गुरुवार, 23 जुलाई 2026

मंत्री की ‘चौखट’ पर युवाओं की ‘चीख’

अब हक मांगने के लिए जान दांव पर लगाने को मजबूर हो गया है उत्तराखंड का युवा स्वास्थ्य मंत्री के आवास के बाहर नर्सिंग अभ्यर्थियों की बेबसी है व्यवस्था का आरोप-पत्र उत्तराखंड में धरने और नारों से भी अब आगे बढ़ गया है नर्सिंग अभ्यर्थियों का आक्रोश प्रतियोगी परीक्षाओं के फेर में उम्र और सपने गंवाते प्रदेश के युवाओं का फूट गया दर्द देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विरोध-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। धरने होते हैं, ज्ञापन दिए जाते हैं, नारे लगते हैं और फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन जब किसी मंत्री के सरकारी आवास के बाहर युवा आत्महत्या का प्रयास करने पर मजबूर हो जाएं, तब यह केवल एक प्रदर्शन नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था पर आरोप-पत्र बन जाता है, जो युवाओं को उम्मीद देने के बजाय निराशा की आखिरी सीढ़ी तक पहुंचा रही है। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल के आवास के बाहर नर्सिंग अभ्यर्थियों का प्रदर्शन अचानक उस समय गंभीर मोड़ पर पहुंच गया, जब कुछ अभ्यर्थियों ने आत्महत्या का प्रयास किया। पुलिस और मौके पर मौजूद लोगों ने उन्हें रोक लिया, लेकिन सवाल वहीं रह गयाकृक्या उत्तराखंड का युवा अब अपनी बात सुनाने के लिए जान दांव पर लगाने को मजबूर हो रहा है? यह दृश्य केवल एक विभाग की भर्ती का नहीं था। यह उन हजारों युवाओं की बेचौनी का प्रतीक था, जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, परिणामों और नियुक्तियों के बीच अपनी उम्र और उम्मीदें गंवा रहे हैं। राजनीति अक्सर कहती है कि उत्तराखंड युवाओं का राज्य है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह युवाओं के अवसरों का भी राज्य है? नर्सिंग अभ्यर्थी सड़क पर इसलिए नहीं हैं कि उन्हें राजनीति करनी है। वह इसलिए सड़क पर हैं क्योंकि उनके हाथों में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं। उन्होंने पढ़ाई की, प्रशिक्षण लिया, परीक्षाएं दीं और अब नियुक्ति की उम्मीद में सरकार के दरवाजे खटखटा रहे हैं। जब दरवाजे नहीं खुले तो वह मंत्री के आवास तक पहुंच गए। सरकार की भी अपनी दलील हो सकती है। भर्ती प्रक्रियाओं के अपने नियम हैं, प्रशासनिक बाधाएं हैं, वित्तीय सीमाएं हैं। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल नियम गिनाना नहीं, बल्कि संवाद कायम रखना भी है। यदि युवा यह महसूस करने लगें कि उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है, तो असंतोष गहराता है। उत्तराखंड में यह पहला अवसर नहीं है जब भर्ती से जुड़े मुद्दों ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया हो। पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, नियुक्तियों में देरी और रिक्त पदों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। हर बार सरकार ने कार्रवाई और सुधार का भरोसा दिया। लेकिन जब फिर कोई समूह सड़क पर बैठा दिखाई देता है, तो यह संकेत देता है कि समस्या अभी समाप्त नहीं हुई है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि विरोध का स्वर अब केवल नारों तक सीमित नहीं रह गया। जब कोई युवा आत्महत्या जैसा कदम उठाने की कोशिश करता है, तो यह केवल व्यक्तिगत निराशा नहीं होती यह व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का संकेत भी हो सकता है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह मुद्दा आने वाले समय में सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। विपक्ष निश्चित रूप से इसे बेरोजगारी, रिक्त पदों और युवाओं की उपेक्षा से जोड़कर सरकार पर हमला करेगा। कांग्रेस पहले ही रोजगार और भर्ती के मुद्दों को लगातार उठा रही है। यदि ऐसे घटनाक्रम बढ़ते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकट भी बन सकते हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी जिम्मेदारी विपक्ष की भी है। केवल सरकार को घेरना पर्याप्त नहीं है। युवाओं की समस्याओं का समाधान केवल प्रेस कान्फ्रेंस और धरनों से नहीं निकलेगा। सत्ता और विपक्षकृदोनों को भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, समयब( और विश्वसनीय बनाने पर गंभीर पहल करनी होगी। उत्तराखंड के पहाड़ों से हर साल हजारों युवा रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर जाते हैं। जो यहीं रहकर सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं, यदि वही निराशा में डूबने लगें, तो यह किसी भी सरकार के लिए गंभीर चेतावनी है। स्वास्थ्य विभाग की विडंबना भी कम नहीं है। एक ओर अस्पतालों में स्टाफ की कमी की चर्चा होती है, दूसरी ओर प्रशिक्षित नर्सिंग अभ्यर्थी नियुक्ति की मांग को लेकर सड़कों पर हैं। यदि जरूरत और उपलब्ध मानव संसाधन के बीच संतुलन नहीं बन पा रहा, तो यह नीति-निर्माण पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अब सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहलाकृइस घटना को एक सामान्य प्रदर्शन मानकर भूल जाए। दूसराकृइसे एक चेतावनी की तरह ले और संवाद, पारदर्शिता तथा समयब( निर्णय के जरिए युवाओं का भरोसा लौटाने की कोशिश करे। क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी सफलता केवल योजनाएं बनाना नहीं होती, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि उसके राज्य का कोई युवा अपने भविष्य के लिए इतना निराश न हो जाए कि उसे जीवन समाप्त करने का विचार आए। उत्तराखंड को इस घटना को केवल एक विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चेतावनी के रूप में देखना होगा। क्योंकि जिस राज्य का युवा उम्मीद छोड़ने लगे, वहां केवल नौकरियां नहीं, भरोसा भी संकट में पड़ जाता है।

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