गुरुवार, 20 अगस्त 2026
भाजपा का ‘आपरेशन 2027’ शुरू
19 जिलों में भाजपा की नई तैनाती, चुनावी बिसात पर संगठन
प्रभारी-सह प्रभारियों की नियुक्ति महज संगठन विस्तार ही नहीं
विस चुनाव से पहले बूथ तक पकड़ मजबूत करने की कवायद
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के बीच भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालना शुरू कर दिया है। पार्टी ने प्रदेश के 19 सांगठनिक जिलों के लिए प्रभारी और सह प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं। पहली नजर में यह सामान्य संगठनात्मक फेरबदल दिखाई दे सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति के लिहाज से देखें तो भाजपा का यह कदम काफी महत्वपूर्ण है। पार्टी ने जिलों में ऐसे समय पर जिम्मेदारियां तय की हैं, जब चुनावी मैदान तैयार हो रहा है और टिकट से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन केवल चुनाव के समय सक्रिय होने वाला ढांचा नहीं है। बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक लगातार सक्रिय रहने वाला कैडर उसका सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार माना जाता है। यही वजह है कि 19 सांगठनिक जिलों में प्रभारी और सह प्रभारियों की नियुक्ति को 2027 की चुनावी रणनीति की शुरुआती बड़ी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों का चुनाव केवल बड़े राजनीतिक नारों से नहीं जीता जाता। यहां पहाड़ और मैदान की अलग-अलग राजनीतिक जरूरतें हैं। कुमाऊं और गढ़वाल के भीतर भी क्षेत्रवार मुद्दे और जातीय-सामाजिक समीकरण अलग हैं। ऐसे में प्रदेश मुख्यालय से चुनावी रणनीति बनाने के बजाय उसे जिले और मंडल स्तर तक पहुंचाना भाजपा की प्राथमिकता होगी। नए प्रभारी और सह प्रभारी इसी काम की कड़ी होंगे। उनकी जिम्मेदारी केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी। संगठन की वास्तविक स्थिति, बूथ कमेटियों की सक्रियता, स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल, सरकार की योजनाओं का प्रचार और जनता के बीच पार्टी की पकड़ जैसे मुद्दों पर भी नजर रखनी होगी। यानी भाजपा चुनाव आने से पहले ही यह जान लेना चाहती है कि कौन सा बूथ मजबूत है, कहां संगठन कमजोर है और कहां पार्टी के भीतर ही असंतोष चुनावी नुकसान का कारण बन सकता है।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव केवल संगठन की परीक्षा नहीं है। प्रदेश की सरकार के कामकाज का भी जनमत संग्रह होगा। धामी सरकार डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन विपक्ष बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आपदा प्रबंधन और युवाओं से जुड़े सवालों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। ऐसे में जिला प्रभारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल पार्टी का पक्ष जनता तक पहुंचाना नहीं होगा, बल्कि जनता के सवालों और नाराजगी की रिपोर्ट भी ऊपर तक पहुंचानी होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब पार्टी के पास कागजों में मजबूत संगठन हो, लेकिन जमीन पर मतदाता उससे दूरी बनाने लगे।
2027 के चुनाव से पहले भाजपा के सामने एक और बड़ी चुनौती टिकट की होगी। हर विधानसभा क्षेत्र में संभावित दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। कई पुराने चेहरे टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो नए नेता भी संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। जिला प्रभारी और सह प्रभारी ऐसे समय में पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें यह भी देखना होगा कि टिकट की होड़ संगठनात्मक गुटबाजी में न बदल जाए। क्योंकि भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से पहले अपनों की नाराजगी हो सकती है। टिकट कटने के बाद बगावत, भीतरघात या निर्दलीय मैदान में उतरने की स्थिति पार्टी के चुनावी गणित को बिगाड़ सकती है।
भाजपा की यह कवायद कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस अभी संगठन को मजबूत करने और चुनावी चेहरे को लेकर अपनी रणनीति स्पष्ट करने में जुटी है। ऐसे में भाजपा यदि डेढ़ साल पहले ही जिलेवार संगठन की जिम्मेदारी तय कर रही है तो इसका अर्थ साफ हैकृपार्टी चुनाव को अंतिम छह महीने की लड़ाई नहीं मान रही। भाजपा चाहती है कि चुनाव की घोषणा होने से पहले ही उसका संगठन मतदाता तक पहुंच चुका हो। सरकार की उपलब्धियां बूथ तक पहुंचें, लाभार्थियों से संपर्क हो, स्थानीय मुद्दों की पहचान हो और कमजोर सीटों पर पहले से काम शुरू किया जाए।
हालांकि भाजपा की संगठनात्मक ताकत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन चुनाव केवल संगठन के दम पर नहीं जीते जाते। अंततः मतदाता यह तय करता है कि सरकार ने उसके जीवन में कितना बदलाव किया। 19 जिलों में प्रभारी-सह प्रभारी नियुक्त करना भाजपा की तैयारी का संकेत जरूर है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि 2027 का चुनाव पार्टी के लिए आसान होगा। पहाड़ की नाराजगी, युवाओं के रोजगार के सवाल, सरकारी नौकरियों की भर्ती, पलायन, महिलाओं की सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दे चुनावी हवा का रुख बदल सकते हैं। इसलिए भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि संगठन को जनता की नब्ज पढ़ने वाली मशीन बनाने की है।
2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा ने पहली बड़ी चाल चल दी है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रभारी और सह प्रभारी पार्टी के लिए सिर्फ बैठकें और रिपोर्ट तैयार करते हैं या वास्तव में जमीन पर संगठन की कमजोर नसों को पकड़ पाते हैं। क्योंकि चुनाव बूथ पर लड़ा जाएगा, लेकिन उसका फैसला जनता के मन में होगा।
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