गुरुवार, 2 जुलाई 2026
जब ‘विकास’ पहुंचा तब गांव ‘खाली’
उत्तराखंड में पहाड़ के गांवों की यही है सबसे बड़ी विडंबना
सड़क, बिजली और नेटवर्क तो पहुंचा पर लोग पलायन कर गए
सुविधाएं चमक रहीं, लेकिन बूढ़ी आंखों को है अपनों का इंतजार
देहरादून। पहाड़ के उस गांव में अब सड़क है। बिजली के खंभे खड़े हैं। मोबाइल नेटवर्क भी आता है। कई घरों तक पानी की पाइपलाइन पहुंच चुकी है। सरकारी योजनाओं के बोर्ड भी चमक रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच अगर कुछ नहीं है, तो वह हैकृलोगों की आवाज। पहाड़ के गांव आज इसी विडंबना की कहानी कह रहे हैं, जिन गांवों तक विकास पहुंचाने के लिए वर्षों तक संघर्ष हुआ, आज उन्हीं गांवों में ताले लटके हैं। कहीं बूढ़े मां-बाप अकेले रह गए हैं, तो कहीं पूरा गांव ही वीरान हो चुका है।
कभी पहाड़ की जिंदगी कभी सामूहिक संस्कृति की पहचान हुआ करती थी। सुबह खेतों में हलचल, शाम को चौपालों में बैठकी और त्योहारों में पूरे गांव की रौनक दिखाई देती थी। लेकिन अब गांवों की पगडंडियों पर सन्नाटा पसरा है। स्कूलों में बच्चों की संख्या घट गई है। कई प्राथमिक विद्यालय बंद होने की कगार पर हैं। विकास के नाम पर सड़कें तो बन गईं, लेकिन रोजगार नहीं बन पाया। अस्पताल की इमारत खड़ी हो गई, मगर डॉक्टर नहीं पहुंचे। इंटरनेट आ गया, लेकिन गांव में ऐसा काम नहीं आया जिससे युवा वहीं रह सकें। नतीजा यह हुआ कि पहाड़ की जवानी मैदानों की ओर उतर गई।
आज देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे शहरों में उत्तराखंड के युवाओं की लंबी कतार दिखाई देती है। कोई होटल में नौकरी कर रहा है, कोई सिक्योरिटी गार्ड है, तो कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में संघर्ष कर रहा है। गांव में सिर्फ बुजुर्ग और यादें बची हैं। सबसे दर्दनाक तस्वीर उन घरों की है, जहां कभी चूल्हा जलता था, आज वहां घास उग आई है। कई गांवों में साल में सिर्फ गर्मियों की छुट्टियों के दौरान ही थोड़ी हलचल दिखाई देती है, जब शहरों में बसे लोग अपने पुश्तैनी घरों का ताला खोलने लौटते हैं।
राज्य बनने के समय उम्मीद थी कि अलग उत्तराखंड बनने से पहाड़ों की तस्वीर बदलेगी। कुछ बदलाव हुए भी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा रह गयाकृअगर गांवों में लोग ही नहीं बचे, तो विकास आखिर किसके लिए? विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ सड़क और भवन बना देना विकास नहीं होता। असली विकास वह है, जो लोगों को अपने गांव में सम्मानजनक जीवन और रोजगार दे सके। जब तक गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की मजबूत व्यवस्था नहीं होगी, तब तक पलायन की यह कहानी रुकने वाली नहीं। क्योकि सच यही है कि आज गांवों में विकास तो पहुंचा, मगर गांवों में लोग नहीं बचे हैं।
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