बुधवार, 22 जुलाई 2026
सत्ता की ‘होड़’ और अन्य दलों का ‘खेल’
भाजपा-कांग्रेस ही नहीं, बसपा, सपा और आप भी उतरी मैदान में
संगठन विस्तार, कार्यकर्ता सम्मेलन और जनसंपर्क अभियान तेज
2027 की सत्ता की जंग का बिगुल उत्तराखंड में समय से पहले बजा
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी रणभूमि में अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। सत्तारूढ़ भाजपा जहां अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय दल भी अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने के लिए लगातार सक्रियता बढ़ा रहे हैं। इस बार चुनावी मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा। भले ही सत्ता की सीधी लड़ाई इन्हीं दो दलों के बीच मानी जा रही हो, लेकिन छोटे दल कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बनाकर परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश नेतृत्व लगातार संगठनात्मक बैठकों, कार्यकर्ता सम्मेलनों और जनसंपर्क अभियानों में व्यस्त हैं। भाजपा की रणनीति साफ हैकृसरकार की योजनाओं, चारधाम परियोजनाओं, सड़क, रेल, पर्यटन, निवेश और महिला कल्याण कार्यक्रमों को चुनावी मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाना। पार्टी गांव-गांव और घर-घर पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है। बूथ समितियों को सक्रिय करने के साथ-साथ युवा, महिला और सोशल मीडिया नेटवर्क को भी मजबूत किया जा रहा है। भाजपा का मानना है कि मजबूत संगठन और लाभार्थी वर्ग उसके लिए सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, किसानों और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। प्रदेश स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ता सम्मेलन, संवाद कार्यक्रम और जनसभाओं के जरिए सरकार की नीतियों को जनता के सामने चुनौती देने की कोशिश कर रही है। पार्टी का प्रयास है कि सत्ता विरोधी भावना को एक संगठित राजनीतिक अभियान में बदला जाए। हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के बीच तालमेल बनाए रखना भी है।
बहुजन समाज पार्टी भी प्रदेश में अपने संगठन को दोबारा सक्रिय करने में जुट गई है। पार्टी दलित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। बसपा की रणनीति उन विधानसभा क्षेत्रों पर केंद्रित है जहां उसका परंपरागत वोट प्रतिशत चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखता है। पार्टी छोटे-छोटे कार्यकर्ता सम्मेलनों और सदस्यता अभियानों के जरिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी भी सीमित संगठन होने के बावजूद उत्तराखंड में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रही है। विशेषकर तराई और सीमावर्ती क्षेत्रों में पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से जनसंपर्क अभियान चलाया जा रहा है। सपा का लक्ष्य फिलहाल बड़े पैमाने पर सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक मौजूदगी और वोट आधार को मजबूत करना माना जा रहा है।
दिल्ली और पंजाब की राजनीति के बाद उत्तराखंड में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बावजूद आम आदमी पार्टी ने अपनी सक्रियता पूरी तरह समाप्त नहीं की है। पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार जैसे मुद्दों पर फिर से जनता के बीच जाने की तैयारी में है। हालांकि पिछले चुनाव के बाद संगठन कमजोर हुआ है, लेकिन पार्टी नए चेहरों और स्थानीय नेतृत्व के सहारे अपनी पहचान फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड क्रांति दल सहित अन्य क्षेत्रीय दल भी राज्य की अस्मिता, मूल निवास, भू-कानून, रोजगार, जल-जंगल-जमीन और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं। हालांकि पिछले चुनावों में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव सीमित रहा, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्थानीय मुद्दे चुनाव के केंद्र में आए तो कुछ क्षेत्रों में उनका प्रभाव बढ़ सकता है।
इस बार लगभग सभी दलों की रणनीति में दो वर्ग सबसे महत्वपूर्ण दिखाई दे रहे हैंकृयुवा और महिलाएं। युवाओं के लिए रोजगार, भर्ती, शिक्षा और स्वरोजगार प्रमुख मुद्दे हैं, जबकि महिलाओं के लिए महंगाई, स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वयं सहायता समूह और कल्याणकारी योजनाएं चुनावी एजेंडे का हिस्सा बन रही हैं। राजनीतिक दलों का मानना है कि यही दो वर्ग चुनाव परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। गढ़वाल और कुमाऊं के साथ-साथ पहाड़ और मैदान के मुद्दों का संतुलन साधना हर दल की मजबूरी है। पलायन, खाली होते गांव, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन जैसे मुद्दे पर्वतीय क्षेत्रों में चुनावी बहस का केंद्र बन सकते हैं, जबकि तराई क्षेत्रों में कृकृषि, उद्योग और रोजगार प्रमुख विषय रहेंगे। राजनीतिक दलों की लगातार बढ़ती गतिविधियां इस बात का संकेत हैं कि 2027 का चुनाव अब केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि राजनीतिक तैयारी का वर्तमान बन चुका है। बैठकों, रैलियों, सदस्यता अभियानों, जनसंवाद कार्यक्रमों और सोशल मीडिया अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तराखंड में चुनावी शंखनाद समय से पहले हो चुका है।
उत्तराखंड की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता अब केवल चुनावी घोषणाओं से नहीं, बल्कि संगठन की मजबूती, स्थानीय मुद्दों की समझ और जनता के बीच लगातार मौजूदगी से तय होगा। भाजपा अपनी सरकार के कामकाज पर भरोसा जता रही है, कांग्रेस बदलाव की उम्मीद जगाने में लगी है, जबकि बसपा, सपा, आप और क्षेत्रीय दल इस मुकाबले में अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। आने वाले महीनों में यह सक्रियता और तेज होने की संभावना है, क्योंकि 2027 की लड़ाई का पहला दौर अब मैदान में उतर चुका है।
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