन तक नहीं पहुंच रही। हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार संवाद और संगठनात्मक बैठकों के जरिए इस दूरी को कम करने की कोशिश कर रहा है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती स्वाभाविक सत्ता-विरोधी माहौल एंटी-इनकंबेंसी से निपटना है। महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, स्थानीय विकास और सरकारी सेवाओं से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। पार्टी की रणनीति इन मुद्दों का जवाब विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और कानून-व्यवस्था के रिकॉर्ड के आधार पर देने की है। लेकिन चुनावी मैदान में स्थानीय मुद्दों की अहमियत हमेशा बनी रहती है।
भाजपा के भीतर एक और चर्चा यह है कि क्या 2027 का चुनाव पुराने राजनीतिक चेहरों के भरोसे लड़ा जाएगा या युवाओं और नए नेतृत्व को अधिक अवसर मिलेगा। यह फैसला आसान नहीं होगा। पुराने नेताओं का अनुभव पार्टी की ताकत है, जबकि नए चेहरों की मांग कार्यकर्ताओं के एक वर्ग की अपेक्षा है। दोनों के बीच संतुलन बनाना नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होगी। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव विपक्ष से पहले अपने संगठन से जीते जाते हैं। यदि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखती है, स्थानीय असंतोष को समय रहते संबोधित करती है और टिकट वितरण में संतुलन बना पाती है, तो चुनावी मुकाबले में उसे लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि आंतरिक मतभेद सार्वजनिक असंतोष में बदलते हैं, तो विपक्ष को राजनीतिक अवसर मिल सकता है।
भाजपा 2027 में विकास, स्थिरता और नेतृत्व को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। वहीं कांग्रेस बेरोजगारी, पेपर लीक, महंगाई और स्थानीय असंतोष को मुद्दा बनाने की तैयारी में है। ऐसे में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल विपक्ष का मुकाबला करना नहीं, बल्कि अपने संगठन की एकजुटता और कार्यकर्ताओं के भरोसे को मजबूत बनाए रखना भी होगी। 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह सत्ता की स्वाभाविक चुनौतियों के बीच संगठनात्मक ऊर्जा और आंतरिक समन्वय को उसी मजबूती से बनाए रख पाएगी, जिसने उसे पिछले चुनावों में सफलता दिलाई थी।
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