शनिवार, 25 जुलाई 2026
पहाड़ के हर घर था अपना ‘बीज बैंक’
बाजार के दौर में भी नहीं बदला पहाड़ की खेती का वह मूलमंत्र
बाजार के हाइब्रिड दौर में भी जिंदा है पारंपरिक बीजों की विरासत
खेतों से लेकर संस्कृति तक बचाए हुए हैं पहाड़ के गांवों की पहचान
देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों में खेती केवल अन्न उगाने का माध्यम नहीं रही, बल्कि यह संस्क्ृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता की जीवनरेखा रही है। यहां हर गांव में कभी बीजों का अपना खजाना हुआ करता था। एक किसान के पास यदि मंडुवा, झंगोरा, गहत, भट्ट, राजमा, चौलाई, रामदाना, जख्या, तिल, उड़द और स्थानीय धान की किस्में सुरक्षित थीं, तो उसे समृद्ध माना जाता था। आज जब बाजार हाइब्रिड बीजों और रासायनिक खेती की ओर बढ़ चुका है, तब भी पहाड़ के कुछ गांव ऐसे हैं, जहां पारंपरिक बीजों की यह विरासत अब भी सांस ले रही है। यह केवल खेती की कहानी नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है कि बीज बचेंगे, तभी पहाड़ बचेगा।
पहाड़ की महिलाएं फसल कटने के बाद सबसे पहले अगले साल के लिए सबसे स्वस्थ और अच्छे दानों को अलग रखती थीं। इन बीजों को राख, नीम की पत्तियों, भांग की पत्तियों या मिट्टी के बर्तनों में सुरक्षित रखा जाता था। न कोई कंपनी, न कोई पैकेट और न ही हर साल बीज खरीदने की मजबूरी। गांवों में बीजों का लेन-देन भी रिश्तों की तरह होता था। यदि किसी किसान का बीज खराब हो जाए तो पड़ोसी बिना किसी कीमत के उसे बीज दे देता था। इसे केवल मदद नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी माना जाता था।
पहाड़ के पारंपरिक बीज केवल फसल नहीं, बल्कि स्थानीय जलवायु के अनुरूप विकसित हुई पीढ़ियों की बुद्धिमत्ता हैं। मंडुवादृ कम पानी में भी अच्छी पैदावार, कैल्शियम और आयरन से भरपूर,झंगोरा सूखे क्षेत्रों का भरोसेमंद अनाज,गहतदृ दाल ही नहीं, पारंपरिक चिकित्सा का भी हिस्सा,भट्टदृ पहाड़ी व्यंजनों की शान और प्रोटीन का बड़ा स्रोत,चौलाई और रामदानादृ पोषण से भरपूर और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली फसलें,जख्या उत्तराखंड के स्वाद की पहचान। इन बीजों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पहाड़ की कठोर जलवायु में भी टिके रहते हैं और कम संसाधनों में खेती संभव बनाते हैं।
पिछले दो दशकों में कृषि बाजार तेजी से बदला। अधिक उत्पादन के वादे के साथ हाइब्रिड बीज गांवों तक पहुंचे। धीरे-धीरे किसानों ने पारंपरिक किस्मों की जगह बाजार से खरीदे जाने वाले बीजों को अपनाना शुरू किया। इसके कई दुष्परिणाम सामने आएकृहै। इसमें हर साल नया बीज खरीदने की मजबूरी, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरत, स्थानीय किस्मों का तेजी से लुप्त होना, खेती की लागत में लगातार वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के प्रति फसलों की संवेदनशीलता प्रमुख है। आज कई गांव ऐसे हैं जहां कभी उगने वाली स्थानीय धान या गेहूं की किस्मों के नाम तक नई पीढ़ी नहीं जानती।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक बीज जलवायु परिवर्तन के दौर में सबसे अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं। अनियमित बारिश, सूखा और तापमान में बदलाव जैसी परिस्थितियों में स्थानीय बीज अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल रहते हैं। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक अब फिर से स्थानीय बीजों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण पर जोर दे रहे हैं। पहाड़ की ग्रामीण महिलाओं ने इस विरासत को बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। स्वयं सहायता समूह, महिला मंगल दल और कई स्थानीय संगठन गांव-गांव में बीज संरक्षण अभियान चला रहे हैं।
कुछ स्थानों पर सामुदायिक बीज बैंक बनाए गए हैं, जहां किसान पारंपरिक बीज जमा भी करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर वापस भी लेते हैं। इससे बीजों की विविधता बनी रहती है। पहाड़ में जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ पारंपरिक बीजों की मांग भी बढ़ रही है। महानगरों में मंडुवा, झंगोरा, गहत और भट्ट जैसे उत्पाद अब ष्सुपर फूडष् के रूप में बिक रहे हैं। विडंबना यह है कि जिन अनाजों को कभी गरीब का भोजन कहा जाता था, वही आज स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन ने पारंपरिक खेती को सबसे बड़ा झटका दिया है। खेत खाली हुए तो बीज भी गायब होने लगे। जिन परिवारों ने पीढ़ियों तक बीजों को संभाला, उनके गांव छोड़ने के साथ वह ज्ञान भी धीरे-धीरे समाप्त होता गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। गांव स्तर पर बीज मेलों, स्थानीय बीज बैंक, स्कूलों में कृषि शिक्षा और किसानों को पारंपरिक बीजों के संरक्षण के लिए प्रोत्साहन जैसी पहल जरूरी हैं। यदि आज इन बीजों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में पढ़ेंगी कि कभी उत्तराखंड के खेतों में सैकड़ों स्थानीय किस्में उगती थीं। पहाड़ का भविष्य केवल सड़कों, सुरंगों और बड़े निवेश से तय नहीं होगा। वह इस बात से भी तय होगा कि क्या हम अपनी मिट्टी के मूल बीज बचा पाए। पारंपरिक बीज केवल कृषि की धरोहर नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, लोक संस्कृति और आत्मनिर्भरता का आधार हैं। पहाड़ के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अगली फसल कौन-सी होगी, बल्कि यह है कि अगली पीढ़ी के पास अपने खेतों के मूल बीज बचेंगे भी या नहीं।
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