शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

‘दावे’ बेमिसाल पर कटघरे में ‘कंट्रोल’

यूटीयू पेपर लीक से लेकर बदरी-केदार मंदिरों के चढ़ावे तक सरकार के दावों पर उठते सवालों को विपक्ष बना रहा हथियार विकास की पटकथा पर भारी पड़ रहे हैं तीन सुलगते सवाल देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी शंखनाद अभी औपचारिक रूप से नहीं हुआ है, लेकिन मुद्दों की लड़ाई शुरू हो चुकी है। सत्ता पक्ष विकास, निवेश, चारधाम आल वेदर रोड, समान नागरिक संहिता, धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढांचे की उपलब्धियों के साथ जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल ऐसे मुद्दों की तलाश में हैं, जो सरकार की विश्वसनीयता पर सीधे सवाल खड़े करें। ऐसे में तीन मुद्दे लगातार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैंकृयूटीयू पेपर लीक का मामला, बदरी-केदार मंदिरों के चढ़ावे को लेकर उठे विवाद और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल। इन तीनों मुद्दों की प्रकृति अलग है, लेकिन विपक्ष इन्हें एक ही राजनीतिक संदेश में पिरोने की कोशिश कर रहा हैकृसरकार बड़े दावे करती है, लेकिन व्यवस्था पर नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है। उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाला युवा पहले ही सीमित अवसरों से जूझ रहा है। ऐसे में जब परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो उसका असर केवल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हजारों परिवारों तक पहुंचता है। यूटीयू पेपर लीक का मामला इसी कारण राजनीतिक महत्व हासिल कर चुका है। विपक्ष का आरोप है कि यदि परीक्षा प्रणाली सुरक्षित नहीं है तो युवाओं का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? सरकार का पक्ष है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाते हुए लगातार पूछ रहा हैकृजब दावे इतने बड़े थे तो लीक हुआ कैसे? यही सवाल अब गांवों तक पहुंच चुका है। उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे धामों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाया गया चढ़ावा केवल आर्थिक विषय नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक भी है। चढ़ावे से जुड़े विवादों और अनियमितताओं के आरोपों ने विपक्ष को सरकार को घेरने का नया अवसर दिया है। सरकार ने जांच, कार्रवाई और जवाबदेही की बात कही है। लेकिन विपक्ष इसे यह कहकर जनता के बीच ले जा रहा है कि जब भगवान का चढ़ावा सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? यह राजनीतिक नारा भले हो, लेकिन चुनावी सभाओं में इसकी गूंज सुनाई देने लगी है। भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा बताते हुए विकास कार्यों को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रही है। पार्टी का दावा है कि पिछले वर्षों में सड़क, स्वास्थ्य, रेल, चारधाम परियोजनाओं, निवेश और धार्मिक पर्यटन में अभूतपूर्व काम हुआ है। भाजपा का मानना है कि जनता चुनाव में आरोप नहीं, विकास देखेगी। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विकास और जवाबदेही दोनों अलग-अलग विषय नहीं हैं। जनता अब यह भी देखना चाहती है कि यदि कोई गड़बड़ी होती है तो सरकार कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्रवाई करती है। कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि अलग-अलग घटनाओं को जोड़कर सरकार के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जाए। पेपर लीक, बेरोजगारी, पलायन, मंदिरों के चढ़ावे, महंगाई और प्रशासनिक फैसलों को जोड़कर कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि राज्य में जवाबदेही कमजोर हुई है। हालांकि कांग्रेस के सामने चुनौती भी कम नहीं है। उसे केवल सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह परीक्षा प्रणाली, धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन और प्रशासनिक पारदर्शिता में क्या बदलाव करेगी। उत्तराखंड के चुनाव में हमेशा सैनिक, किसान, महिला मतदाता और क्षेत्रीय संतुलन की चर्चा होती रही है। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है। सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे लाखों युवा और उनके परिवार चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। पेपर लीक का मामला केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि विश्वास का संकट बन चुका है। यदि युवा यह महसूस करता है कि उसकी मेहनत सुरक्षित नहीं है, तो उसका असर सीधे मतदान पर पड़ सकता है। 2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं होगा। यह सरकार की प्रशासनिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगी। क्या सरकार विवादित मामलों में समयबद्ध जांच पूरी कर पाएगी? क्या दोषियों को सजा मिलेगी? क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुकेगी? यही वह सवाल हैं, जिनका उत्तर जनता चुनाव से पहले जानना चाहेगी। उत्तराखंड की राजनीति में कभी सड़क मुद्दा बनी, कभी पलायन, कभी गैरसैंण, कभी भू-कानून। अब ऐसा लगता है कि युवाओं का भविष्य और व्यवस्था की विश्वसनीयता भी उसी सूची में शामिल हो चुके हैं। यदि विपक्ष इन मुद्दों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने में सफल रहता है और सरकार समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं दिखा पाती, तो 2027 के चुनाव में विकास के साथ-साथ पेपर लीक, चढ़ावा और जवाबदेही भी बड़े चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार केवल अपने काम से नहीं, बल्कि संकट के समय अपनी जवाबदेही से भी आंकी जाती है।

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