शनिवार, 4 जुलाई 2026

‘बेडू’ में है पहाड़ की मिठास और लोकजीवन की पहचान

जंगलों में पकता है स्वाद, लोकगीतों में बसती इसकी महक आज भी प्रकृति की गोद में मुस्कुराती बेडू की वह मिठास बदलते दौर में भी फीकी नहीं पड़ी पहाड़ की यह पहचान देहरादून। बेडू पाको बारामासा, ओ नरैणा...पहाड़ का यह अमर लोकगीत केवल एक गीत नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, प्रकृति और लोकजीवन का जीवंत दस्तावेज है। इस गीत में जिस बेडू का जिक्र है, वह आज भी पहाड़ के जंगलों, खेतों की मेड़ों और गांवों के आसपास प्राकृतिक रूप से उगता हुआ दिखाई देता है। बदलते समय और आधुनिक खानपान के बीच भी बेडू की मिठास पहाड़ की स्मृतियों में आज भी उतनी ही ताजा है। बेडू जंगली अंजीर की एक प्रजाति है, जो पहाड़ के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगती है। इसका पेड़ अधिक ऊंचा नहीं होता, लेकिन इसकी शाखाएं घनी होती हैं और गर्मियों से बरसात के बीच इसमें फल लगते हैं। पकने पर इसका रंग गहरा बैंगनी या लालिमा लिए होता है और स्वाद मीठा तथा हल्का दानेदार होता है। पहाड़ के बच्चों के लिए बेडू केवल एक फल नहीं, बल्कि गर्मियों की छुट्टियों की यादों का हिस्सा है। स्कूल से लौटते समय जंगलों से बेडू तोड़ना और दोस्तों के साथ बैठकर खाना पहाड़ी बचपन की अनमोल स्मृतियों में शामिल रहा है। पहाड़ के प्रसि( लोकगीत बेडू पाको बारामासा ने इस फल को वैश्विक पहचान दिलाई। इस गीत में बेडू केवल एक फल नहीं, बल्कि पहाड़ की समृ( प्रकृति और लोक संस्कृति का प्रतीक बनकर उभरता है। पहाड़ी समाज में बेडू को आत्मीयता, सरलता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का प्रतीक माना जाता रहा है। कई गांवों में आज भी बुजुर्ग बताते हैं कि कठिन दौर में जंगलों के ये फल लोगों के लिए अतिरिक्त पोषण का स्रोत बने। बेडू में प्राकृतिक शर्करा, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और कई प्रकार के एंटीआक्सीडेंट पाए जाते हैं। स्थानीय लोग इसे पाचन के लिए लाभकारी मानते हैं। आयुर्वेद में भी अंजीर वर्ग के फलों को स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ के ऐसे पारंपरिक फल आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी कई समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकते हैं। आज जब लोग जैविक और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की ओर लौट रहे हैं, तब बेडू जैसे फल नई संभावनाओं के साथ सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग अब बेडू से उतना परिचित नहीं है, जितनी पिछली पीढ़ियां थीं। जंगलों से दूरी, बदलती जीवनशैली और बाजार आधारित खानपान ने पारंपरिक फलों को धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंचा दिया है। कई गांवों में अब भी बेडू के पेड़ खड़े हैं, लेकिन उन्हें पहचानने और उनके महत्व को समझने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इन पारंपरिक फलों का वैज्ञानिक संरक्षण और व्यावसायिक मूल्यांकन किया जाए तो यह स्थानीय आजीविका का भी महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं। पहाड़ के जंगलों में स्वतः उगने वाला यह फल केवल स्वाद नहीं देता, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश भी देता है। जब भी कहीं दूर से बेडू पाको बारामासा... की धुन सुनाई देती है, तो उसके साथ पहाड़ की पगडंडियां, जंगलों की खुशबू और बचपन की यादें भी लौट आती हैं। बेडू पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत का मीठा स्वाद है, जिसे सहेजना आने वाली पीढ़ियों के लिए उतना ही जरूरी है, जितना अपने पहाड़ और अपनी लोक परंपराओं को बचाए रखना।

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