सोमवार, 6 जुलाई 2026
गोदियाल का धामी पर ‘तंज’
दिल्ली का फैसला या जनता का जनादेश, धामी पर गोदियाल के बयान से सुलगी सियासत
सलेक्टेड सीएम बनाम जनादेश का चेहरा, उत्तराखंड में शुरू हुई नई राजनीतिक जंग
गोदियाल ने धामी की राजनीतिक वैधता पर उठाए सवाल, भाजपा ने बताया जनादेश का अपमान
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी गर्मी अभी दूर है, लेकिन सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। इसकी वजह बना कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदिया का वह बयान, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सलेक्टेड सीएम बताया। गोदियाल का सीधा तंज था कि धामी जनता की पहली पसंद बनकर नहीं, बल्कि पार्टी नेतृत्व की पसंद बनकर मुख्यमंत्री बने हैं। यानी उत्तराखंड की सत्ता की चाबी देहरादून से ज्यादा दिल्ली के हाथ में है। कांग्रेस ने इस बयान के जरिए भाजपा के सबसे मजबूत चेहरे पर सीधे राजनीतिक वार किया है।
कांग्रेस इस नैरेटिव को गढ़ना चाहती है कि मुख्यमंत्री धामी का राजनीतिक कद जनता से ज्यादा पार्टी नेतृत्व के भरोसे खड़ा हुआ है। पार्टी का कहना है कि राज्य के बड़े फैसलों से लेकर नेतृत्व परिवर्तन तक, भाजपा में अंतिम मुहर दिल्ली की लगती है। इसलिए सलेक्टेड सीएम का तंज केवल व्यक्ति पर नहीं, बल्कि भाजपा की कार्यशैली पर हमला है। भाजपा ने इस बयान को लपक लिया। पार्टी नेताओं ने कहा कि धामी के नेतृत्व में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई और मुख्यमंत्री ने जनता के बीच जाकर अपना जनसमर्थन भी साबित किया। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस मुद्दों की लड़ाई हार चुकी है, इसलिए अब व्यक्तिगत और राजनीतिक विशेषणों के सहारे माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी यह भी मानती है कि मुख्यमंत्री धामी उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी हैं। इसलिए कांग्रेस का हमला सीधे भाजपा के चुनावी चेहरे पर हमला है।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो यह विवाद सिर्फ एक बयान का नहीं है। यह 2027 की लड़ाई का शुरुआती ट्रेलर है। कांग्रेस दिल्ली बनाम उत्तराखंड और सलेक्टेड बनाम जनता का नेता का नैरेटिव खड़ा करना चाहती है। वहीं भाजपा विकास, स्थिर नेतृत्व और जनादेश की कहानी को आगे बढ़ाने में जुटी है। उत्तराखंड की राजनीति अब मुद्दों के साथ-साथ शब्दों की लड़ाई में भी उतर चुकी है। सलेक्टेड सीएम एक वाक्य जरूर है, लेकिन इसके पीछे बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा हैकृकांग्रेस मुख्यमंत्री धामी की राजनीतिक स्वीकार्यता को चुनौती देना चाहती है और भाजपा इसे जनादेश पर हमले के रूप में पेश कर रही है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन इतना साफ है कि अब सियासत केवल सड़क, बिजली और पानी पर नहीं चलेगी। लड़ाई इस बात पर भी होगी कि उत्तराखंड का नेतृत्व आखिर तय कौन करता हैकृजनता या पार्टी का शीर्ष नेतृत्व?
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