बुधवार, 22 जुलाई 2026

सड़क से संसद तक ‘संग्राम’

युवाओं पर लाठीचार्ज के बाद भड़क गया जनआक्रोश राहुल गांधी के नेतृत्व में पीएम आवास का किया घेराव युवाओं के आक्रोश ने सत्ता को कमरों से बाहर निकली नई दिल्ली। संसद के भीतर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं, लेकिन असली लड़ाई अब संसद से निकलकर सड़कों पर दिखाई देने लगी है। संसद कूच कर रहे युवाओं पर हुए लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के बाद जो आंदोलन थमता हुआ दिखाई दे रहा था, उसने अब नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पूरा विपक्ष प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च करता दिखा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर चौतरफा हमला बोला। दिल्ली की सड़कों पर उठते नारों ने यह संदेश दे दिया है कि यह केवल छात्रों या युवाओं का विरोध नहीं रह गया है, बल्कि अब यह राजनीतिक प्रतिरोध का बड़ा मंच बनता जा रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस आंदोलन को शुरुआती दौर में सीमित मानकर देखा जा रहा था, उसी आंदोलन के बढ़ते दबाव ने सत्ता पक्ष के नेताओं और सरकार के प्रतिनिधियों को भी एयर-कंडीशन दफ्तरों से निकलकर सड़क पर आने और प्रदर्शनकारियों से संवाद करने के लिए मजबूर कर दिया। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत है। लोकतंत्र में सरकारें संसद के बहुमत से चलती हैं, लेकिन राजनीतिक माहौल अक्सर सड़क का मूड तय करता है। पिछले कुछ दिनों में यही देखने को मिला। संसद मार्ग पर लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस छोड़ी गई, बैरिकेड लगाए गए, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। लेकिन इसके बाद भी आंदोलन खत्म नहीं हुआ। जंतर-मंतर पर युवाओं की भीड़ लगातार जुटती रही। आंदोलनकारियों के बीच एक नारा तेजी से लोकप्रिय हुआकृलाठी खाई है, झुकेंगे नहीं। यह केवल नारा नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध का संकेत है जिसने आंदोलन को नई ऊर्जा दी। सरकार शायद यह मानकर चल रही थी कि पुलिस कार्रवाई के बाद विरोध कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन घटनाक्रम ने ठीक उलटा संदेश दिया। हर लाठीचार्ज के बाद आंदोलन और व्यापक होता दिखाई दिया। विपक्ष लंबे समय से ऐसे किसी बड़े मुद्दे की तलाश में था, जिस पर वह सरकार को एक साथ घेर सके। युवाओं के आंदोलन ने वह अवसर उपलब्ध करा दिया। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों का एकजुट होकर प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च करना केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं था। इसका स्पष्ट राजनीतिक संदेश था कि विपक्ष अब युवाओं के असंतोष को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। लोकसभा के भीतर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर तीखे हमले हुए और सदन के बाहर इस्तीफे की मांग ने आंदोलन को राजनीतिक धार दे दी। यह वही रणनीति है, जिसे विपक्ष पिछले कुछ वर्षों से अपनाता रहा हैकृजनता के किसी बड़े असंतोष को राजनीतिक आंदोलन में बदलना। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार ने इस आंदोलन की गंभीरता को देर से समझा? जिन नेताओं को अब तक केवल प्रेस कान्फ्रेंस और सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया देते देखा जा रहा था, वे अब आंदोलनकारियों से बातचीत करते नजर आने लगे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। दरअसल, सरकार को यह एहसास होने लगा है कि यदि युवाओं का असंतोष लंबा खिंचता है, तो उसका असर केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य की राजनीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत होते हैं। जब यही वर्ग सड़कों पर उतर आता है, तो सरकारें केवल प्रशासनिक कार्रवाई के भरोसे स्थिति को नियंत्रित नहीं रख सकतीं। सरकार लगातार यह कह रही है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। यह तर्क अपनी जगह सही भी है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हर विरोध का जवाब पुलिस बल से दिया जा सकता है? यदि हजारों युवा अपनी बात कहने के लिए राजधानी तक पहुंच रहे हैं, तो यह केवल सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि भरोसे का संकट भी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे आंदोलनों में सबसे बड़ी गलती तब होती है, जब सत्ता उन्हें केवल प्रशासनिक चुनौती मानकर देखती है। यदि संवाद की जगह टकराव हावी हो जाए, तो आंदोलन का दायरा और बढ़ जाता है। लोकसभा चुनाव के बाद विपक्ष लगातार सरकार को घेरने के लिए नए मुद्दों की तलाश में था। युवाओं का आंदोलन अब उसके लिए एक मजबूत राजनीतिक नैरेटिव बनता दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी लगातार युवाओं, छात्रों और रोजगार के मुद्दों को उठाते रहे हैं। अब सड़क पर चल रहे आंदोलन ने उनकी राजनीति को नई जमीन दे दी है। यदि यह आंदोलन लंबे समय तक जारी रहता है, तो विपक्ष इसे ष्युवा बनाम सरकारष् के राजनीतिक फ्रेम में बदलने की कोशिश करेगा। राजनीति में कई बार सबसे बड़ा नुकसान विरोध से नहीं, बल्कि विरोध को कम आंकने से होता है। सरकार के सामने चुनौती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं, बल्कि यह भरोसा दिलाने की भी है कि युवाओं की आवाज सुनी जा रही है। यदि सरकार केवल पुलिस कार्रवाई के सहारे आंदोलन को नियंत्रित करने की कोशिश करती है, तो इससे विपक्ष को और बड़ा राजनीतिक अवसर मिल सकता है। वहीं यदि संवाद, समाधान और पारदर्शिता की दिशा में ठोस पहल होती है, तो स्थिति सामान्य होने की संभावना भी बन सकती है। दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ दिनों में जो तस्वीर बनी है, उसका संदेश स्पष्ट हैकृलाठी से भीड़ हट सकती है, लेकिन असंतोष नहीं। जब युवा लगातार सड़कों पर डटे रहें, विपक्ष उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर मार्च करे और सरकार के प्रतिनिधियों को भी बातचीत के लिए मैदान में उतरना पड़े, तो यह केवल एक आंदोलन नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण क्षण बन जाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस चुनौती का जवाब केवल प्रशासनिक कदमों से देती है या संवाद और राजनीतिक पहल के जरिए। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी होगा कि विपक्ष इस मुद्दे को रचनात्मक समाधान की दिशा में ले जाता है या केवल राजनीतिक लाभ तक सीमित रखता है। फिलहाल इतना तय है कि संसद के भीतर की बहस अब सड़क पर उतर चुकी है, और सड़क की गूंज संसद की दीवारों तक साफ सुनाई दे रही है।

कोई टिप्पणी नहीं: