शनिवार, 18 जुलाई 2026

श्रम, संघर्ष और संस्कृति की प्रतीक है ‘घस्यारी’

देवभूमि की असली देवी है घस्यारी, बुग्यालों से भी भारी है इनका हौसला खूबसूरत नज़ारों के पीछे छिपा संघर्ष, जिसने सदियों से बचा कर रखी है पहाड़ की साख पहाड़ की घस्यारी का सिर पर घास का गट्ठर, कंधों पर पूरे पहाड़ का जीवन देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ों की पहचान केवल हिमालय, देवदार, बुग्याल और मंदिरों से नहीं है। इस प्रदेश की असली ताकत उन महिलाओं में बसती है, जिन्हें गांवों में प्यार से घस्यारी कहा जाता है। घस्यारीकृयानी वह महिला जो रोज जंगलों से पशुओं के लिए घास काटकर लाती है। यह शब्द छोटा है, लेकिन इसके भीतर संघर्ष, साहस, श्रम और पूरे पहाड़ की अर्थव्यवस्था का इतिहास समाया हुआ है। सुबह के चार या पांच बजे का समय। गांव अभी नींद में डूबा होता है, लेकिन घस्यारी की दिनचर्या शुरू हो चुकी होती है। चूल्हा जलाना, परिवार के लिए भोजन बनाना, बच्चों को तैयार करना और फिर हाथ में दरांती, पीठ पर रस्सी और सिर पर टोकरा लेकर जंगल की ओर निकल पड़ना। कई किलोमीटर की चढ़ाई, फिसलन भरे रास्ते, जंगली जानवरों का डर और मौसम की मारकृयह सब उसके लिए रोजमर्रा की बात है। जंगल पहुंचकर वह घंटों खड़ी ढलानों पर घास काटती है। फिर 30 से 40 किलो तक का घास का गट्ठर सिर या पीठ पर बांधकर वापस गांव लौटती है। यह केवल घास नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका होती है। पशु उसी घास से पलते हैं, खेतों के लिए गोबर की खाद बनती है और वही खाद अगली फसल की उम्मीद बन जाती है। पहाड़ की खेती का पूरा चक्र घस्यारी के श्रम पर टिका है। विडंबना यह है कि जिस महिला के श्रम से गांव की अर्थव्यवस्था चलती है, उसका नाम शायद ही किसी सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण में दिखाई देता हो। वह किसान भी है, पशुपालक भी, वन संरक्षण की प्रहरी भी और परिवार की आधारशिला भी, लेकिन उसके काम को अक्सर ष्घर का कामष् कहकर अनदेखा कर दिया जाता है। पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन ने घस्यारी का बोझ और बढ़ा दिया है। रोजगार की तलाश में पुरुष शहरों की ओर चले गए। गांवों में बुजुर्ग और महिलाएं बचीं। खेतों की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है, पशुओं की देखभाल भी और जंगल से चारा लाने का काम भी। एक महिला अब कई भूमिकाएं अकेले निभा रही है। घस्यारी का जंगल से रिश्ता केवल जरूरत का नहीं, बल्कि संवेदनाओं का भी है। वह जानती है कि किस पेड़ की टहनी काटनी है और किसे छोड़ देना है। कौन-सी घास पशुओं के लिए पौष्टिक है और किस मौसम में कौन-सा चारा सुरक्षित रहेगा। यह ज्ञान किसी विश्वविद्यालय ने नहीं दिया, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव ने सिखाया है। उत्तराखंड का प्रसिद्ध चिपको आंदोलन भी इन्हीं पहाड़ की महिलाओं की चेतना का परिणाम था। जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं थे, बल्कि पानी, मिट्टी, पशुधन और जीवन का आधार थे। इसलिए जब पेड़ों पर कुल्हाड़ी चली, तो सबसे पहले घस्यारी ही पेड़ों से लिपट गई। उसने दुनिया को सिखाया कि पर्यावरण संरक्षण किताबों से नहीं, जीवन से सीखा जाता है। आज आधुनिकता गांवों तक पहुंच रही है। सड़कें बनी हैं, गैस सिलेंडर पहुंचे हैं, कुछ जगह चारा काटने की मशीनें भी हैं, लेकिन पहाड़ की घस्यारी का संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कई गांव आज भी ऐसे हैं जहां रोज घंटों पैदल चलकर घास लानी पड़ती है। बारिश हो या बर्फबारी, यह सिलसिला नहीं रुकता। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने कभी घस्यारी के श्रम का वास्तविक मूल्यांकन किया? क्या उसकी मेहनत को आर्थिक पहचान मिली? क्या उसके लिए सुरक्षित जंगल मार्ग, आधुनिक उपकरण, चारा विकास योजनाएं और स्वास्थ्य सुविधाएं पर्याप्त हैं? यदि नहीं, तो विकास की तस्वीर अभी अधूरी है। पहाड़ की घस्यारी केवल एक महिला नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवंत संस्कृति है। उसके सिर पर रखा घास का गट्ठर केवल चारा नहीं, बल्कि पहाड़ की सभ्यता, खेती, पशुपालन और आत्मनिर्भरता का भार है। जिस दिन गांव की घस्यारी जंगल जाना छोड़ देगी, उस दिन पहाड़ का पारंपरिक जीवन भी बदल जाएगा। आज जरूरत केवल उसकी प्रशंसा करने की नहीं, बल्कि उसके श्रम को सम्मान, सुरक्षा और नीति में उचित स्थान देने की है। क्योंकि सच यही है कि उत्तराखंड के पहाड़ आज भी घस्यारी के कदमों की आहट पर सांस लेते हैं।

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