सोमवार, 13 जुलाई 2026

फास्ट फूड के ‘चलन’ में ‘कल्यौ’ की महक गुम

पहाड़ की रसोई से दूर हुआ पारंपरिक व पौष्टिक सुबह का भोजन आधुनिकता की भेंट चढ़ता सेहत और आत्मीयता का प्रतीक कल्यौ पहाड़ की आत्मीयता, श्रम व लोक संस्कृति की पहचान थी कल्यौ देहरादून। आधुनिक जीवनशैली और फास्ट फूड की संस्कृति ने पहाड़ के खान-पान को तेजी से बदल दिया है। ब्रेड, बिस्कुट, नूडल्स और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों ने गांवों की रसोई में भी जगह बना ली है। लेकिन एक समय ऐसा था जब पहाड़ के गांवों में दिन की शुरुआत कल्यौ से होती थी। यह केवल सुबह का भोजन नहीं, बल्कि पहाड़ के श्रम, स्वास्थ्य, आत्मीयता और सामुदायिक जीवन का प्रतीक था। गढ़वाल और कुमाऊँ के अनेक क्षेत्रों में सुबह खेत, जंगल या पशुओं के काम पर निकलने से पहले जो भोजन किया जाता था, उसे स्थानीय बोली में कल्यौ भी कहा जाता था। यह भोजन साधारण अवश्य था, लेकिन पौष्टिक, स्थानीय और मौसम के अनुरूप होता था। पहाड़ की महिलाओं का दिन भोर से पहले शुरू हो जाता था। चूल्हे में लकड़ियां सुलगती थीं, तांबे की केतली में पानी गर्म होता था और सिलबट्टे पर नमक, हरी मिर्च तथा भांग या तिल की चटनी पीसी जाती थी। कल्यौ में अक्सर मंडुवे या गेहूं की रोटी, झंगोरे का दलिया, मक्के की रोटी, पिछली रात की बची रोटी को घी या छाछ के साथ, मौसमी साग, आलू का ठेचुवा, भांग की चटनी, गुड़, घर का मक्खन या छाछ परोसी जाती थी। कई इलाकों में मौसम और उपलब्धता के अनुसार गहत, भट्ट या कुल्थ की दाल भी शामिल होती थी। पहाड़ का जीवन कठिन था। कई किलोमीटर पैदल चलना, खेतों में काम करना, घास और लकड़ी लाना तथा पशुपालनकृइन सबके लिए भरपूर ऊर्जा चाहिए होती थी। कल्यौ इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर तैयार होता था। इसमें स्थानीय अनाज, मोटे अनाज, दालें और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ शामिल होते थे, जो लंबे समय तक ऊर्जा देते थे। आज जिस मोटे अनाज को स्वास्थ्यवर्धक मानकर दुनिया अपनाने की बात कर रही है, वह पहाड़ के कल्यौ का सदियों से हिस्सा रहा है। यदि सुबह कोई रिश्तेदार, पड़ोसी या राहगीर घर आ जाता, तो उसे बिना कल्यौ कराए जाने देना अशुभ और असभ्य माना जाता था। यह परंपरा बताती है कि पहाड़ में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि रिश्तों को जोड़ने का माध्यम भी था। सड़क, बाज़ार और बदलती दिनचर्या के साथ कल्यौ की परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। नौकरी, स्कूल, शहरों की ओर पलायन और पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की बढ़ती उपलब्धता ने स्थानीय सुबह के भोजन की जगह ले ली। आज गांवों में भी कई घरों में सुबह की शुरुआत चाय और बिस्कुट से होती है। नई पीढ़ी के अनेक बच्चों को यह भी पता नहीं कि कल्यौ केवल नाश्ता नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा थी। पोषण विशेषज्ञ मोटे अनाज, स्थानीय दालों और पारंपरिक भोजन को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानते हैं। ऐसे में कल्यौ जैसी परंपरा केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली का भी उदाहरण बन सकती है। आज के समय में यदि होमस्टे, ग्रामीण पर्यटन और स्थानीय भोजन को बढ़ावा देने की योजनाओं में कल्यौ को शामिल किया जाए, तो पर्यटकों को उत्तराखंड की असली स्वाद-परंपरा से परिचित कराया जा सकता है। इससे स्थानीय किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और पारंपरिक खाद्य संस्कृति को भी नया संबल मिल सकता है। कल्यौ हमें सिखाता है कि भोजन का अर्थ केवल विविध व्यंजन नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों का सम्मान, श्रम का महत्व और परिवार का साथ भी है। मिट्टी के चूल्हे की आंच, ताजी रोटी की खुशबू, सिलबट्टे की चटनी और पूरे परिवार का एक साथ बैठकर भोजन करनाकृयही पहाड़ की उस जीवनशैली की पहचान थी, जिसमें सादगी ही सबसे बड़ा वैभव थी। पहाड़ का कल्यौ पेट ही नहीं भरता था, वह दिन भर के श्रम का संबल और रिश्तों की गर्माहट भी साथ लेकर चलता था। आज जब दुनिया लोकल फूड और सुपरफूड की ओर लौट रही है, तब उत्तराखंड का कल्यौ हमें याद दिलाता है कि हमारी अपनी परंपराओं में ही स्वास्थ्य, संस्कृति और आत्मनिर्भरता का गहरा ज्ञान छिपा है। जरूरत केवल उसे पहचानने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की है।

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