शनिवार, 4 जुलाई 2026
‘तूफान’ से पहले ‘शांति’
जनता तो बाद में फैसला करेगी, भीतरघात और बागी बिगाड़ेंगे दलों का खेल
जब-जब रूठे ‘अपने’ तब-तब बड़े-बड़े सूरमाओं के ढह गए सियासी किले
राजनीतिक दल बदलने और निर्दलीय ताल ठोकने की स्क्रिप्ट अभी से तैयार
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 से पहले राजनीति का पारा अभी से चढ़ने लगा है। फिलहाल राजनैतिक तपिश तो है मगर वह शांत है और आने वाले दिनों में यह तूफान का रूप ले लेग। भाजपा हो या कांग्रेस, लगभग सभी दलों के भीतर टिकट की दावेदारी, क्षेत्रीय समीकरण और गुटीय खींचतान ने राजनीतिक गतिविधियों को तेज कर दिया है मगर शांति से। नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है और कार्यकर्ता भी अपने-अपने दावेदारों के पक्ष में लामबंद होने लगे हैं। इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता की वापसी की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि दलों के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक संतुलन की भी बड़ी परीक्षा साबित होगा। प्रदेश में फिलहाल तो शांति छाया है, लेकिन आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में तूफान आने वाला है।
सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर मैदान में उतर रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी विकास और सुशासन के एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। लेकिन पार्टी के भीतर कई सीटों पर टिकट को लेकर दावेदारों की संख्या बढ़ रही है। कई मौजूदा विधायक अपने क्षेत्रों में विरोध और नाराजगी का सामना कर रहे हैं, जबकि नए चेहरे भी संगठन में अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुट गए हैं। कुछ विधायकों की सरकार के कामकाज और नौकरशाही को लेकर सार्वजनिक नाराजगी ने भी पार्टी के भीतर बेचौनी बढ़ाई है। संगठन की चिंता यह है कि यदि असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया तो इसका असर बूथ स्तर तक दिखाई दे सकता है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस चुनाव को बड़े अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी को उम्मीद है कि सत्ता विरोधी रुझान और स्थानीय मुद्दों के सहारे वह मजबूत वापसी कर सकती है। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसकी पुरानी बीमारीकृगुटबाजीकृबनी हुई है। प्रदेश नेतृत्व, पूर्व नेताओं के समर्थक और क्षेत्रीय क्षत्रप अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने में जुटे हैं। कई सीटों पर एक ही टिकट के लिए कई दावेदार सक्रिय हैं, जिससे संगठनात्मक एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पार्टी के कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि टिकट वितरण में देरी हुई या स्थानीय समीकरणों की अनदेखी हुई, तो चुनाव से पहले असंतोष खुलकर सामने आ सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस बार टिकट वितरण केवल जीतने की क्षमता पर नहीं, बल्कि जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन, संगठन में सक्रियता और केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे पर भी निर्भर करेगा। किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत उसका कार्यकर्ता होता है। यदि टिकट वितरण में असंतोष बढ़ता है तो इसका सीधा असर चुनावी प्रबंधन पर पड़ सकता है। भाजपा में कई कार्यकर्ता संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय की अपेक्षा कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस के कार्यकर्ता स्पष्ट नेतृत्व और समय पर निर्णय चाहते हैं। दोनों दलों के सामने चुनौती यह है कि वे अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट रखते हुए चुनावी एकजुटता बनाए रखें।
उत्तराखंड की राजनीति में बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारों का इतिहास रहा है। कई चुनावों में टिकट न मिलने से नाराज नेताओं ने दलों के समीकरण बिगाड़े हैं। ऐसे में 2027 से पहले असंतोष, टिकट विवाद और गुटबाजी किसी भी दल के लिए बड़ा राजनीतिक जोखिम बन सकते हैं। फिलहाल, उत्तराखंड की चुनावी बिसात बिछ चुकी है। नेता अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं, कार्यकर्ता माहौल भांप रहे हैं और दल भीतर की खामोशियों को संभालने में जुटे हैं। क्योंकि चुनाव केवल जनता के बीच नहीं जीते जाते, कई बार उनकी दिशा पार्टी के भीतर उठने वाली नाराज आवाजें भी तय कर देती हैं।
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