सोमवार, 6 जुलाई 2026

पहाड़ के आंगन से खो गई ‘जंदूरू’ की मधुर तान

गेहूं, मडुवे संग जहां पिसती थीं जीवन की कठिनाइयां पहाड़ के पुराने घरों की रौनक था यह पारंपरिक यंत्र मशीनी युग ने छीनी पहाड़ के पारंपरिक हुनर की साख अतीत के पन्नों में दफन आत्मनिर्भरता की अनूठी पहचान आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं छूट गया है आज जंदूरू देहरादून। पहाड़ के पुराने घरों में सुबह की शुरुआत अक्सर एक मधुर, लयब( आवाज से होती थी। यह आवाज किसी रेडियो या मंदिर की घंटियों की नहीं, बल्कि जंदूरू की होती थी। घर के एक कोने में रखा पत्थर का वह छोटा-सा संसार, जिसमें गेहूं, मडुवा, झंगोरा और जौं पिसते थे और साथ ही पिसती थीं घर की चिंताएं, थकान और जीवन की कठिनाइयां। जंदूरू केवल आटा पीसने की चक्की नहीं था, बल्कि पहाड़ के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा था। यह घर की आत्मनिर्भरता, महिलाओं की मेहनत और परिवार की एकजुटता का प्रतीक था। पहाड़ के अधिकांश लोगों की स्मृतियों में एक दृश्य आज भी जिंदा हैकृभोर की पहली किरण, चूल्हे की धीमी आंच और मां का जंदूरू चलाते हुए कोई लोकगीत गुनगुनाना। मां दोनों हाथों से चक्की घुमाती जाती और साथ ही दिनभर के काम की योजना भी बनाती जाती। जंदूरू की घर्र-घर्र की आवाज घर में एक अलग ही संगीत घोल देती थी। बच्चे अभी बिस्तर में होते, लेकिन उन्हें पता चल जाता था कि अब सुबह हो चुकी है। मां के माथे पर पसीना होता, लेकिन चेहरे पर संतोष। क्योंकि जंदूरू से निकलने वाला आटा केवल भोजन नहीं, बल्कि परिवार की मेहनत और प्रेम का स्वाद लेकर आता था। आज गांवों में बिजली से चलने वाली आटा चक्कियां आ गई हैं। काम आसान हुआ है, समय बचा है, लेकिन जंदूरू का वह स्वाद कहीं पीछे छूट गया। मडुवे की रोटी, झंगोरे का आटा और गेहूं की सोंधी खुशबू, जो हाथ से पिसे आटे में आती थी, वह मशीनों के तेज शोर में कहीं खो गई है। बुजुर्ग आज भी कहते हैं जंदूरू का आटा सिर्फ पेट नहीं भरता था, वह शरीर को ताकत और मन को संतोष भी देता था। जंदूरू पहाड़ की महिलाओं की मेहनत का जीवंत प्रतीक भी है। उन्होंने इसे केवल एक घरेलू उपकरण की तरह नहीं, बल्कि जीवनसाथी की तरह अपनाया। खेतों में काम, पशुओं की देखभाल, पानी और लकड़ी ढोने के बीच जंदूरू चलाना भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। शायद यही कारण है कि जंदूरू की आवाज में पहाड़ की महिलाओं के संघर्ष, त्याग और आत्मनिर्भरता की कहानी छिपी है। आज कई गांवों के पुराने घरों में जंदूरू अब भी मौजूद हैं। किसी कोने में धूल से ढके हुए, किसी छज्जे के नीचे रखे हुए। वे अब आटा नहीं पीसते, लेकिन बीते समय की गवाही जरूर देते हैं। जब गांवों में पलायन बढ़ा, घर खाली हुए और नई पीढ़ी शहरों की ओर चली गई, तो जंदूरू भी धीरे-धीरे खामोश हो गए। उनकी खामोशी मानो यह कहती है कि पहाड़ केवल अपनी आबादी नहीं खो रहा, बल्कि अपनी परंपराएं, अपने स्वाद और अपनी सांस्कृतिक धरोहर भी खो रहा है। जंदूरू किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवंत संस्कृति का हिस्सा है। नई पीढ़ी को इसके महत्व से परिचित कराना जरूरी है। क्योंकि जो समाज अपनी छोटी-छोटी परंपराओं को भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी पहचान भी खोने लगता है। जब भी किसी पुराने पहाड़ी घर के कोने में रखा जंदूरू दिखाई देता है, तो ऐसा लगता है जैसे वह आज भी किसी मां के हाथों के स्पर्श और किसी लोकगीत की प्रतीक्षा कर रहा हो।

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