गुरुवार, 23 जुलाई 2026
शांत उत्तराखंड में ‘उबल’ रही है सियासत
उत्तराखंड में विस चुनाव 2027 की जंग से पहले बदला चुनावी मौसम
सत्ता के सामने युवाओं के सवाल और विपक्ष के सामने भरोसे की चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति ऊपर से जितनी शांत दिखाई देती है, भीतर उतनी ही बेचौन है। सचिवालय से लेकर सत्ता के गलियारों तक, भाजपा कार्यालय से लेकर कांग्रेस भवन तक, हर जगह एक ही चर्चा हैकृ2027 की लड़ाई किस मुद्दे पर लड़ी जाएगी? कुछ महीने पहले तक ऐसा लग रहा था कि भाजपा विकास, चारधाम, समान नागरिक संहिता, निवेश, बुनियादी ढांचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनावी आधार बनाएगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सक्रियता भी इसी दिशा में दिखाई दे रही थी। दूसरी ओर कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और सत्ता विरोधी माहौल बनाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन अचानक राजनीतिक समीकरण बदलने लगे हैं।
पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाएं, भर्ती प्रक्रिया, बेरोजगारी, छात्रों का आक्रोश और युवाओं के प्रदर्शन जैसे मुद्दों ने चुनावी बहस में जगह बनानी शुरू कर दी है। राष्ट्रीय स्तर पर उठे इन सवालों की गूंज उत्तराखंड तक पहुंच रही है। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यही निर्णायक चुनावी मुद्दे बनेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इन विषयों ने राजनीतिक चर्चा का दायरा बढ़ा दिया है। सत्ता विरोधी लहर हर चुनाव में एक स्वाभाविक राजनीतिक चुनौती होती है। भाजपा के सामने भी यह चुनौती है कि वह लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए जनता का विश्वास कैसे बनाए रखे।
पार्टी के पक्ष में कुछ मजबूत आधार हैंकृसंगठन की ताकत, केंद्र और राज्य की समन्वित राजनीति, कल्याणकारी योजनाओं का लाभार्थी नेटवर्क और मुख्यमंत्री धामी की सक्रिय छवि। दूसरी ओर उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि रोजगार, भर्ती, पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं और पर्वतीय क्षेत्रों की मूलभूत समस्याएं जनता की प्राथमिकताओं में बनी हुई हैं। यदि विपक्ष इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाता है, तो भाजपा को केवल उपलब्धियां गिनाने से आगे बढ़कर समाधान और संवाद दोनों पर जोर देना होगा। कांग्रेस के लिए यह अवसर भी है और परीक्षा भी। पार्टी को कई मुद्दे मिले हैंकृबेरोजगारी, भर्ती, महंगाई, पलायन और स्थानीय असंतोष। लेकिन केवल सरकार की आलोचना चुनाव नहीं जिताती। कांग्रेस को यह भी दिखाना होगा कि उसके पास शासन का स्पष्ट विकल्प और विश्वसनीय नेतृत्व है। यदि पार्टी केवल विरोध तक सीमित रहती है, तो उसका असर सीमित रह सकता है। लेकिन यदि वह ठोस नीति, संगठनात्मक एकजुटता और स्थानीय नेतृत्व के साथ मैदान में उतरती है, तो मुकाबला अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल लंबे समय से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राज्य गठन में उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही, लेकिन चुनावी स्तर पर वह लगातार सीमित होते गए हैं। फिर भी, यदि स्थानीय मुद्देकृजल, जंगल, जमीन, पलायन और पर्वतीय अस्मिताकृअधिक प्रमुखता से उभरते हैं, तो क्षेत्रीय दलों को कुछ क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर मिल सकता है। राज्य की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार से जुड़ी है। युवाओं की अपेक्षाएं केवल सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं हैं। वह पारदर्शी भर्ती, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निजी निवेश, स्थानीय रोजगार और उद्यमिता के अवसर भी चाहते हैं। यदि राजनीतिक दल इन आकांक्षाओं को गंभीरता से लेते हैं, तो चुनावी बहस का स्तर भी बदल सकता है।
राजनीतिक शोर के बीच उत्तराखंड के मूल प्रश्न अब भी वहीं हैं। पलायन कब रुकेगा? सीमांत गांव कैसे आबाद होंगे? खेती और बागवानी को कैसे लाभकारी बनाया जाएगा? स्वास्थ्य सेवाएं पहाड़ तक कब पहुंचेंगी? शिक्षा और रोजगार के लिए युवाओं को राज्य छोड़ना कब बंद होगा? पर्यटन का लाभ स्थानीय समुदाय तक कैसे पहुंचेगा? इन सवालों का उत्तर किसी एक चुनावी भाषण से नहीं मिलेगा। इनके लिए दीर्घकालिक नीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों की आवश्यकता है।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि 2027 का चुनाव किस दल के पक्ष में जाएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि यह चुनाव केवल नारों का नहीं होगा। जनता विकास भी देखेगी, रोजगार भी पूछेगी। कल्याणकारी योजनाएं भी याद रखेगी, स्थानीय समस्याएं भी। नेतृत्व भी परखेगी और उम्मीदवार भी। उत्तराखंड आज एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है जहां सत्ता के सामने विश्वास बनाए रखने की चुनौती है और विपक्ष के सामने विश्वसनीय विकल्प बनने की। 2027 की राह अभी लंबी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार चुनाव केवल सरकार बदलने या बचाने का नहीं होगा। यह इस बात की भी परीक्षा होगी कि कौन-सा राजनीतिक दल उत्तराखंड के पहाड़, युवाओं और भविष्य की आकांक्षाओं को सबसे प्रभावी ढंग से समझ और संबोधित कर पाता है।
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