मंगलवार, 14 जुलाई 2026
पलायन के थपेड़ों में जमींदोज हो गई ‘छानी’
पहाड़ की छानियों में बसते थे खेत, पशु व परिवार के सपने
महानगरों की चकाचौंध ने उजाड़ दी पहाड़ की यह धरोहर
अब सिर्फ खंडहर और यादों में सिमट कर रह गई है छानी
देहरादून। पहाड़ के गांवों की पहचान केवल पत्थर के मकानों, सीढ़ीनुमा खेतों और देवदार के जंगलों से ही नहीं होती थी, बल्कि उनकी आत्मा बसती थी छानी में। आज नई पीढ़ी के लिए यह केवल एक पुराना शब्द रह गया है, लेकिन कभी यही छानी पहाड़ के किसान की दूसरी दुनिया हुआ करती थी। खेतों की रखवाली से लेकर पशुपालन, घास-लकड़ी के संग्रह, खेती-बाड़ी और पारिवारिक जीवन तककृछानी पहाड़ की आत्मनिर्भर जीवनशैली का सबसे मजबूत आधार थी। आज जब पलायन के कारण गांव खाली हो रहे हैं और खेती लगातार सिमट रही है, तब सबसे पहले वीरान हुई हैं पहाड़ की छानियां। कभी जिनमें चूल्हा जलता था, पशुओं की घंटियां बजती थीं और बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है।
बता दें कि छानी वह छोटा पत्थर और लकड़ी का पारंपरिक भवन होता था, जिसे गांव से कुछ दूरी पर खेतों या बुग्यालों के पास बनाया जाता था। इसका उद्देश्य केवल रहने की जगह उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि खेती और पशुपालन को सुविधाजनक बनाना था। बरसात और खेती के मौसम में परिवार के सदस्य कई-कई दिनों तक छानी में रहते थे। नीचे पशुओं के लिए गोठ और ऊपर रहने की व्यवस्था होती थी। मोटी पत्थर की दीवारें, स्लेट की छत और लकड़ी के मजबूत दरवाजे इसे मौसम के अनुकूल बनाते थे।
जब पहाड़ के गांवों में सड़कें नहीं थीं, मशीनें नहीं थीं और आधुनिक कृकृषि उपकरण उपलब्ध नहीं थे, तब छानी ही खेती का संचालन केंद्र होती थी। सुबह खेत, दिन में पशुपालन और शाम को चूल्हे की आगकृयही पहाड़ का जीवन था। दूध, दही, घी, मंडुवा, झंगोरा, राजमा और अन्य कृषि उत्पादों की पूरी व्यवस्था छानी के इर्द-गिर्द चलती थी। यही कारण था कि पहाड़ की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था में छानी का विशेष महत्व था।
छानी केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं थी, बल्कि लोक संस्कृति का विद्यालय भी थी। रात के समय बुजुर्ग लोककथाएं सुनाते थे, महिलाएं लोकगीत गाती थीं और बच्चे खेती-पशुपालन के गुर सीखते थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारंपरिक ज्ञान यहीं हस्तांतरित होता था। घास काटने, पशुओं की देखभाल, मौसम पहचानने, बीज सुरक्षित रखने और जंगल के साथ संतुलन बनाकर जीने की सीख छानी के जीवन का हिस्सा थी। उत्तराखंड में बढ़ते पलायन ने गांवों के साथ-साथ छानियों को भी वीरान कर दिया। जब खेती छूटी, पशुपालन घटा और परिवार शहरों की ओर चले गए, तब छानियों के चूल्हे बुझ गए।
आज हजारों छानियां टूट चुकी हैं। कहीं छतें गिर गई हैं, कहीं दीवारों पर झाड़ियां उग आई हैं। कई स्थानों पर केवल पत्थरों के ढेर इस बात की गवाही देते हैं कि यहां कभी जीवन धड़कता था। यह नहीं कि सभी जगह ऐसा ही हो गया है। पहाड़ में कई स्थानों पर आज भी ग्रामीण परिवेश की यह झलक देखने को मिलती है पर नगण्य। आज के दौर में यदि इन पारंपरिक छानियों का संरक्षण किया जाए, तो इन्हें ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे और सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे न केवल स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, बल्कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ सकेगी। यूरोप और हिमालय के कई क्षेत्रों में पारंपरिक कृषि आवासों को विरासत पर्यटन से जोड़ा गया है। पहाड़ में भी ऐसी पहल छानियों को नया जीवन दे सकती है।
सीमेंट और कंक्रीट के आधुनिक मकानों के बीच छानी अब अतीत की निशानी बनती जा रही है। लेकिन यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि पहाड़ के श्रम, प्रकृति, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक जीवन का प्रतीक है। यदि आज इन्हें संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों और तस्वीरों में ही जान पाएंगी कि कभी उत्तराखंड का किसान खेतों के बीच बनी अपनी छानी में रहकर पूरे परिवार के साथ जीवन बिताता था।
आज के दौर में छानी को बचाना केवल पुरानी इमारतों को बचाना नहीं है, बल्कि पहाड़ की उस जीवन-प(ति को बचाना है जिसने सीमित संसाधनों में प्रकृति के साथ संतुलित और सम्मानजनक जीवन जीने की मिसाल पेश की। विकास की दौड़ में यदि हमारी छानियां खो गईं, तो हम केवल पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृति, लोकज्ञान और पहाड़ की आत्मा का एक अनमोल अध्याय भी खो देंगे।
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