गुरुवार, 23 जुलाई 2026

‘डबल इंजन’ के दावों पर ‘युवा आक्रोश’ भारी

पेपर लीक, छात्रों का गुस्सा और राहुल की सियासत भाजपा के चुनावी रथ के सामने युवाओं की नाराजगी दिल्ली में सड़कों से उठे छात्र आंदोलन से आया भूचाल देहरादून। राजनीति में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो भाषणों से नहीं, तस्वीरों से चुनाव बदल देती हैं। दिल्ली में छात्रों के आंदोलन पर हुई पुलिस कार्रवाई, पेपर लीक को लेकर देशभर में उठे सवाल और उसके बाद विपक्ष की आक्रामक राजनीति ने उत्तराखंड की चुनावी बिसात पर भी नई चाल चल दी है। भाजपा ने शायद सोचा था कि 2027 का चुनाव विकास, डबल इंजन, निवेश, चारधाम और संगठन की मजबूती पर लड़ा जाएगा, लेकिन अचानक पूरा विमर्श बदलता दिखाई दे रहा है। अब चर्चा सड़कों की नहीं, चर्चा स्टार्टअप की नहीं,चर्चा निवेश की नहीं, चर्चा हैकृपेपर लीक, बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य की और राजनीति का सबसे खतरनाक सच यही होता है कि जब जनता मुद्दा तय करने लगे, तब राजनीतिक दलों की रणनीतियां अक्सर बिखरने लगती हैं। उत्तराखंड भाजपा पिछले कई महीनों से चुनावी मोड में दिखाई दे रही थी। बूथ समितियां सक्रिय थीं, लाभार्थी सम्मेलन चल रहे थे, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार जिलों का दौरा कर रहे थे और संगठन चुनावी गणित मजबूत करने में जुटा था। लेकिन दिल्ली में छात्रों पर लाठीचार्ज और पेपर लीक की बहस ने अचानक पूरा राजनीतिक फोकस बदल दिया। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा युवा आखिर सोच क्या रहा है? क्योंकि उत्तराखंड का शायद ही कोई ऐसा गांव होगा, जहां कोई बेटा या बेटी सरकारी नौकरी की तैयारी न कर रहा हो। यानी यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं यह हर घर का मुद्दा है। कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को चुनावी नैरेटिव में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है। धरने,प्रदर्शन, प्रेस कान्फ्रेंस,सोशल मीडिया अभियान, हर मंच से एक ही संदेशकृयुवाओं की लड़ाई अब कांग्रेस की लड़ाई है। राहुल गांधी लगातार छात्रों और युवाओं के मुद्दों पर मुखर दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस की कोशिश है कि छात्र असंतोष को रोजगार, भर्ती और शिक्षा व्यवस्था से जोड़कर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाए। यही कारण है कि भाजपा लगातार आरोप लगा रही है कि राहुल गांधी छात्रों के मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं। लेकिन राजनीति में सवाल यह नहीं होता कि कौन राजनीति कर रहा है। सवाल यह होता है कि जनता किसकी बात सुन रही है। उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक सड़क, पलायन, चारधाम, क्षेत्रीय अस्मिता और विकास के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन इस बार तस्वीर अलग है। हर भर्ती, हर परीक्षा,हर नियुक्ति अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं रह गई है। वह सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुकी है। युवाओं के बीच यह धारणा बनी कि उनकी मेहनत का सम्मान नहीं हो रहा, तो इसका असर सीधे मतदान पर पड़ सकता है। यही भाजपा की सबसे बड़ी चिंता मानी जा रही है। चुनाव भाषणों से कम और माहौल से ज्यादा जीते जाते हैं। यदि विपक्ष यह माहौल बनाने में सफल हो गया कि सरकार युवाओं के सवालों से बच रही है, तो सत्ता के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि भाजपा अब केवल कांग्रेस का जवाब नहीं दे रही, बल्कि युवाओं तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रही है कि सरकार रोजगार, भर्ती और पारदर्शिता के मुद्दों पर गंभीर है। यानी चुनावी रणनीति के साथ-साथ डैमेज कंट्रोल भी शुरू हो चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल सरकार बनाम विपक्ष नहीं होगा। यह उम्मीद बनाम निराशा की लड़ाई भी हो सकती है। एक तरफ भाजपा विकास का रिपोर्ट कार्ड लेकर जाएगी। दूसरी तरफ कांग्रेस युवाओं की नाराजगी को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। अब देखना यह होगा कि जनता विकास के दावों पर भरोसा करती है या रोजगार के सवालों पर सरकार से जवाब मांगती है। राजनीति में सरकारें हमेशा विपक्ष से नहीं हारतीं। सरकारें तब मुश्किल में आती हैं, जब युवाओं की उम्मीदें सवाल बन जाती हैं। 2027 के चुनाव में शायद जनता नेताओं से यह नहीं पूछेगी कि कितनी सड़कें बनीं, बल्कि यह पूछेगीकृकि कितने युवाओं को नौकरी मिली? कितनी भर्तियां समय पर पूरी हुईं? पेपर लीक कब रुकेगा? यही वह सवाल हैं जो उत्तराखंड की चुनावी राजनीति का चेहरा बदल सकते हैं।

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