बुधवार, 22 जुलाई 2026

सुविधाओं के बाजार में यादों का ठिकाना ‘व्यासी’

चारधाम यात्रा की तस्वीर बदली, लेकिन व्यासी में आज भी जिंदा है पुरानी यादों की सोंधी महक चमचमाती सड़कों और कैफे के दौर में व्यासी, यहाँ आज भी ठहरती हैं यात्रियों की पुरानी यादें बदरीनाथ हाईवे का व्यासी एक दौर में था गढ़वाल के पहाड़ी गांवों की आत्मीयता का पहला पता ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग का वह पड़ाव, जहां पराठों की खुशबू आज भी है हर पहाड़ी के जहन में देहरादून। चारधाम यात्रा मार्ग पर आज चमचमाती सड़कें हैं। आधुनिक होटल हैं, फूड प्लाजा हैं, कैफे हैं और हर कुछ किलोमीटर पर यात्रियों के लिए नई सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन इन सबके बीच ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित व्यासी आज भी एक ऐसा नाम है, जिसे सुनते ही पुरानी पीढ़ी की आंखों में यादों की पूरी यात्रा उतर आती है। व्यासी केवल एक पड़ाव नहीं था, बल्कि पहाड़ और यात्रियों के बीच आत्मीयता का पहला परिचय था। यह वह स्थान था, जहां पहाड़ की कठिन यात्रा शुरू होने से पहले लोग कुछ पल सुकून से बैठते थे, जहां चूल्हे पर सिकते पराठों की महक भूख ही नहीं, सफर की थकान भी मिटा देती थी। आज ऋषिकेश से बदरीनाथ की यात्रा पहले की तुलना में कहीं आसान हो गई है। लेकिन तीन-चार दशक पहले यह सफर किसी परीक्षा से कम नहीं होता था। सड़कें संकरी थीं, जगह-जगह कच्चे हिस्से थे और बरसात में घंटों जाम लग जाना सामान्य बात थी। उस दौर में व्यासी यात्रियों के लिए राहत का पहला बड़ा ठिकाना हुआ करता था। चमोली, रुद्रप्रयाग और बदरीनाथ-केदारनाथ, हेमकुड सहित अन्य स्थानों की ओर जाने वाली लगभग हर बस, टैक्सी और ट्रक यहां कुछ देर जरूर रुकते थे। बस रुकते ही यात्री सीधे ढाबों की ओर बढ़ते और कुछ ही देर में पूरे बाजार में चाय की भाप और तवे पर सिकते पराठों की खुशबू फैल जाती थी। यदि गढ़वाल के किसी बुजुर्ग या पुराने यात्री से व्यासी की पहचान पूछी जाए तो पहला जवाब होगाकृव्यासी के पराठे। देसी घी या मक्खन से सने मोटे पराठे, आलू की सब्जी, घर का बना अचार और कुल्हड़ की चाय। यह भोजन किसी होटल के मेन्यू का हिस्सा नहीं था, बल्कि पहाड़ की मेहमाननवाजी का प्रतीक था। कई परिवारों के बच्चों के लिए गांव की यात्रा का सबसे रोमांचक पड़ाव व्यासी ही होता था। बच्चे बस में बैठकर पूछते रहते थेकृव्यासी कब आएगा? क्योंकि उन्हें मालूम होता था कि अब गर्मागर्म पराठे मिलने वाले हैं। व्यासी केवल तीर्थयात्रियों का पड़ाव नहीं था। गढ़वाल के हजारों लोगों के लिए यह घर लौटने का पहला एहसास था। ऋषिकेश और देहरादून से अपने गांव लौटते लोग जब व्यासी पहुंचते थे, तो मानो उन्हें लगता था कि अब वह सचमुच अपने पहाड़ में प्रवेश कर चुके हैं। यहां गंगा की कलकल, जंगलों की हरियाली और पहाड़ों से आती ठंडी हवा यात्रियों का स्वागत करती थी। कई लोग भोजन से पहले गंगा किनारे जाकर कुछ देर बैठते थे। किसी के लिए यह विश्राम था, तो किसी के लिए प्रकृति के बीच कुछ पल बिताने का अवसर। चारधाम आल वेदर रोड परियोजना के बाद इस पूरे मार्ग की तस्वीर बदल चुकी है। यात्रा पहले की अपेक्षा तेज और सुविधाजनक हो गई है। नए होटल, आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड कोर्ट यात्रियों को आकर्षित कर रहे हैं। आज भी जो लोग वर्षों बाद इस मार्ग से गुजरते हैं, उनकी नजर अनायास ही व्यासी के बोर्ड पर टिक जाती है। कई वाहन यहां धीमे हो जाते हैं, क्योंकि यादें अक्सर रफ्तार से ज्यादा मजबूत होती हैं। व्यासी ने केवल यात्रियों को भोजन नहीं दिया, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार और पहचान भी दी। यहां के ढाबे, छोटी दुकानें और स्थानीय उत्पाद बेचने वाले परिवार वर्षों तक इस मार्ग की जीवनरेखा बने रहे। यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच जो अपनापन यहां दिखाई देता था, वह आज भी पहाड़ की सामाजिक संस्कृति का उदाहरण माना जाता है। यहां कोई ग्राहक नहीं होता था, हर आने वाला मेहमान होता था। आज की पीढ़ी शायद व्यासी को केवल एक स्थान के रूप में जानती है, लेकिन इसके पीछे दशकों का इतिहास और हजारों यात्राओं की स्मृतियां जुड़ी हैं। यह वह पड़ाव है जिसने चारधाम यात्रा को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव भी बनाया। आज के दौर में भी व्यासी सिखाता है कि यात्राएं केवल मंजिल तक पहुंचने का नाम नहीं होतीं, बल्कि रास्ते में मिलने वाले लोग, स्वाद, दृश्य और पड़ाव ही उन्हें यादगार बनाते हैं। व्यासी आज भी वहीं हैकृगंगा के किनारे, पहाड़ों की गोद में। समय ने उसका स्वरूप बदला होगा, लेकिन उसकी आत्मा आज भी वैसी ही है। जब भी कोई पुराना यात्री इस मार्ग से गुजरता है, उसके मन में एक ही बात कौंधती है। व्यासी इसलिए खास नहीं कि वहां कभी अच्छे पराठे मिलते थे, बल्कि इसलिए कि वहां पहाड़ का अपनापन परोसा जाता था और यही अपनापन उसे आज भी गढ़वाल की यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव बनाता है।

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