बुधवार, 29 जुलाई 2026
पहाड़ की असली ताकत थी ‘साझी संस्कृति’
पहाड़ की सामूहिक श्रम परंपरा आज भी सिखाती है साथ चलने का मंत्र
बिना मजदूरी, बिना अनुबंध और बिना स्वार्थ के रहते थे मिलकर ग्रामीण
खेत जोतते, घर बनाते व संकट में एक-दूसरे का हाथ थामते थे सभी लोग
परंपरा भले ही कमजोर हो गई, लेकिन इसकी आत्मा है पहाड़ की पहचान
देहरादून। पहाड़ का जीवन केवल ऊंचे-ऊंचे पर्वतों, नदियों और देवस्थलों तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे बड़ी ताकत रही है यहां की सामुदायिक संस्कृति। एक समय था जब गांव में किसी के खेत की बुवाई हो, किसी का घर बन रहा हो, छत पर पत्थर चढ़ाने हों, सिंचाई की गूल साफ करनी हो या किसी परिवार पर संकट आया होकृपूरा गांव बिना बुलावे और बिना किसी पारिश्रमिक के एक साथ जुट जाता था। इसे ही पहाड़ में सामूहिक श्रम की परंपरा कहा जाता था। यह केवल काम करने का तरीका नहीं था, बल्कि सामाजिक जीवन का ऐसा सूत्र था जिसने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी गांवों को आत्मनिर्भर बनाए रखा। सामूहिक श्रम ने पहाड़ के लोगों को यह विश्वास दिया कि किसी एक का संकट पूरे गांव का संकट है और किसी एक की खुशी पूरे गांव की खुशी।
उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा को स्थानीय बोलियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है। कहीं इसे परमा कहा गया, कहीं सहकार, तो कहीं पैंचा या अन्य स्थानीय नाम प्रचलित रहे। नाम भले बदलते रहे हों, लेकिन भावना एक ही थीकृआज मैं तुम्हारे खेत में काम करूंगा, कल तुम मेरे खेत में। धान की रोपाई के दिनों में गांव की महिलाएं कतार बनाकर खेतों में उतरती थीं। लोकगीतों की मधुर धुन के बीच रोपाई होती और पूरा वातावरण उत्सव जैसा हो जाता। पुरुष खेत तैयार करते, पानी की व्यवस्था संभालते या अन्य श्रम कार्य करते। इसी तरह गेहूं की कटाई, मंडाई, घास काटना, जंगल से लकड़ी लाना और पशुओं के लिए चारा जुटाना भी सामूहिक प्रयास का हिस्सा था।
पहाड़ में मकान निर्माण भी इसी सहयोग की मिसाल था। आज जहां एक मकान बनाने में ठेकेदार और बड़ी रकम की जरूरत पड़ती है, वहीं पहले पूरा गांव मिलकर पत्थर ढोता, लकड़ी लाता, मिट्टी तैयार करता और छत डालने तक का काम साथ करता था। बदले में केवल आत्मीयता, सम्मान और एक सामूहिक भोजन ही पर्याप्त माना जाता था। सामूहिक श्रम केवल आर्थिक मजबूरी नहीं था। यह सामाजिक सुरक्षा का भी आधार था। किसी परिवार में बीमारी हो, किसी के यहां विवाह हो, किसी के घर शोक का माहौल हो या प्राकृतिक आपदा आ जाएकृगांव के लोग बिना औपचारिक निमंत्रण के मदद के लिए पहुंच जाते थे। यही कारण था कि सीमित संसाधनों के बावजूद पहाड़ का सामाजिक ताना-बाना लंबे समय तक मजबूत बना रहा।
हालांकि बदलते समय के साथ इस परंपरा पर असर पड़ा है। गांवों से लगातार हो रहा पलायन, छोटे होते परिवार, नकद अर्थव्यवस्था का विस्तार और आधुनिक जीवनशैली ने सामूहिक श्रम की संस्कृति को कमजोर किया है। अब जिन कार्यों के लिए पहले पूरा गांव जुटता था, वहां मजदूर बुलाने की परंपरा बढ़ गई है। कई गांवों में खेत खाली पड़े हैं और पुराने लोकगीतों की गूंज भी कम सुनाई देती है। इसके बावजूद यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज भी कई दूरस्थ गांवों में सिंचाई की नहरों की सफाई, मंदिरों के रख-रखाव, पैदल मार्गों की मरम्मत, जलस्रोतों के संरक्षण, वनाग्नि रोकने और आपदा के समय राहत कार्यों में सामूहिक श्रम की भावना जीवित दिखाई देती है। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से और युवा विभिन्न सामाजिक अभियानों में मिलकर इस विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
आज के दौर में जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पलायन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे उत्तराखंड में सामूहिक श्रम की परंपरा फिर से प्रासंगिक हो सकती है। यदि ग्राम पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से इस संस्कृति को नई ऊर्जा मिले, तो जल संरक्षण, पारंपरिक खेती, वन संरक्षण और ग्रामीण विकास के कई कार्य कम लागत में अधिक प्रभावी ढंग से किए जा सकते हैं। पहाड़ ने हमेशा सिखाया है कि कठिन रास्तों को अकेले नहीं, बल्कि मिलकर पार किया जाता है। यही कारण है कि सामूहिक श्रम केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी है। जब समाज साथ खड़ा होता है, तब विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि लोगों की सहभागिता से आगे बढ़ता है।
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