शनिवार, 25 जुलाई 2026

‘अपने’ ही करने लगे ‘अपनों’ का विरोध

पेपर लीक पर एबीवीपी ने फूंका पुतला दिल्ली के आंदोलन की गूंज अब पहाड़ों में अपनी ही सरकार के खिलाफ उतरा संगठन देहरादून। देशभर में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब केवल दिल्ली के जंतर-मंतर या संसद मार्ग तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा। इसकी गूंज अब उत्तराखंड के पहाड़ों तक सुनाई देने लगी है। मसूरी में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पुतला फूंके जाने की घटना ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या युवाओं का यह असंतोष अब राजनीतिक सीमाओं को भी पार करने लगा है। यदि मसूरी में यह प्रदर्शन वास्तव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया है, तो यह इसलिए चर्चा का विषय बना क्योंकि भारतीय विद्यार्थी परिषद को व्यापक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा छात्र संगठन माना जाता है और उसकी वैचारिक निकटता भाजपा से मानी जाती है। हालांकि, इस घटना को लेकर संबंधित संगठन का आधिकारिक पक्ष और स्थानीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं। पिछले कुछ सप्ताहों में देशभर के लाखों छात्र और युवा पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में देरी और पारदर्शिता की मांग को लेकर सड़क पर उतरे हैं। जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया तक यह आंदोलन लगातार चर्चा में रहा। युवाओं ने इसे केवल एक परीक्षा का सवाल नहीं, बल्कि अपने भविष्य और व्यवस्था पर भरोसे का मुद्दा बताया। अब मसूरी की घटना को उसी व्यापक छात्र असंतोष की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। यह संकेत देता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी चिंताएं केवल विपक्षी राजनीति का विषय नहीं रहीं, बल्कि छात्र समुदाय के भीतर व्यापक चर्चा का हिस्सा बन चुकी हैं। लंबे समय तक छात्र राजनीति को वैचारिक खांचों में देखा जाता रहा, लेकिन ळमर्द की नई पीढ़ी रोजगार, पारदर्शिता, मेरिट और जवाबदेही जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती दिखाई दे रही है। यही वजह है कि विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े छात्र भी परीक्षा प्रणाली और भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह आंदोलन किसी एक संगठन या दल का नहीं, बल्कि उस पीढ़ी का आंदोलन बनता जा रहा है, जो सोशल मीडिया के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। उत्तराखंड में भाजपा लगातार युवा मतदाताओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। लेकिन यदि पार्टी के वैचारिक दायरे से जुड़े छात्र संगठनों के कार्यकर्ता भी परीक्षा व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक विरोध दर्ज कराते हैं, तो यह सरकार के लिए एक राजनीतिक संकेत हो सकता है कि युवाओं के बीच भरोसा बनाए रखना अब पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण होगा। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी एक स्थानीय प्रदर्शन के आधार पर भाजपा के भीतर व्यापक असहमति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में पार्टी, सरकार और छात्र संगठन इस मुद्दे पर क्या आधिकारिक रुख अपनाते हैं। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पेपर लीक और पलायन पहले से ही युवाओं के प्रमुख मुद्दे हैं। यदि आंदोलन इसी तरह गति पकड़ता है, तो यह चुनावी विमर्श को भी प्रभावित कर सकता है। विरोध सिर्फ एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस बेचौनी का संकेत माना जा सकता है जो देशभर के युवाओं में दिखाई दे रही है। दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी आवाज अब उत्तराखंड के पहाड़ों तक पहुंचती दिख रही है। यदि सरकार समय रहते परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, समयबद्ध भर्तियां और जवाबदेही सुनिश्चित करने में सफल होती है, तो यह असंतोष शांत हो सकता है। लेकिन यदि युवाओं का भरोसा लगातार कमजोर पड़ता गया, तो जेन जी आंदोलन आने वाले समय में केवल छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श भी बन सकता है।

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