सोमवार, 13 जुलाई 2026
भाजपा-कांग्रेस के बीच ‘स्पेस’ की तलाश
उत्तराखंड क्रांति दल और आप की साख दांव पर, क्या बदलेगा चुनावी समीकरण?
यूकेडी और आप बदल पाएंगे 2027 का चुनावी गणित, नई राजनीति की तलाश में आप
भाजपा-कांग्रेस की सीधी लड़ाई के बीच क्षेत्रीय दलों के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौतीर्
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में पिछले दो दशकों से सत्ता का केंद्र भाजपाऔर कांग्रेस के बीच ही घूमता रहा है। लेकिन हर चुनाव से पहले एक सवाल जरूर उठता है, क्या इस बार कोई तीसरी ताकत उभरेगी? 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भी यह सवाल राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है। नजरें उत्तराखंड क्रांति दल और आम आदमी पार्टी पर टिकी हैं, लेकिन दोनों दलों के सामने अवसर जितना बड़ा है, चुनौती उससे कहीं अधिक कठिन दिखाई दे रही है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रहने वाला उत्तराखंड क्रांति दल कभी पहाड़ की राजनीतिक आवाज माना जाता था। अलग राज्य की मांग को जनांदोलन बनाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन राज्य बनने के बाद पार्टी धीरे-धीरे अपने जनाधार को संभाल नहीं सकी। बार-बार के नेतृत्व विवाद, संगठनात्मक बिखराव, चुनावी गठबंधनों की अस्थिरता और प्रमुख नेताओं के अन्य दलों में जाने से यूकेडी का प्रभाव लगातार सिमटता गया। आज स्थिति यह है कि राज्य आंदोलन की विरासत होने के बावजूद पार्टी विधानसभा में प्रभावी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पा रही है। फिर भी यूकेडी के समर्थकों का मानना है कि भू-कानून, मूल निवास, जल-जंगल-जमीन, पलायन और पहाड़ की अस्मिता जैसे मुद्दों पर उसकी वैचारिक पहचान अब भी अलग है। चुनौती यह है कि क्या वह इन मुद्दों को फिर जनआंदोलन में बदल पाएगी।
दिल्ली और पंजाब की सफलता के बाद आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में भी मजबूत विकल्प बनने की कोशिश की थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और मुफ्त सेवाओं के वादों के साथ पार्टी ने चुनावी मैदान में उतरकर काफी चर्चा बटोरी। लेकिन चुनावी परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि केवल प्रचार से संगठन नहीं बनता। बूथ स्तर की कमजोरी, स्थानीय नेतृत्व की सीमित पहुंच और चुनाव के बाद संगठनात्मक सुस्ती ने पार्टी की रफ्तार धीमी कर दी। अब 2027 से पहले पार्टी फिर संगठन खड़ा करने की कोशिश कर रही है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आप उत्तराखंड की स्थानीय राजनीतिक संवेदनाओं के अनुरूप अपनी रणनीति तैयार कर पाएगी, या फिर राष्ट्रीय माडल पर ही निर्भर रहेगी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में तीसरे दल के लिए राजनीतिक स्थान पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, स्थानीय रोजगार, पर्वतीय विकास और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे अब भी ऐसे हैं, जिन पर कोई वैकल्पिक राजनीतिक ताकत प्रभावी अभियान चला सकती है। लेकिन इसके लिए केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा। मजबूत संगठन, विश्वसनीय नेतृत्व, बूथ स्तर की सक्रियता और लगातार जनसंपर्क जरूरी होगा। समय-समय पर यह चर्चा भी होती रही है कि भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले क्षेत्रीय और छोटे दलों के बीच किसी प्रकार का चुनावी तालमेल बन सकता है। हालांकि अभी तक यूकेडी और आप की ओर से ऐसा कोई औपचारिक संकेत सामने नहीं आया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी भी संभावित सहयोग का आधार केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि साझा राजनीतिक एजेंडा होना चाहिए। अन्यथा ऐसा गठजोड़ टिकाऊ नहीं माना जाएगा।
यूकेडी और आप दोनों की निगाह युवा मतदाताओं पर है। रोजगार, पारदर्शिता, शिक्षा, उद्यमिता और स्थानीय अवसर जैसे मुद्दे युवाओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन युवा मतदाता केवल नारों से प्रभावित नहीं होता वह संगठन की विश्वसनीयता और नेतृत्व की क्षमता भी देखता है। 2027 का चुनाव यूकेडी और आप दोनों के लिए केवल सीटें जीतने का सवाल नहीं होगा, बल्कि राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की परीक्षा भी होगा।
उत्तराखंड की राजनीति में तीसरे विकल्प की चर्चा हर चुनाव से पहले होती है, लेकिन चुनाव परिणाम अक्सर भाजपा और कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही सिमट जाते हैं। यूकेडी के पास आंदोलन की विरासत है, जबकि आप के पास वैकल्पिक राजनीति का दावा। दोनों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह विरासत और वादों को वोट में बदल पाएंगे? 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा और कांग्रेस मुख्य खिलाड़ी बने हुए हैं। लेकिन यदि यूकेडी स्थानीय अस्मिता के मुद्दों को फिर जनआंदोलन का रूप दे सके और आप जमीनी संगठन खड़ा कर सके, तो कुछ सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। फिलहाल, दोनों दलों को सबसे पहले यह साबित करना होगा कि वह केवल चुनावी उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक राजनीतिक विकल्प भी हैं।
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